4500 साल पहले विदेशी अधपके मांस खाते, तब भारतीय पौष्टिक लड्डू खाते थे: यहाँ खुदाई में मिले

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Harappa Laddoo News
Harappan people ate multigrain, high-protein laddoos. These 'laddoos', used them in rituals an Pujan on the banks of River Saraswati, says new ASI study.

Photo Credits: Twitter

Bijnor: एक अध्ययन में सामने आया है कि लगभग 4000 साल पहले जब हड़प्पा सभ्यता के दौरान रहने वाले लोग उच्च प्रोटीन, मल्टीग्रेन ‘लड्डू’ (Laddoo) का सेवन किया करते थे। राजस्थान में खुदाई के दौरान मिली सामग्री के वैज्ञानिक अध्ययन से यह बात अब जाकर सामने आई है। पश्चिमी राजस्थान के बिजनौर में एक हड़प्पा पुरातात्विक स्थल की खुदाई के समय सात ‘लड्डू’ (Laddu) मिले थे।

राजस्थान (Rajasthan) में एक हड़प्पा स्थल बिजनौर (Harappa Site Bijnor) नामक जगह में मिली सामग्री पर हुए एक नए वैज्ञानिक अनुंधानों के अनुसार, हड़प्पा के लोग लगभग 4,000 साल पहले उच्च प्रोटीन वाले “लड्डू” (Laddoos) का सेवन किया करते थे। अध्ययन संयुक्त रूप से बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), लखनऊ और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), नई दिल्ली द्वारा आयोजित किया गया था।

विज्ञान की बाकी की जानकारी के लिए विश्व प्रसिद्ध प्रकाशक एल्सेवियर द्वारा ‘जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस: रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित किया भी गया था। अध्ययन इस ओर भी संकेत करता है कि ये “लड्डू” अब ख़तम हो रही सरस्वती नदी (Saraswati River) के तट पर किसी प्रकार की जगह का हिस्सा था।

बीएसआईपी के लिए कार्य करने वाले एक वैज्ञानिक, राजेश अग्निहोत्री ने कहा, राजस्थान के अनूपगढ़ के बिजनौर में हड़प्पा स्थल पर एएसआई द्वारा सात समान बड़े आकार के भूरे रंग के ‘लड्डू’, बैलों की दो मूर्तियाँ एवं एक हाथ से पकड़े हुए तांबे की अदज (कुल्हाड़ी के समान एक उपकरण, लकड़ी काटने या आकार देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है) की खुदाई करके निकाली गई है।

वैज्ञानिकों ने कहा, ये लड्डू, लगभग 2600 ईसा पूर्व (2600 BC) पुराने के है। अच्छी तरह से सभाले हुए पाए गए थे। क्योंकि एक कठोर संरचना इस तरह से गिर गई थी कि यह उनके ऊपर एक छत के रूप में कार्य कर रही थी। जो उन्हें कुचलने से रोक रही थी।

अगर वे टूट गए होते, तो ‘लड्डू’ (Harappa Civilization Laddoo) पूरी तरह से सड़ जाते। परन्तु ये मिट्टी के संपर्क में थे, इसलिए कुछ आंतरिक कार्बनिक पदार्थ और अन्य हरे घटक सुरक्षित रह गए। लड्डू (A type of sweet) के बारे में सबसे अजीब पहलू बैंगनी रंग का घोल था, जो पानी के संपर्क में आने से बनता था।

2017 में ASI द्वारा लड्डू के नमूनों की खुदाई की गई थी और वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए बीएसआईपी को सौंप दिए गए थे। बीएसआईपी वैज्ञानिक राजेश अग्निहोत्री आगे बताते हैं, पहले, हमने सोचा था कि घग्गर (तत्कालीन सरस्वती) के तट के पास खोदे गए इन लड्डुओं का गुप्त गतिविधियों से कुछ संबंध भी था। क्योंकि मूर्तियाँ और अदज भी आस पास में पाए गए थे।

हम उनके आकार और प्रकार से आश्चर्य चकित थे, क्योंकि वे साफ रूप से मानव निर्मित थे। इस जिज्ञासा ने हमें उनकी रचना का पता लगाने के लिए ओर प्रेरित किया। हमने शुरू में माना कि यह मांसाहारी भोजन भी हो सकता है।

हालांकि, बीएसआईपी के वरिष्ठ वैज्ञानिक अंजुम फारूकी के एक विश्लेषण से पता चला है कि ‘लड्डू’ जौ, गेहूं, चना और कुछ अन्य तिलहनों से बने होते हैं। अंजुम फारूकी ने कहा, इन लड्डू में अनाज और दालें थीं, और मूंग दाल सामग्री पर हावी थी। चूंकि हड़प्पा के लोग कृषक हुआ करते थे, इसलिए इन “लड्डू” की उच्च-प्रोटीन मल्टीग्रेन संरचना समझ में आती है।

बीएसआईपी और एएसआई दोनों के नौ वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह परिणाम निकाला कि सात लड्डू (Laddoo) के साथ-साथ विशिष्ट हड़प्पा उपकरण, वस्तुओं की उपस्थिति से संकेत मिलता है कि हड़प्पा (Harappa Civilization) के लोगों ने भोजन के पूरक के रूप में आवश्यक पोषण के लिए प्रसाद बनाया।

अनुष्ठान किया और बहु-पोषक कॉम्पैक्ट ‘लड्डू’ का सेवन किया। सात खाद्य गेंदों के आस-पास बैल की मूर्तियों, अदजे और एक हड़प्पा मुहर की उपस्थिति यह दिखाती है कि इंसान इन सभी वस्तुओं को उनकी उपयोगिता और महत्व के कारण सम्मानित करता है।

लड्डू (Laddu Of Harappa) की पुरातात्विक खोज बैल और तांबे की मूर्तियों के साथ मिलकर इस सुझाव को जन्म भी देती है कि हड़प्पा के लोग इन उपकरणों का उपयोग पूजन (Pujan in Harappa) करने के उद्देश्य से करते थे।

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