नाथूराम गोडसे बहुत ही सौम्य और सभ्य इंसान थे, गाँधी के असली पुत्र देवदास गांधी गोडसे से मिले थे

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Nathuram Godse Image Credits: Social Media

Bhopal/Madhya Prdaesh: नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) का जन्म आज ही के दिन अर्थात 19 मई सन 1910 में हुआ था। नाथूराम कॉफी पीने और जासूसी किताबें पढ़ने का शौकीन था। 15 नवंबर 1949 को गोडसे को फांसी दिए जाने से एक दिन पहले परिजन उससे मिलने अंबाला जेल गए थे। गोडसे की भतीजी और गोपाल गोडसे की पुत्री हिमानी सावरकर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वह फांसी से एक दिन पहले अपनी मां के साथ उनसे मिलने अंबाला जेल गई थी। उस वक्र वह ढाई साल की थी।

नाथूराम गोडसे ने गिरफ़्तार होने के बाद गांधी के पुत्र देवदास गांधी को तब पहचान लिया था जब वे गोडसे से मिलने थाने पहुंचे थे, इसी भेंट का बखान करते हुए नाथूराम के भाई और सह-अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब ‘गांधी वध क्यों’, में बहुत कुछ लिखा है। गोपल गोडसे ने अपनी किताब में लिखा है, देवदास गाँधी शायद इस उम्मीद में आए थे कि उन्हें कोई भयावह चेहरे वाला, गांधी से नफरत करने वाला नजर आएगा, परन्तु नाथूराम गोडसे बहुत ही सहज और सौम्य देखे दिए थे। देवदास गाँधी ने जैसी उम्मीद की थी, उससे एकदम उलट होता। नाथूराम गोडसे बहुत ही सभ्य रहे।

नाथूराम गोडसे ने देवदास गांधी से कहा, मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूँ। हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक हूँ। आज तुमने अपने पिता को खोया है। मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है। तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है। कृपा करके मेरा विस्वाश करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के कारण नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कुछ और।

नाथूराम गोडसे ने कहा था कि “मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त नागरिक होने के नाते, 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है। इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया। मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम भी रख सकती हैं।” यह विचार गोडसे के थे।

नाथूराम गोडसे की भतीजी और गोपाल गोडसे की पुत्री हिमानी सावरकर का कहना था कि गोडसे कोई बुरे इन्सान नहीं थे, बल्कि गोडसे ने गाँधी पर वह काम अपने पूरे होशो-हवास में किया था और उसके पीछे उनके निजी कारण नहीं बल्कि पूर्ण रूप से राजनीतिक कारण थे। हिमानी सावरकर का मानना था कि उन्हें बाद में मालूम हुआ कि गोडसे बिल्कुल भी गलत नहीं थे। विदेशी अख़बार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिमानी सावरकर ने कहा, “वो एक अख़बार के संपादक थे। उन दिनों उनके पास अपनी मोटर गाड़ी थी। गोडसे जी और गाँधी जी का कोई व्यक्तिगत मामला भी नहीं था।

https://twitter.com/ArmyDeshBakth/status/1262637971867496449

रिपोर्ट के अनुसार गोडसे पुणे में रहते थे जहाँ देश विभाजन का कोई असर नहीं हुआ था। वो फिर भी गाँधी पर इस घटना को अंजाम देने गए थे, उसका एकमात्र कारण यही था कि वो मानते थे कि पंजाब और बंगाल की माँ-बहनें मेरी भी कुछ लगती हैं और उनके आँसू पोछना मेरा कर्तव्य है।

महात्मा गाँधी पर घटना को अंजाम देने के आरोप में नाथूराम गोडसे सहित 17 अभियुक्तों पर मामला चला था। सुनवाई के वक़्त नाथूराम गोडसे ने अदालत में अपना पक्ष रखा था। गोडसे के इस बयान पर तत्कालीन सरकार ने रोक लगा दी थी, परन्तु नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे ने लंबी जंग की और इस बयान पर लगी रोक को हटवाया था।

https://twitter.com/Kashyap_ds/status/1262583103404552198

आपको बता दें की 1968 में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा इस गोडसे के बयान पर रोक हटा दी गई। उनका पूरा बयान ‘मैंने गाँधी को क्यों मारा’ बुक में शामिल किया गया है। इसमें गोडसे ने क्लियर रूप से स्वीकार किया था कि उन्होंने गाँधी वाली घटना को अंजाम दिया था और उनके पास ऐसा करने के कारणों की एक बड़ी वजह वाली सूचि भी थी।

उन्होंने कहा था कि एक विशेष सम्प्रदाय अपनी मनमानी कर रहे थे। ऐसे में या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी मनमानी और बुरे रवैए के साथ खड़े हो जाये। गोडसे ने कहा था कि महात्मा गाँधी ने एक विशेष सम्प्रदाय को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सौंदर्य और सुन्दरता के साथ गलत किया। वह मानते थे कि महात्मा गाँधी के सारे प्रयोग हिंदुओं के खिलाफ ही जाते थे। गोडसे ने अपने बयानों में इस बात का उल्लेख किया था कि जिस भारत माता को वह पूजा की वस्तु मानते थे, उसके साथ ऐसा व्यवहार देखकर उनका मन बहुत दुखी हो जाता था।

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