गरीबी के चलते पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, अब इस सब्ज़ी की खेती से हर साल 60 लाख कमा रहे हैं

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Arbi Kheti
Arbi Taro Root farming giving more profit to farmer from Khandwa MP. Arbi ki kheti se fayda hua. Many farmers doing Arbi Taro Root farming and earning money. Kheti ka fayda. Awesome Kheri tips in Hindi.

File Photo Credits: Twitter

Khandwa: हाल ही के दिनों में देश में एक किसान आंदोलन चल रहा है और कुछ लोग देश के किसानो की दयनीय और गरीब छवि प्रस्तुत करने में लगे है। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है और खेती में भी लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं। आज हम आपको एक ऐसा ही किस्सा बताने जा रहे है, जिसमे एक व्यक्ति खेती से लाखों रुपये बना रहे हैं।

मध्यप्रदेश के खंडवा (Khandwa) जिले के कालंका गांव के रहने वाले रामचंद्र पटेल आज एक मिसाल कायम कर रहे है। रामचंद्र (Ramchandra) केवल 12वीं तक पढ़े हैं, फिर भी आज वे खेती से लाखों रुपये कमा रहे हैं। लगभग 25 साल पहले उन्होंने अरबी की खेती शुरू की थी। अब वे दिल्ली, मुंबई सहित कई शहरों में अपना प्रोडक्ट (अरबी) सप्लाई करते हैं। बीते साल उन्होंने 60 लाख रुपए से ज्यादा की कमाई की थी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ 48 साल के रामचंद्र एक किसान परिवार से नाता रखते हैं। वे एक मीडिया अख़बार में बताते हैं, ‘मैं तीन भाइयों में सबसे बड़ा था। पिताजी अकेले खेती संभाल नहीं पाते थे और घर में पैसों की भी तंगी थी। मैं नहीं चाहता था कि मेरे दोनों भाई खेती करें, इसलिए खुद खेती करने का निर्णय लिया। तब हमारे पास बहुत अधिक जमीन नहीं थी। पिताजी पारंपरिक खेती करते थे। इसमें कोई खास फ़ायदा नहीं हो रहा था। फिर मैंने सोचा कि क्यों न कुछ ऐसे प्लांट्स की खेती की जाए, जिसके लिए जमीन की जरूरत भी कम हो और फ़ायदा भी अधिक हो।’ बस तरकीब कामयाब हो गई।

वे आगे बताते हैं, ‘उस समय मेरे मामा के यहां अरबी की खेती होती थी और वे लोग सम्पन्न भी थे। मैंने भी निर्णय लिया कि एक बार अरबी की खेती (Taro Root Farming) को भी कर देखा जाए। फिर मैं मामा से एक बोरी अरबी लेकर गांव आया और अपने उसे खेत में लगा दिया। जब गांव वालों को पता चला तो उन्होंने कहा कि यहां अरबी की खेती संभव नहीं है। तुम्हारे पास जो थोड़ी-सी जमीन है, उसे भी खराब कर रहे हो। लेकिन मैं पीछे हटने वाला नहीं था।’ उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदला।

पहले साल ही उनकी मेहनत रंग लाई और एक बोरी से 40 बोरी अरबी (Taro Root) का उत्पादन हुआ। इससे उनका मनोबल बढ़ गया। फिर बाकी की और जमीन पर भी अरबी लगा दी गई। इसी तरह हर साल इसका दायरा बढ़ाता गया। आज 20 एकड़ जमीन पर वे अरबी की खेती कर रहे है। बीते साल 3 हजार बोरी अरबी का प्रोडक्शन किया गया था।

अरबी किसान (Arvi Farmer) रामचंद्र एक हिंदी अख़बार को बताते हैं कि मार्केटिंग को लेकर मुझे कोई खास परेशानी नहीं हुई। पहली बार हमने अपना प्रोडक्ट इंदौर भेजा था। उन्हें पसंद आया तो हम अपने प्रोडक्ट की रेगुलर सप्लाई करने लगे। इसी तरह हमने आस-पास की मंडियों में भी अप्रोच किया और वो भी हमारे उत्पाद लेने लगे। अभी कई सब्जी बेचने वाले खेत से ही अरबी उठा ले जाते हैं।

