Gwalior, Madhya Pradesh: ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद मध्य प्रदेश में सियासी उठा-पठक जारी है। कांग्रेस का दामन छोड़ने के बाद अब साफ हो गया है कि सिंधिया भाजपा (BJP) का दामन थामेंगे। उनके मंगलवार शाम भाजपा में शामिल होने की अटकनें तेज थी, लेकिन बाद में खबर आई कि अब वह बुधवार को बीजेपी में शामिल होंगे। हालांकि देर शाम खबर यह भी आई कि सिंधिया 12-13 मार्च को BJP ज्वॉइन कर सकते हैं, लेकिन फिलहाल उनके भाजपा में शामिल होने की तारीख पर प्रश्न बना हुआ है।
मीडिया में आई खबर के अनुसार सिंधिया गुरुवार सुबह 12 मार्च को भाजपा में शामिल हो सकते हैं। सिंधिया मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता लेंगे, आज शिवराज सिंह चौहान भोपाल में हैं। सूत्रों की माने तो शिवराज सिंह आज रात दिल्ली आ सकते हैं। वहीं, सपा और बसपा के विधायकों ने शिवराज सिंह चौहान के घर जाकर उनसे मुलाकात की। खबर है कि वे दोनों भी भाजपा का दामन थाम सकते हैं।
अब तय हो गया है कि मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में कमलनाथ की सरकार गिर जाएगी। स्वयं कांग्रेस (Comgress) भी इस बात को मान रही है। जिस तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस निर्णय से मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरने जा रही है, कुछ वैसा ही कार्य 43 साल पहले उनकी दादी राजमाता विजयराजे सिंधिया (Rajmata Vijayaraje Scindia) ने भी किया था। उस वक़्त राजमाता विजयराजे सिंधिया ने कांग्रेस की तत्कालीन डीपी मिश्रा सरकार को गिरवा दिया था।
उस टाइम राजमाता विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ के विधायकों के सपोर्ट से गोविंद नारायण सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था। तब मध्य प्रदेश और देश के लोग ग्वालियर के सिंधिया राजघराने की ताकत का का लोहा मानने लगे थे। इसी घटना के बाद सिंधिया परिवार का कद भारतीय राजनीति में बढ़ गया था।
आपको बता दें की जब देश आजाद हुआ, तब तक ग्वालियर रियासत पर सिंधिया राजघराने (Scindia Royal Family) का शासन था। राज्य की बागडोर महाराजा जिवाजीराव सिंधिया के हांथो पर थी। देश की आजादी के कुछ समय बाद ग्वालियर रियासत का भी भारत में विलय हो गया। इसके बाद जिवाजी राव को भारत सरकार ने नए राज्य मध्य भारत का राज्य प्रमुख बनाया। वो इस राज्य के 1956 में मध्य प्रदेश में विलय किए जाने तक इसी पद पर रहे।
फिर सन 1961 में जिवाजी राव के निधन के बाद राजमाता विजयाराजे सिंधिया (Rajmata Vijayaraje Scindia) ने सिंधिया राजघराने की बागडोर अपने हांथो में ली। उस समय वो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर कांग्रेस में शामिल हुईं थी। किन्तु कुछ सालों बाद 1967 में कुछ कारणों और कांग्रेस की नीतियों के कारण उनका कांग्रेस से भरोसा उठ गया था।
Somewhere in the heaven
Rajmata Vijaya Raje Scindia ji
must be feeling very happy today. #JyotiradityaScindia pic.twitter.com/HlM2X4uw7s— Mahipalsinh dodiya (@mdbapuu) March 10, 2020
उस टाइम राजमाता विजयाराजे सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा से मिलने भोपाल गईं थीं। तब मिश्रा राजमाता विजयाराजे सिंधिया को कई बार ये अहसास करते रहे थे कि अब ताकत उनके हाथों में है। जब वो मुलाकात के लिए गईं तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मिश्रा ने उन्हें 10 से 15 मिनट तक इंतजार करा दिया था। राजमाता के लिए यह किसी अपमान से काम नहीं था। इस मुलाकात में उन्होंने छात्र आंदोलनकारियों पर पुलिस लाठीचार्ज पर नाराजगी जाहिर करते हुए वहां के एसपी को हटाने की मांग की। मुख्यमंत्री ने उनकी बात नहीं मानीं।
बस फिर क्या था, वापस आके राजमाता सिंधिया ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और जनसंघ के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा। इसके बाद वो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव भी लड़ीं थी। 1967 तक विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ होते रहे थे। इस दोनों ही चुनाव में राजमाता सिंधिया की जीत हुई थी। यह बात इंदिरा गाँधी को बहुत खटकी थी।
With Rajmata Vijayaraje Scindia grand son Jyotir Aditya Raje Scindia joining B.J.P… Her Soul will be surely in peace for homecoming in a party she founded alongside Shri Atal ji & Shri Advani ji.. pic.twitter.com/htgfcaQrZ2
— Vivek Rana (@VivekRa15274074) March 10, 2020
तब कांग्रेस पार्टी के 36 विधायक विपक्ष में बैठ गए थे। जिससे कांग्रेस की डीपी मिश्रा सरकार गिर गई। पहली बार मध्य प्रदेश के इतिहास में ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनी। इस जीत का ताज राजमाता सिंधियाको दिया गया। राजमाता की पसंद के गोविंद नारायण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बनाये गए। किन्तु दुर्भाग्य से यह सरकार सिर्फ 20 महीने में गिर गई थी। गोविंद नारायण सिंह फिर कांग्रेस में चले गए। इस सबके बाद मध्य प्रदेश में जनसंघ और विजयाराजे सिंधिया की ताकत और कद बहुत बढ़ गया।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया का क्रेज़ ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में बहुत अधिक था। इसके कारण 1971 में जब देश में इंदिरा गांधी की पूरे देश में लहर थी, उस वक़्त ग्वालियर क्षेत्र की तीन लोकसभा सीट राजमाता विजयाराजे सिंधिया और उनके करीबी जनसंघ उम्मीदवारों ने जीतीं थी। इसमें भिंड से स्वयं विजयाराजे सिंधिया जीतीं, तो गुना से उनके पुत्र माधवराव सिंधिया और ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी ने जीत हासिल की थी।
Never forget your roots. Rajmata was one of the founder member of Janasangh, who solds her ornaments for funding Jansangh. #JyotiradityaScindia pic.twitter.com/ng47NXfSyO
— LR SAHU 🇮🇳 (@lrsahu09) March 10, 2020
इसके बाद इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी के दौरान राजमाता को जेल में डलवा दिया और माधवराव सिंधिया पर दवाब बना कर जनसंघ छोड़कर कांग्रेस में शामिल करवा लिया था। इसके बाद राजमाता सिंधिया और इनके पुत्र माधवराव सिंधिया के बीच दूरिया हो गई थी और अलगाव भी हो गया था। राजमाता सिंधिया जब जेल से बाहर आई, तब भी माधवराव सिंधिया कांग्रेस के साथ ही रहे। तब माँ एयर बेटे में दूरिया आई।
फिर माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) भी करीब 18 सालों से कांग्रेस के साथ थे, लेकिन अब उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर उसी पथ पर चलने का फैसला किया है। जिस पर 43 पहले उनकी दादी राजमाता सिंधिया चल रही थी। राजमाता सिंधिया का जो अधूरा काम उनका बेटा माधवराव सिंधिया नहीं पूरा कर पाए, वो काम आज पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी दादी (Grandmother Vijayaraje Scindia) की स्टाइल में पूरा किया।




