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Konkan: समय के साथ शहरों में तो बदलाब हो रहा है। परंतु गांव में ज्यादा प्रगति नहीं हो पाती। लोगो को मजबूरन अपना घर वार छोड़ कर शहर की तरफ भागना पड़ता है। ऐसे में हर वर्ष करीब 25 प्रतिशत लोग अपने घर और गांव को छोड़ देते है। शहर में पैसा है तो खर्च भी ज्यादा है।
परदेश में रहना आसान नहीं होता वहां पानी भी मोल खरीद कर पीना पड़ता है। ऐसे में लोग हताश हो जाते है। अब लोगो ने इसका विकल्प भी निकाल लिया है। देश में आधुनिक खेती की लहर चल रही है। लोग आधुनिक खेती करके खुद को आत्मनिर्भर बना रहा है। पिछले 2 वर्षों में देश को काफी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा बहुत से लोगो ने अपनी नोकरी से हाथ धो लिया।
ऐसे में उन्होंने प्रधान मंत्री की कही बात को अपना लक्ष्य बनाया और अपने आप को आत्मनिर्भर भारत की इस पहल में शामिल कर बढ़ चढ़ कर भाग लिया। लोगों को जैविक खेती (Organic Farming) का ऐसा असर हुआ की वे अपनी अच्छे से अच्छी नोकरी छोड़ कर अपना खुद का व्यापार कर रहे है।
लोगों ने गेहू,चावल, मक्का, चना की फसल के साथ फल और सब्जी की फसल उगाना शुरू कर दी। आज की इस पोस्ट में हम बात करेंगे एक ऐसे व्यक्ति की जिसने अपनी वर्तमान नोकरी को छोड़ा और आम की खेती कर लग गए अपने व्यापार में। आइये हम विस्तार से बात करेंगे इनके बारे में।
लोगो का मिथ था कि एक अच्छी किस्म का आम उनके इलाके में नही सकता
काकासाहब सावंत (Kakasaheb Sawant) पहले एक ऑटो मोबाइल कंपनियों में काम करते थे। वे एक साधारण पुरुष है। सभी संघर्षी युवाओं की तरह उन्होंने अपना जीवन बिताया। और आज वे प्लांट नर्सरी के मालिक हैं। जिससे आज वे करीब 50 लाख रुपये (50 Lakh Ru) तक सालाना कमाते है। सबन्त की उम्र करीब 43 वर्ष है।

जब उन्होंने आम की खेती प्रारम्भ की तो लोगो ने उनको खूब ताने दिये, क्योंकि उनके इलाके में आम की पैदावार नहीं होती वहां की जलवायु आम की फसल के लिए नहीं थी, इसीलिए लोग उन्हें ताने मारते थे। परंतु आज वही लोग उनकी बड़ाई करते नहीं थकते। उस गांव के लोग कहते है कि कोंकण (Konkan) के अलावा कही और अच्छा हापुस आम नहीं लग सकता। परंतु काकासाहब की मेहनत ने सभी के मुह पर ताला लगा दिया।
काका भाई साहिब अपने गांव लौटे और खेती प्रारम्भ की
सांवत ने अपने दो स्कूल टीचर और भाइयों के साथ मिलकर महाराष्ट्र राज्य के सांगली जिले के जाट तालुका में आने वाले गांव में करीब 20 एकड़ जमीन खरीदी। ये जगह एक सूखा प्रभावित क्षेत्र में आती थी।
इस गांव में मात्र 280 परिवार रहते थे। साथ ही यह जगह मुख्य शहर से करीब 15 किमी दूरी पर है।
इस गांव के निबासी किसान भाई अपनी जमीन पर अंगूर या तो फिर अनार की फसल उगाते थे और बाजरा, जवार और गेहूं-दाल जैसे मोटे अनाज को भी उत्पादित करते हैं।
काका साहब ने एक टेक्निकल इंस्टीट्यूट में फैकल्टी के पद पर भी काम कर रहे तभी उनका ट्रांसफर हुआ तो उन्होंने गांव वापस आने का मन बना लिया और खेती करने का निर्णय लिया।
गांव वापसी के बाद उन्होंने लोगो के मिथ को तोड़ा
काका साहिब ने साल 2010 में आम का बगीचा तैयार किया और 5 वर्ष के बाद से ही वे अपने व्यापार को करने के लिए रास्ता दिखने लगे। इन्ही सब के बीच सरकारी सहायता और अन्य दूसरे प्रोग्रामो की मदद से गांव में पानी की अच्छी व्यवस्था हो गई। तो उन्होंने अपनी जमीन के दो हिस्से कर दिए। एक भाग में आम के पेड़ और दूसरे में अन्य उत्पाद की खेती की।
10 एकड़ की जमीन पर आम के पेड़ और 10 एकड़ में चिकू, अनार, सेव, अमरूद अदि फलदार वृक्षो का रोपण किया। आज उनकी स्थिति कुछ ऐसी सुधारी की वे प्रतिवर्ष एक एकड़ जमीन से कम से कम 2 टन आम की पैदावार कर रहे है। काका भाई अन्य किसान भाई के लिए प्रेरणा है, साथ ही वे 25 लोगों को खुद से रोजगार दिया हैं।
सरकार की तरफ से नर्सरी के लिए सब्सिडी मिलती है
उन्होंने अब खुद का एक नर्सरी हाउस भी बनाया हुआ है, इसमें हाईव्रीड बीज (Hybrid Seed) से पौधे बनाते है और बाहर सप्लाई करते है। इसके लिए इन्हें सरकार से सब्सिडी भी मिल रही है। सावंत प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख आम के पौधे बनाते हैं। ये कई प्रकार की किस्मो के होते हैैं। वर्तमान में उनके बगीचे में करीब 22 वैरायटी के आम के पेड़ हैं।



