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Bhilai CG: जीवन संघर्ष का पिटारा है। दुनिया में हर किसी इंसान के जीवन में कोई ना कोई कठिनाई जरूर आती रहती है, परंतु जो कठिन समय को पार कर लेता है, उसका जीवन बेहद सरल हो जाता है। वैसे देखा जाए तो मुश्किल भी आदमी को देखकर असर दिखाती है, किसी को असहाय तो किसी को मजबूत बनाती है। यह बात बिल्कुल सत्य है कि इंसान विकट परिस्थिति का सामना करके ही स्ट्रोंग बनता है।
एक ऐसे पुलिस अफसर (Police Officer) के बारे में बता रहे हैं, जिसने यह साबित कर दिखाया है कि परेशानियों से हिम्मत के साथ मुकाबला किया जाए, तो इंसान की रास्ता आसान हो जाती है। हम बात कर रहे हैं सिपाही अभिषेक निर्मलकर (Abhishek Nirmalkar) की, जो ATS है। अभिषेक निर्मलकर ATS में नौकरी करते थे, लेकिन एक रात वह दानापुर एक्सप्रेस से घर के लिए निकले तो वह ट्रेन के गेट पर खड़े थे।
इसी दौरान बोगी में भीड़ के कारण अचानक बोगी में धक्का-मुक्की होने लगी उसी धक्का मुक्की के चपेट में आकर वो नीचे गिर गए। अभिषेक का कहना है कि मैं अपने आप को संभाल नहीं पाया और नीचे गिर गया। मैं ट्रेन के नीचे आ गया। इस हादसे के बाद जब उनकी आंख खुली तो वह अस्पताल में थे और उन्हें उनके दोनों पैर महसूस नहीं हो रहे थे। इस दौरान उनका एक पैर नहीं था और दूसरा पैर का सहारा भी नहीं मालूम हो रहा था।
अभिषेक (Abhishek Nirmalkar) का कहना है कि मैं भिलाई (Bhilai) में रहता हूं। रोज मैं भिलाई से रायपुर (Bhilai To Raipur) आना-जाना करता हूं। 17 जनवरी 2020 की रात को मैं कभी भूल नहीं सकता। मैं उस समय एटीएस में था। मेरी पत्नी कुलेश्वरी को हादसे के बारे में इतना बताया गया था कि मामूली जख्मी हुए है। मामूली सी चोट आई है। वह अस्पताल आती और बाहर से देखकर चली जाती थी। 10 दिन बाद पत्नी को पता चला कि पति के दोनों पैर (Both Legs) कट गए हैं।
वह सदमे में आ गई थी। घर की खुशियां मानो चली गई हो। पर उसने हिम्मत दिखाते हुए जल्दी उसने खुद को संभाला और फिर वही मेरी हिम्मत बनने लगेगी। वह मेरी जिम्मेदारी उठाने को तैयार थी। मेरे बुजुर्ग पिता ने भी हिम्मत नहीं हारी। रोज मुझे जीने की और आगे बढ़ने की उम्मीद दिखाते थे। उससे मेरे होसलो में जान आ गई। पिता जी हमेशा साथ रहते थे। मैं एक महीने तक एम्स रायपुर में एडमिट रहा। फिर घर गया।
तब बिस्तर में रहा। अपनी डेढ़ साल की बेटी अभिख्या और 7 साल के बेटे अभिमन्यु को देखकर बहुत उदास होता था। उन्हें गोद में भी उठा नहीं पता था, लेकिन उन्हीं की वजह से मुझे हौसला मिला मैने खुद को पहले से ज्यादा मजबूत बनाया, दोनों बच्चो के लिए बहुत कुछ करना है। उनकी जिम्मेदारी है मुझपर। यह सब सोच फिर हौसले मजबूत कर लिए।
उनकी डेढ़ साल की बेटी और 7 साल का बेटा ने उनको फिर से जीने की राह दिखाई। एटीएस के अधिकारियों ने सहारा दिया। उन्होंने बताया कि वह ड्यूटी पर जा सकते हैं। इसके बाद कृत्रिम पैरों पर खड़े होने का संघर्ष स्टार्ट हुआ। 6 महीने में वह इसमें सफल रहे। फिर चलने के अभ्यास में गई बार गिरे। पैर जमने लगे तो दोस्तों के साथ बाइक पर बाहर जाने लगे।
अभिषेक निर्मलकर भिलाई के रहने वाले हैं। भिलाई में वो अपने परिवार के साथ रहते हैं। जिस दौरान उनके साथ हादसा हुआ उस समय अभिषेक निर्मलकर ATS में कार्यरत थे और और हर रोज भिलाई से रायपुर जाया करते थे। जानकारी के मुताबिक ऐसा बताया जा रहा है कि अभिषेक निर्मलकर ने जब अपने दोनों पैर खो दिए तो तो उनकी पूरी हिम्मत टूट गई।
उन्होंने सोच लिया था कि अब वो कभी अपने पैरों पर खड़े नही हो पाएंगे। उनके दिमाग मे यही बात घर कर गई थी। वह पूरी तरह से बिखर गए थे। वह इतने चिंतित हो गए कि वह डिप्रेशन में भी जाने लगे थे लेकिन इस मुश्किल भरे समय में उनकी पत्नी और घरवालों ने उनका मजबूती के साथ समर्थन किया। उनकी पत्नी और बुजुर्ग पिता उनके साथ हमेशा खड़े रहे।
अभिषेक निर्मलकर के साथ हुए इस हादसे के बाद परिवार ने उनको कभी टूटने नही दिया हर समय उनकी परछाई बनकर उनका साथ दिया। इसके साथ साथ एटीएस के अधिकारियों ने भी उनको सहारा दिया था। उन्होंने कृत्रिम पैरों (Artificial legs) पर खड़े होने का हौसला बनाया। लगभग 6 महीने तक वह बिस्तर पर पड़े रहे परंतु उसके बाद उन्होंने अपनी हिम्मत नही हारी और फिर एक बार खड़े होने का प्रयास किया इसमें वह सफल हुए।
धीरे-धीरे इन्होंने चलने की कोशिश की। कई बार गिरे, कई बार खड़े हुए लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। दोस्तों ने भी इनका पूरा साथ दिया। उनके दोस्त भी उनकी ढाल बनकर उनका सहारा बने रहे। ऐसे में उन्होंने अपनी जिंदगी में यह सिख ली कि अंत भला तो सब भला। धीरे-धीरे पैर जमाने लगे और दोस्तों के साथ वह बाइक भी चलाने लगे। 20 अक्टूबर को उन्होंने वापस ड्यूटी join कर ली है और अब रोज की तरह बाइक पर 35 किलोमीटर का रास्ता तय करके ड्यूटी पर जाते हैं।
बता दे इन दिनो अभिषेक मोपेड चलाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही वह अपनी जिंदगी के इस हादसे को भुलाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।जानकारी के मुताबिक 20 अक्टूबर को अभिषेक निर्मलकर ने अपनी ड्यूटी जॉइन करते ही उनके दोस्त उनके हर पल उनका साथ देने लगे। उनको फिर से वही मजबूत होसलो के साथ खड़े होने का हौसला दिलाते। रोजाना 35 KM दूर दोस्त की बाइक पर सवार होकर वह ड्यूटी (Duty) के लिए जाते हैं।



