सॉफ्टवेयर नौकरी छोड़, धोती कुर्ता पहन ऑर्गनिक खेती से 200 किस्म के चावल उगा कमा रहे लाखो

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Baparao Athota Farmer
Graphic Designer Baparao Athota Turned Organic Farmer Is Growing Organic rice kalapana. Farmer who doing Organic farming and earns well.

Athota, Andhra Pradesh: बप्पा राव एक ऐसी शख्सियत हैं, जिनके आईडिया और सादगी किसी का भी मन मोह लेती है। जिसने देश की माटी में सोना उगाने की जिद बना ली और अपने सपनों को साकार करके ही दम लिया। देश के लिए उनका जुनून, बलिदान और लगन सैकड़ों लोगों की प्रेरणा (Inspiration) का स्त्रोत है। युवा स्वदेशी किसान बप्पा राव (Farmer Baparao) को हमारा सैल्यूट है। यह कहानी है ग्राफिक डिजाइनर (Graphic Designer) से किसान बने बप्पा राव अथोटा (Baparao Athota) की।

वह आंध्र प्रदेश में चावल की ऑर्गैनिक खेती (Organic Farming) में लगातार नए-नए अविष्कार कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में चावल मुख्य आहार है। यहाँ किसान हर साल उत्पादन बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा कीटनाशक और यूरिया के उपयोग पर डिपेंड हो चुके थे। इस कारण इलाके में स्वास्थ्य परेशान में भी बढ़ोतरी दिखाई दे रही थी।

21वीं सदी और साल 2020, आजादी के 73 साल बाद जब देश की युवा पीढ़ी मोबाइल और वीडियो गेम में अपना समय बर्बाद कर गर्दन झुकाए अपने आपको बेरोजगार की ओर ढकेल रही है। आधुनिकता का वह युग जो आने वाले एक-एक पल में टेक्नोलॉजी और रोबोट लाइफस्टाइल की संभावना दिखाता है।

जब हमारे देश की युवा पीढ़ी दो मिनट की मैगी जैसे फास्ट फूड पर अपनी दिनचर्या गुजारने को बेवश गये। तो ऐसे में क्या कोई विचार कर सकता है कि कॉर्पोरेट सेक्टर की एक हाई प्रोफाइल नौकरी छोड़ कोई इंसान धोती कुर्ता (Dhoti Kurta) पहनने वाला फुल टाइम किसान बन जाए, वह भी कोई ऐसा-वैसा किसान नहीं बल्कि जींस-टीशर्ट जैसे विदेशी परिधानों को पूरी तरह त्याग स्वदेशी खादी कपड़े पहनने वाला सच्चा देशभक्त किसान। आज हम एक ऐसे ही अनोखे किसान की कहानी आपको बताएंगे।

कौन है बप्पा राव

यह कहानी है ग्राफिक डिजाइनर से किसान बने बप्पा राव अथोटा की। वह आंध्र प्रदेश में चावल की ऑर्गैनिक खेती (Organic Kheti) में लगातार नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। लोगों को जब युवा किसान बप्पा राव (Kisan Baparao) के बारे में पता चला, जो बिना किसी प्रकार के रसायनों के प्रयोग से धान उगा रहे हैं। यह नौजवान किसान (Young Famer) देश में पारंपरिक तरीकों से खेती के तरीकों को ट्रेंड में ले आया है।

राव ज्यादा उत्पादन करने के चक्कर में न पड़ते हुए मिट्टी को समृद्ध बनाने और पौष्टिक अनाज उगाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। चावल के अलावा राव, ज्वार, गेंहू और सरसों की खेती भी करते हैं। छोटे से गांव अथोटा में चावल की ऑर्गैनिक खेती से बप्पा राव (Baparao) ने किसानों में एक नई ऊर्जा पैदा कर दी।

राव ने यह साबित कर दिया है कि भारत की मिट्टी आज भी सोना उगाने को तैयार है। ऑर्गैनिक खेती से लाखों का टर्न ओवर और चावल (Rice) की करीब 200 किस्में उगाने वाले बप्पा राव सैकड़ों किसानों की प्रेरणा हैं। वह अपने नाम के साथ गांव का नाम अथोटा जाति के तौर पर लगाते हैं।

