अनोखा शिव मंदिर, जंहा आज भी इंजीनियरों की सोच फेल है, औरंगजेब के हजारो सैनिक भी तोड़ नही पाए।

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Kailash Cave Temple
World Heritage Monument Kailash cave temple at Ellora, Aurangabad Maharashtra. This rock-cave Kailash temple is the largest monolithic structure in the world. An amazing prototype model b4 d actual Kailash Temple was built.

File Image Credits: Twitter

Delhi: भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे मंदिर हैं, जो अपने इतिहास और अपनी प्रचीन परंपराओं के साथ अपनी वास्तुकला के लिए भी दुनिया मे पहचाने जाते हैं। इन मंदिरों की वास्तुकला कुछ ऐसी डिजाइन है, जो आज भी नवीन तकनीकी और विज्ञान की सुविधाओं के बाद भी इस प्रकार की वास्तुकला को हकीकत में उतार पाना मुमकिन नही है। जिस सोच से इन मंदिर को डिजाइन किया जाता है, उसके बारे में कोई तर्क नही दिया जा सकता।

हिंदू धर्म में भगवान और मंदिरों (Temples) का अपने मे आपमे विशेष महत्व होता है। हर मंदिर किसी ना किसी बात को लेकर सुर्खियों में बना रहता है फिर चाहे मंदिर की डिजाइन हो या वास्तुकला। ऐसा माना जाता है कि भगवान ही इस सृष्टि का संचालन करते हैं। उनकी ही इच्छा से धरती पर सबकुछ सम्भव होता है।

वैसे तो हिंदू धर्म की मान्यता है कि भगवान हर जगह मौजूद किसी ना किसी रूप में मौजूद रहते हैं, लेकिन भारत की संस्कृति ऐसी है कि यहां जगह-जगह आपको अलग-अलग देवताओं के मंदिर देखने को मिल जाएंगे। ऐसा कई शताब्दी से चला आ रहा है कि लोग अपनी श्रद्धा से मंदिरों का निर्माण करवाते हैं।

भक्तों द्वारा बनाए गए श‍िवजी के मंद‍िरों के बारे में तो आपने बहुत सुना होगा, लेक‍िन आज हम आपको एक ऐसे अनोखे श‍िव मंद‍िर के बारे में बता रहे हैं। इस मंदिर की मान्‍यता है क‍ि इसे पारलौक‍िक शक्तियों ने बनाया है। यह एलोरा (Ellora) का कैलाश मंद‍िर है, जो क‍ि औरंगाबाद (Aurangabad) में केव नं 13 में है। यह मंद‍िर अत्‍यंत व‍िशाल और अद्भुत है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा क‍ि इस मंद‍िर का न‍िर्माण एक बड़े पहाड़ को ऊपर से नीचे की ओर तराशते हुए क‍िया गया है। जो क‍ि आज के युग में भी सम्भव नही लगता है। मंद‍िर के न‍िर्माण समय से लेकर आज तक रहस्‍य बरकरार है। इस मंद‍िर का ऐसा रहस्‍य है जंहा व‍िज्ञान भी इस मंद‍िर की गुत्थियां नहीं सुलझाने में असमर्थ है।

कहा जाता है कि इस प्रकार का मंदिर भारत मे एक ही है, जो महाराष्ट्र के औरंगाबाद की एलोरा की गुफाओं में। यह मंदिर मात्र एक चट्टान को काटकर और तराशकर बनाया गया है। एलोरा के कैलाश मंदिर (Kailash cave temple) जिसे बनाने में मात्र 18 वर्षों का वक्त लगा। लेकिन जिस तरीके से यह मंदिर डिजाइन किया गया, उसको देखकर अनुमान लगाया जाता है कि इसके निर्माण में लगभग 100-150 सालों का समय लगना चाहिए।

276 फीट लंबे और, 154 फीट चौड़े इस मंदिर की खास बात ये है कि इसे केवल एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया है। यह मंदिर दो या तीन मंजिला इमारत के बराबर है। बताया जाता है कि इस मंदिर के निर्माण (Construction) में जिस चट्टान का इस्तेमाल किया गया था उसका वजन करीब 40 हजार टन था।

यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने वाले भक्त को वैसा ही फल मिलता है, जैसे कैलाश पर्वत के दर्शन पर जाने पर। इसलिए जो लोग कैलाश नहीं जा पाते हैं, वे यहां दर्शन के लिए आते हैं।

इस मंदिर में शिव भक्तों का तांता लगा रहता है

इस अद्भुत शिव धाम को बनने में लगभग 100 साल से ज्यादा का वक्त लगा। इसके निर्माण कार्य की शुरुआत मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण प्रथम 757-783 ई ने शुरु करवाया था। इसे बनाने में करीब 7000 मजदूरों ने दिन-रात काम कड़ी मेहनत करके बनाया था।

इस मंदिर में देश-विदेश से सैकड़ों शिव भक्त दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यहां एक भी पुजारी नहीं है। आज तक कभी पूजा नहीं हुई। यूनेस्को ने 1983 में ही इस जगह को ‘विश्व विरासत स्थल’ घोषित किया है। कैलास मंदिर संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण प्रथम 757-783 ई में निर्मित कराया था। यह एलोरा जिला औरंगाबाद स्थित लयण-श्रृंखला में है।

इस मंदिर को बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे द्रविड़ शैली का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में 276 फीट लम्बा, 154 फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत 40 हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया।

इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी, जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं।

यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है

मंदिर भगवान शिव जी (Bhagwan Shiva Ji) का है। कुछ वैज्ञानिक इस मंदिर को 1900 साल पुराना मानते हैं। और कुछ वैज्ञानिक तो इस मंदिर को 6000 साल से भी पुराना मानते हैं। सबसे ज्यादा हैरानी वाली बात तो यह है कि इस रहस्यमयी मंदिर को ईटो और पत्थरों से जोड़ कर नहीं बनाया गया, बल्कि सिर्फ एक ही पत्थर को तोड़ कर इस मंदिर का निर्माण किया गया है। यानी एक बहुत ही बड़ा मंदिर सिर्फ एक पत्थर को तराश कर बनाया गया है।

कहा जाता है कि यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है

कैलाश मंदिर (Kailash Temple) को हिमालय के कैलाश का रूप देने का भरपूर प्रयास किया गया है। शिव का यह दो मंजिला मंदिर पर्वत चट्टानों को काटकर बनाया है। यह मंदिर दुनिया भर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर में आज तक कभी पूजा हुई हो, इसका कोई साक्ष्य नहीं मिलता। यहां आज भी कोई पुजारी नहीं है।

इस मंदिर ने निर्माण के बाद से विभिन्न युग और शासक देखें है। हिन्दू मंदिरों के दुश्मन के नाम से कुख्यात मुगल शासक औरंगजेब का कहर इस मंदिर पर भी पड़ा। हिन्दू चिन्हों को क्षति पहुंचाने वाले इस शासक ने मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया था। लेकिन वह अपने इस कार्य में सफल नहीं हो सका।

औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने के लिए एक हजार सैनिक लगाए थे, जिन्होंने तीन सालों तक लगातार खुदाई कर इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हो सकें। हालांकि उसने मंदिर की नक्काशी और मूर्तियों को ही क्षति पहुंचा पाया।

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