
Mysore: इस साबुन को बनाने का श्रेय मेसूर के शाही परिवार (Mysore Royal Family) को जाता है। यहां के उस समय के शासक कृष्ण राजा वोडियार चतुर्थ (King Krishna Raja Wodeyar) और दीवान मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (M Visvesvaraya) ने मई 1916 में चंदन की लकड़ी से तेल निकालने वाली मशीनों का मंगवाया और फिर एक कारखाना बनवाया। असल में इस सोच का कारण ये था कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चंदन का व्यापार (Chandan Business) थम गया था, जिसकी वजह से मैसूर से चंदन (Mysore Chandan) की लकड़ियों का विदेश जाना बंद हो गया।
व्यापार की नीतियां तो इससे प्रभावित हुईं ही, साथ ही व्यापार के कई मार्ग युद्ध के पश्चात सुरक्षित नहीं रह गए थे। ऐसे में मैसूर में लगातार चंदन की लकड़ियों का अंबार लग रहा था। चंदन के जो जंगल थे, वो तो थे, परन्तु उस समय मैसूर में पूरी दुनिया में सर्वाधिक चंदन का उत्पादन होता था। इसी दौरान राजा वोडियार को एक युक्ति सूझी कि चंदन की लकड़ियों से तेल निकालकर उसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
पहला योजना तेल के उपयोग का था पर इसकी खपत होगी या नहीं, यह कहना कठिन था। इसी बीच उनके ही महल के कर्मचारियों ने अपने महाराज के लिए चंदन तेल से नहाने की व्यवस्था की अब यह सिलसिला शुरू हो गया। कुछ समय बाद तेल साबुन (Mysore Chandan Soap) में बदला गया। महाराज अब रोजाना चंदन के तेल से बने साबुन से स्नान करने लगे।
इसी दौरान उन्हें विचार आया कि जो साबुन वे खुद अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, वह जनता भी तो इस्तेमाल कर सकती है। उन्होंने अपना विचार दीवान मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (Sir Mokshagundam Visvesvaraya) के साथ साझा किया और फिर कार्य शुरू हुआ सैंडल सोप (Mysore Sandal Soap) बनाने का। विश्वेश्वरैया ने ऐसे साबुन की परिकल्पना की जो खारा हो और सस्ता भी रहे।
उन्होंने बॉम्बे के तकनीकी विशेषज्ञों को निमंत्रण दिया इसके बाद भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के परिसर में साबुन के निर्माण की प्रयोगों की व्यवस्था की कई। कमाल की बात तो ये है कि आईआईएससी की स्थापना भी मैसूर के एक और दिग्गज दीवान के। शेषाद्री अय्यर की मेहनत के कारण हुई थी।
शुरू हुआ साबुन बनने का सिलसिला
साबुन बनाने की तरीके के लिए औद्योगिक रसायनज्ञ सोसले गरलापुरी शास्त्री, जिन्हें ‘साबुन शास्त्री’ (Sabun Sashtri) भी कहते है, को स्मरण किया गया। वे साबुन बनाने की तकनीक जानने इंग्लैंड पहुंचे। वहां से आकर उन्होंने महाराजा वोडियार चतुर्थ और दीवान से मुलाकात की और फिर बेंगलुरु में कारखाना बनवाया गया। सन 1916 में मैसूर सैंडल सोप (Mysore Sandal Soap) आम जनता के बीच पहुंचा।
I still have collection of free spoons from Chandrika Soap from childhood. And I still remember the fragrance of that awesome oval bar Mysore Sandal Soap. Try these guys.#BeVocalForLocal pic.twitter.com/6cwGSfTIQi
— 𝚂𝚞𝚍𝚑𝚒𝚛🏌️♂️🇮🇳 (@seriousfunnyguy) May 12, 2020
यह शाही साबुन जैसे ही बाजारों में आया, और फटा फट ब्रिक हो गई साबुन में असली चंदन (Real Chandan) के तेल का इस्तेमाल होना और फिर इसके शाही घराने से ताल्लुक ने साबुन को और भी प्रसिद्ध बना दिया। देखते ही देखते साबुन का व्यापार कर्नाटक से निकलकर पूरे देश में फैल गया।
There are soaps and there is the Mysore Sandal Soap. Such a relief to know that somethings in this world remain constant – the lovely artwork, the quaint round shape, and above all, the fragrance pic.twitter.com/4ojNgRn3XW
— shubhra gupta (@shubhragupta) July 23, 2021
साल 1944 में, शिवमोगा में एक और साखा की स्थापना की गई। साबुन के साथ ही चंदन के तेल से इत्र भी बनाया जाने लगा। उस समय साबुन आम तौर पर चौकोर या गोल होते थे, पर सैंडल सोप को अंडाकार बनाया गया। साबुन शास्त्री ने सोप का प्रचार करने के लिए भी रिसर्च किया।
Mysore Sandal Soap ad 1941 pic.twitter.com/TeCR8QfDXy
— vktkv (@Vktkv) September 22, 2019
उन्होंने देखा कि महिलाएं अपने आभूषण चोकोर डिब्बों में रखती हैं, इसलिए उन्होंने साबुन के कवर को चौकोर बनाया। कंपनी के लोगों के लिए उन्होंने, शराबा (स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार एक हाथी के सिर और शेर के शरीर से बना एक पौराणिक प्राणी) को चुना था, जो साहस और ज्ञान का प्रतीक था और शास्त्री चाहते थे कि यह राज्य की समृद्ध विरासत का प्रतीक हो। सोप के डिब्बे पर ‘श्रीगंधा तवरिनिंडा’ का संदेश मुद्रित किया गया, जिसका अर्थ है-चंदन के मातृ गृह से।
पूरे देश में छा गई चंदन की खुशबू
मैसूर सैंडल सोप को शाही घरानों ने भी हाथों हाथ लिया, क्योंकि इस सोप के साथ मैसूर के शाही परिवार का नाम भी जुड़ा हुआ था। 1980 में, मैसूर और शिवमोगा की तेल निकालने वाली शाखाओं को एक साथ मिलाकर, कर्नाटक साबुन और डिटर्जेंट लिमिटेड नाम के एक कंपनी में शामिल कर इससे व्यापार को विस्तार दिया।



