नौकरी छोड़ महिला ने अपनाई मशरुम खेती, आज साल का 20 लाख रुपए कमाती और सम्मान पाती है

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Jayanti Pradhan mushroom
An agro-processor and farmer from Odisha, Jayanti Pradhan is educating women about mushroom farming. Mushroom kheti se success mili.

Barghat: देश में आधुनिक और जैविक खेती कृषि वर्ग में एक नई क्रांति लेकर आई है। पहले के समय में किसान भाई पारंपरिक खेती करके अपना गुजर-बसर कर रहे थे, परंतु जैसे-जैसे समय बीतता चला जा रहा है, वैसे वैसे प्रदूषण के चलते मौसम में भी बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

जिस मौसम में जो फसल लगाई जाती थी, वह मौसम ही फसल के विपरीत हो गया है। ऐसे में किसान भाई मुनाफे से ज्यादा नुकसान झेल रहे हैं, इसीलिए उन्होंने आधुनिक खेती और जैविक खेती को अपनाकर अपनी रोजी-रोटी को बनाए रखने का विकल्प ढूंढना है।

इन सब में अब कृषि विज्ञान के विशेषज्ञ भी उनकी काफी ज्यादा मदद कर रहे हैं देशभर में आधुनिक खेती के चलते कई तरह के फल सब्जियां का उत्पाद हो रहा है। लोग दलहन तिलहन फसलों के साथ-साथ अन्य तरह की महंगी और फायदेमंद सब्जियों को उगा कर मार्केट में अच्छे दामों पर बेच रहे हैं।

इन्हीं में शामिल है उड़ीसा की एक महिला, जो मशरूम की खेती (Mushroom Farming) कर अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे हैं। तो आइए जाने उन महिला के बारे में जो मशरूम की खेती में अपना नाम रोशन कर रही है।

उड़ीसा की जयंती प्रधान की कहानी

उड़ीसा (Odisha) राज्य के बरघाट (Barghat) की रहने वाली महिला किसान जिनका नाम जयंती प्रधान (Jayanti Pradhan) है। काफी पढ़ी-लिखी और नौकरी पेशा वाली थी, परंतु उन्होंने नौकरी छोड़ के कृषि के क्षेत्र में काम कर अपना एक नया अनुभव लोगों के साथ साझा किया।

उन्होंने फसल की पैदावार के बाद निकलने वाली पराली का उपयोग कर मशरूम की खेती करना प्रारंभ किया। इससे किसानों को दुगना फायदा हुआ। जैसा कि हम जानते हैं कि पराली को किसान अनुपयोगी समझ के जला दिया करते हैं, जिससे वायु प्रदूषण के साथ-साथ मृदा की उर्वरक क्षमता में भी कमी आती है।

परंतु जयंती ने इसका बेहतरीन विकल्प ढूंढा। आज वे इसी पराली से मशरूम उगाती है और पराली का सही इस्तेमाल करती हैं। एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं बल्कि किसानी चुनी, यही किसानी आज उन्हें साल का 2000000 RS दे रही है।

कम से कम 50 लोगों को दे चुकी हैं रोजगार

जयंती की उम्र करीब 40 वर्ष और उन्होंने अपने व्यापार में करीब 50 लोगों को रोजगार दिया है। वे बताती हैं कि जैसे ही उन्होंने एमबीए कंप्लीट किया इसके बाद उन्हें मल्टीनेशनल कंपनी में लाखों के पैकेज पर जॉब मिलने लगी थी, परंतु उन्हें यह जॉब रास नहीं आई। वे तो अपनी मातृभूमि से जुड़े रहकर काम करना चाहती थी।

वर्ष 2003 में उन्होंने एमबीए कंप्लीट कर लिया था। उसके बाद में बिना देरी किए खेती में जुट गई और उन्होंने धान और गेहूं से निकलने वाली पराली का इस्तेमाल वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने में और उसमें मशरूम उगाने में किया। उन्हें इसमें काफी फायदा मिला और आज वे करोड़ों की मालकिन है। आज उनके खेतों को गोपाल बायोटिक एग्रो फर्म कहा जाता है।

मानव शरीर के लिए मशरुम है अमृत

जयंती बताती है कि उन्हें शुरू से ही खेती किसानी में काफी इंटरेस्ट था। वे चाहती थी कि मशरूम की खेती (Mushroom Ki Kheti) करें परंतु उस समय ज्यादा लोग मशरूम के बारे में नहीं जानते थे और ना ही मशरूम के फायदे इसीलिए उनके लिए मशरूम की खेती करना काफी मुश्किल हो रहा था।

फिर उन्होंने कृषि प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लेकर मशरूम की खेती प्रारंभ की और सबसे बड़ी बात उन्होंने पराली का उपयोग कर मशरूम उगाया यह वही पराली है, जिसे किसानों द्वारा जला दिया जाता था। परंतु अब इसी पराली को जयंती खरीदकर पराली के बेड लगा के उस पर मशरूम उगाती हैं। उड़ीसा में धान ज्यादा बोई जाती है इसीलिए धान की पराली सबसे अधिक मात्रा में प्राप्त होती है।

मशरूम की खेती के साथ-साथ करती है कई सारे काम

धान की पराली में उगे हुए मशरूम को पैरा मशरूम कहा जाता है और स्थानीय क्षेत्रों में इसकी मांग सबसे ज्यादा है, लोग इसे एक सब्जी की तरह इस्तेमाल करते हैं। आपको बता दें मशरूम की खेती के अलावा जयंती कई सारे काम करती हैं। वे अचार पापड़ जैसे कई उत्पादों को बनाकर मार्केट में सप्लाई करती हैं।

जयंती के पति भी जयंती का पूरा सपोर्ट करते हैं और वर्ष 2003 से वे पूरे तरीके से जयंती के साथ व्यापार में जुट गए। उनके दो इलाके निश्चित है, जहां उन्होंने अपना पूरा काम सेट किया हुआ है।

उन इलाकों में वे वर्मी कंपोस्ट खाद सेंटर मशरूम सेंटर और पौधों की नर्सरी का काम जमाए हुए हैं उन्होंने अपने खेतों पर एक बहुत बड़ा तालाब का निर्माण किया है, जहां वे मछली पालन (Fisheries) करती हैं इसके साथ ही वे मुर्गी पालन बकरी पालन बत्तख पालन भी करती हैं।

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