सबसे अच्छी बात यह है की अरबी (Arvi) की खेती खरीफ और रबी दोनों मौसम में कर सकते हैं। खरीफ फसल की बुवाई जून- जुलाई में की जाती है। जो दिसंबर और जनवरी महीने तक तैयार हो जाती है। वहीं रबी सीजन की फसल अक्टूबर में लगाई जाती है। जो अप्रैल- मई तक तैयार हो जाती है। इसकी खेती के लिए लाल दोमट मिट्टी काफी अच्छी मानी जाती है। एक एकड़ जमीन में अरबी की खेती के लिए 4-5 ट्रॉली गोबर खाद की जरूरत होती है। साथ ही जरूरत के हिसाब से रासायनिक खाद भी इसमें लगता है।

बता दे की खेत की जुताई के बाद उसमें गोबर खाद को अच्छी तरह से मिलाया जाता है। इसके बाद एक फुट की दूरी पर बीज लगाकर मिट्टी से ढंक दिया जाता है। ध्यान रहे कि बीज साफ-सुथरे और स्वस्थ होने चाहिए। इसके लिए हर 4-5 दिन में सिंचाई की जरूरत होती है। बरसात और ठंड में पानी की जरूरत कम पढ़ती है।

प्रति एकड़ अरबी की खेती (Arbi Ki Kheti) से लाख रुपए की कमाई हो सकती है। अगर बाजार में दाम सही मिला, तो इससे ज्यादा की भी कमाई हो सकती है। एक एकड़ जमीन पर अरबी की खेती के लिए 60 हजार रु खर्च होते हैं। वो कहते हैं शहरी क्षेत्रों में अरबी के पत्तों की भी अच्छी-खासी डिमांड होती है। अरबी के साथ धनिया और दूसरी सब्जियों की भी खेती की जा सकती है।

आपदा और लॉक डाउन काल में शिक्षक बच्चों को आनलाइन शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ इस समय का सदुपयोग करने की सीख भी दे रहे हैं। वैश्विक महामारी के चलते शिक्षण संस्थान करीब डेढ़ वर्ष से बंद हैं। बच्चों की चहल-पहल न होने से कई स्कूल परिसर वीरान पड़े हैं। अधिकांश स्कूलों के परिसरों में बड़ी-बड़ी घास उग आई है।

ऐसे में जिला ऊना की राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला कड्ड के प्रधानाचार्य दिलबाग सिंह राणा ने शिक्षकों की मदद से स्कूल की खाली पड़ी दो कनाल भूमि में अरबी उगाई है। स्कूल खुलने पर इसे बच्चों को मिड-डे मील में परोसने की तैयारी है। मार्च में कोरोना की दूसरी लहर आ गई और पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी काफी कुछ बंद करना पड़ा। स्कूल भी नहीं खुल पाए।

ऐसे में कड्ड स्कूल के प्रधानाचार्य दिलबाग सिंह राणा ने मार्च में ही शिक्षकों की मदद से स्कूल परिसर की खाली पड़ी भूमि में अरबी की फसल लगा दी थी। अब आनलाइन पढ़ाई के बाद जो भी समय बचता है, उसमें शिक्षक इस फसल की देखभाल का कार्य करते हैं। अब जब स्कूल खुलेगा तो इस अरबी को बच्चों में मिड-डे मील में परोसा जाएगा।

यदि स्कूल एक या दो माह नहीं खुलेंगे तो भी अरबी खराब नहीं होगी। इस फसल को अक्टूबर में निकाल लिया जाएगा। यदि उत्पादन अच्छा होता है तो इसे बाजार में बेचकर उससे होने वाली आमदनी को स्कूल हित में खर्च किया जाएगा। अरबी का उत्पादन करीब 3.50 क्विंटल होने का अनुमान है। इस फसल के बाद स्कूल परिसर की इस जमीन का अन्य उपयोग किया जाएगा।

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