ट्रैक्टर चलाते बप्पा राव

बप्पा राव बताते हैं, खेती किसानी उन्हें विरासत में मिली है। उनके दादा और पिता किसान रहे हैं। पर अपनी शुरुआती जिंदगी में उन्होंने पढ़ाई के लिए इंजीनियरिंग को चुना। पहले उन्होंने पढ़ाई को ज्यादा महत्व दिया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह हैदराबाद की एक कार्पोरेट कंपनी में ग्राफिक डिजाइनर के पद पर नोकरी करने लगे। सब ठीक चल रहा था, लेकिन साल 2010 में उनकी दादी की तबियत अच्छी नही रहने लगी।

उन्हें बड़ी समस्या ने अपना शिकार बना लिया था, उनको कैंसर होगया था और डॉक्टरों ने इस कैंसर की सबसे बड़ी वजह खेती में उपयोग हो रहे केमिकल और पेस्टिसाइड को बताया। राव दादी से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उन्हें दादी की बीमारी और उनके गुजर जाने का गहरा सदमा पहुंचा। इतना कि उन्होंने देश के लिए शुद्ध, अन्न, जल और हवा का चिंतन करना प्रारम्भ कर दिया।

इस घटना के बाद राव ने ऑर्गैनिक खेती में उतरने की जिद बना ली। राव कहते हैं, मैं दादी के बेहद करीब था, कैंसर से दादी ने दम तोड़ दिया। मेरे ऊपर दुखो का पहाड़ तुड़ गया था। मैं बहुत निराश महसूस करने लगा। डॉक्टर ने बड़ी नफरत भरी नजरों से हमें देखा और बताया खाने में केमिकल, पेस्टिसाइड के कारण यह बीमारी बहुत बढ़ गई।

हम किसान परिवार से हैं, इसलिए डॉक्टर का इशारा हमारे ऊपर ही था। मुझे अहसास हुआ शायद किसान होकर हम अपने हाथों ही ज़हर उगाकर खा रहे हैं। उस समय मेरी पत्नी प्रेग्नेंट थीं। अपने बच्चे के भविष्य के लिए शुद्ध भोजन और हवा, इन दो जरूरतों ने मुझे बेचैन कर दिया। मुझे सोचने में मजबूर कर दिया कि खेती ही हमे स्वास्थ्य शरीर प्रदान कर सकती, शर्त है उसके साथ कोई छेड़ छाड़ ना करे।

बप्पा राव का परिवार

इसके अलावा राव के लिए दूसरी बड़ी प्रेरणा भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता, आयुर्वेद के प्रवर्तक और स्वदेशी के बड़े हिमायती राजीव दीक्षित के विचार भी रहे हैं। ऑर्गैनिक खेती के क्षेत्र में आने के लिए वह प्राकृतिक कृषि के लिए देश के सुप्रसिद्ध चिंतक, लेखक और किसान सुभाष पालेकर से काफी प्रभावित हुए। यूट्यूब पर इनके वीडियोज देख उन्होंने स्वदेशी और ऑर्गैनिक फॉर्मिंग को अपना लक्ष्य बना लिया और जींस-टीशर्ट और विदेशी वस्त्र त्याग दिए।

फैसले का परिवार वालो ने विरोध किया

राव ने परिवार के लिए ही नहीं बल्कि देश को शुद्ध अनाज और वातावरण देने की सोच के कारण खेती को अपना लक्ष्य बना लिया। देश के भविष्य की चिंता में राव का मन नौकरी में नही लग रहा था, उनको कुछ अधूरा सा महसूस हो रहा था। शहर की रंगत उनको नही भा रही थी। राव के लिए यह एक ट्रिगर वॉर्निंग थी, लेकिन आज के समय में कंप्यूटर-लैपटॉप छोड़ हल और ट्रैक्टर चलाने को करियर बनाना उनके लिए इजी नहीं रहा।

नौकरी छोड़ने के उनके फैसले का लोगों ने मजाक उड़ाया। लोग उनके फैसले को गलत बताने लगे थे। यहां तक कि पिता और बाकी परिवार भी उनके फैसले का विरोध करने लगे। पिता नहीं चाहते थे बेटा देसी-देहाती बने। लेको बेटे को तो देसी जिंदगी ही पसन्द थी।

