छोटे गांव की चौथी पास महिला ने बनाई अपनी पहचान, 300 रु से 20 लाख तक की सफलता पाई, जानिए कैसे

0
6515
Pabiben Rabari Story
A Kutch Woman Pabiben Incredible Story in Hindi. A Lady Who Took Rabari Embroidery To The World. Pabiben Rabari, An Entrepreneur from Kutch.

File Photo Credits: Twitter

Ahmedabad: समाज में महिलाओं का भी उतना ही महत्व है जितना कि पुरुषों का। महिलाएं एक प्रगतिशील राष्ट्र की रीढ़ की हड्डी होती है। घर को साफ-सुथरा और सुरक्षित रखने से लेकर कार्यस्थल पर उत्कृष्ट परिणाम दिखाने तक, एक महिला यह सब कर सकती है। उनकी योग्यताओं को उनके लिंग के आधार पर कम आंकने की गलती नहीं किया जाना चाहिए।

उन्हें अपनी प्रतिभा दर्शाने का समान मौका दिया जाना चाहिए। आज की कहानी ऐसी ही एक प्रोत्साहित कर देने वाली महिला की है जिन्होंने धागों से कढ़ाई करके कई महिला कारीगरों के जिन्दगी में बदलाव लाया है।

पाबिबेन (Pabiben) कच्छ (Kutch) के अंजार तालुका (Anjar Taluka) के एक ग्राम भदरोई (Bhadroi) से आती हैं। जब वे 5 साल की थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया। उस वक़्त उनकी माँ को तीसरा बच्चा होने वाला था और एसी अवस्था में वह अपने बच्चों का पेट भरने के लिए मजदूरी भी करती थीं। पाबिबेन को अपनी माँ के परिश्रम, को समझने में अधिक समय नहीं लगा।

पाबिबेन (Pabiben Rabari) बताती है कि मेने चौथी कक्षा के बाद पढ़ाई करना छोड़ दिया, क्योंकि इससे अधिक शिक्षा प्राप्त करने लायक हमारी अर्थिक स्थिति नहीं थी। जब दस वर्ष की हुई, तो मैं भी अपनी माँ के साथ लोगों के घर जाकर काम करने लगी हमे घर में पानी भरने का काम दिया जाता था, जिसके हमे एक रुपये मिलते थे।

कुछ वक़्त बाद माँ से पारंपरिक कढ़ाई (Traditional Embroidery) सीखी

पाबिबेन जब 18 साल की थीं तब उनका विवाह कर दी गया और यहीं से उनके जिंदगी में परिवर्तन प्रारंभ हुआ। कुछ विदेशी भी उनका विवाह देखने आये। उन्होंने उनके द्वारा निर्मित बैग्स देखे, उन्हें वे बेहद पसंद आये। पाबिबेन ने उन्हें भेट के तौर पर यह बैग देने का निश्चय किया।

जो बैग (Bags) वे लेकर गए उन्हें पाबी बैग (Pabi Bag) के नाम से लोकप्रिय हुए और कुछ समय बाद में यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिट हो गया। पाबिबेन ने बताया कि उनके पति भी उनके कार्य की प्रसंसा करते हैं और उन्हें ग्राम की महिलाओं के लिए अच्छा करने के लिए प्रेरित भी करते हैं।

पांच वर्ष के बाद पाबिबेन ने एक और कदम उठाया। उन्होंने प्रदर्शनियों में हिस्सा लेना प्रारंभ किया और अपने कौशल को और भी निखारा। कुछ वक़्त के बाद उन्होंने ग्राम की औरतो के साथ मिलकर काम प्रारंभ किया और फिर पाबिबेन डॉट कॉम (Pabiben.com) का जन्म हुआ। उनका पहला आर्डर 70,000 रूपये का था, जो अहमदाबाद (Ahmedabad) में कहीं से मिला था। बाद में उन्हें गुजरात सरकार की ओर से भी अनुदान मिला।

आज पाबिबेन की टीम में 60 महिलाएं कारीगर के तौर पर काम कर रही हैं और वे तकरीबन 25 प्रकार की डिज़ाइन बनाती हैं। उनकी वेबसाइट का कारोबार 20 लाख रूपये का है। उन्हें 2016 में ग्रामीण उधमीय के लिए जानकी देवी बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here