राव को खेती में उतरने के फैसले पर उनको ताने देने लगे, उनको सभी लोगो के ताने का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नही मानी अपने फैसले पर डटे रहे। उनके दिमाग में साधारण खेती नहीं थी बल्कि पूर्णत स्वदेशी और इम्यूनिटी बढ़ाने वाले अनाज उगाने के इनोवेटिव विचार भी थे। साल 2016 में राव नौकरी छोड़ अपने गांव लौट आये और खेती करने लगे।

साथी किसानों के साथ जायजा लेते बप्पा राव

रास्ते में आने वाली मुश्किलों पर बात करते हुए राव ने बताया, पहले साल में बहुत सारी परेशानी सामने आई। परेशानीयो को हल करते हुए आगे बढ़ते चले गये। उनके परिवार या गांव में किसी को भी अर्गैनिक फॉर्मिंग के बारे में कुछ भी जानकारी नही थी। यहां तक कि एग्रीकल्चर में बीएससी ग्रेजुएट दोस्त उन्हें बिना रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों के खेती करने के बारे कोई जानकारी भी नही दे सके।

उनको ऑर्गनिक खेती के बारे में कुछ नही पता था। उन्होंने कई तरह के किसानों से मुलाकात करके खुद ही अर्गैनिक फॉर्मिंग पर रिसर्च करने लगे। इसके बाद राव ने अपने खेत की जमीन पर धान और अन्य खाद्य फसलों की अर्गैनिक फॉर्मिंग करना प्रारंभ कर दिया।

लोग भूल गए हैं भारत किसानों का देश

इस पूरे प्रोसेस में उन्हें मालूम पड़ा कि देश के किसानों को यूरिया, उर्वरक, कीटनाशक और रासायनों (fertilisers, insecticides or chemical aids) का उपयोग इसलिए करना पड़ता है, क्योंकि वो विदेशी फसलों को महत्व दे रहे उन्हें उगा रहे हैं। लोग भूल गए हैं, भारत किसानों का देश हैं। देश की पारंपरिक भारतीय कृषि पद्धतियां शुद्ध भोजन देने वाली हैं।

बप्पा राव के मुताबिक भारत में 1 लाख 10,000 से ज्यादा चावल की देसी किस्में पहले से ही उपस्थित हैं, वहीं मिट्टी भी काफी उपजाऊ है। मिट्टी को वास्तव में कई तरह के कीटनाशकों की जरूरत होती ही नहीं है। उनका मानना है जमीन में मौजूद कीड़े किसान के सबसे अच्छे दोस्त हैं। केंचुओं ने न केवल उनकी फसलों को बेहतर बनाने में हेल्प की बल्कि जल स्तर को भी अच्छा बनाया है।

स्वदेशी बीजों का उपयोग

ऑर्गेनिक फार्मिंग की शिफ्टिंग (Shifting To Organic Farming) के पहले साल में उन्होंने अपनी आम उपज का बहुत कम मुनाफा हुआ। अगले साल उसकी उपज पिछली उपज से 80% तक पहुंच गई। तीसरे साल में वह अपनी सामान्य उपज तक पहुंच गए और चौथे साल में वह उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से होने वाले उत्पादन के आंकड़ों को पार करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। इसका मूल कारण स्वदेशी बीजों का उपयोग भी था।

देश के भविष्य को उज्जवल बनाने में जी जान से जुटे इस स्वदेशी किसान को राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नहीं मिली है। उन्हें राज्य सरकार द्वारा भी किसी सम्मान से नहीं नवाजा गया। बप्पा राव अथोटा को इस बात का अफसोस भी नहीं वह अपना कर्म किए जाने में भरोसा रखते हैं। पिछले समय में सिर्फ खेती में जुटे रहने के बाद अब वह एक किसान समुदाय शुरू करने की प्लानिग कर रहे हैं। जिससे अर्गैनिक फॉर्मिंग, बीज भंडारण और खेती में नए-नए उपयोग कर उसपर खुलकर जानकारी एकत्रित की जा सके।

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