देश को आज़ादी दिलाने आदिवासियों की फौज खड़ी करने वाले भारत माँ के उस गुमनाम लाल की कहानी

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Vasudev Balwant Phadke
All about Vasudev Balwant Phadke, the man who gave rise to the Indian armed struggle for freedom of India. He was Freedom Fighter.

Delhi: इस साल 15 अगस्‍त को हमारे देश ने अपने आजादी के 75 साल पूरे किए। देश की आजादी में लाखों क्रांतिकारियों ने अपनी जान गवाई। उनमे से बहुत से क्रातिकारी के विषय में हम अक्‍सर ही किसी आर्टिकल, अखबार या फिर बुक में पढते रहते है। लेकिन कुछ क्रांतिकारियों के नाम गुमनाम हो जाते है।

ऐसा ही एक गुमनाम क्रांतिकारी है, जिनका नाम वासुदेव बलवंत फड़के (Vasudev Balwant Phadke) है। उनके विषय में शायद ही आप जानकारी रखते होंगे। आज हम इन्‍हीं क्रातिकारी के विषय महत्‍वपूर्ण जानकारी लेकर आये है। जिसे जानने के बाद आप आजादी के इस मतवाले क्रांतिकारी को हमेशा याद रखेंगे। आइये जानते है वासुदेव बलवंत फड़के के विषय में।

आनंदमठ में है, क्रांतिकारी बलवंत जी का जिक्र

वासुदेव बलवंत फड़के जी को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ में पहला सशस्‍त्र बिद्रोह करने वाले संगठन के पहले क्रांतिकारी के रूप में जाना जाता है। बलवंत फड़के जी ने 1857 में हुये स्‍वतंत्रता संग्राम के विफल हो जाने के बाद आजादी की भावना को फिर से जगाने में अहम भूमिका निभाई थी। बंकिम चंद्र चटर्जी का नाम हम सभी बहुत से जानते है।

इन्‍होंने ही देश के राष्‍ट्रीय गीत बंदे मातरम की रचना की थी। इनकी प्रसिद्ध बुक आनंदमठ में वासुदेव बलवंत फडके जी के विषय में जानकारी दी गई है। इस बुक में बंकिम चद्र जी ने अंग्रेजी राज्‍य के समय में जेल में बंद होने वाले क्रांतिकारी बलवंत फड़के जी की कार्यशैली और उनसे जुड़ी महत्‍वपूर्ण कहानियों को मेंशन किया है।

अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह के लिए फौज तैयार की

वासुदेव बलवंत फड़के को “सशस्‍त्र क्रांति का पिता” कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि बलवंत फड़के जी ने गरीब युवाओं की फौज तैयार की थी। जो अंग्रेजी की गुलामी की जंजीरों का विरोध करती थी। यह फौज कई सालों तक अंग्रेजों के नाक में दम करती रही।

फड़के ने अपनी शिक्षा जब पूरी की तो उनके पिताजी उन्‍हें दुकान मे काम करने के लिए कहने लगे। परन्‍तु वह यह काम नहीं करना चाहते थे। इसलिए मुंबई आ गये। यहॉं आने के बाद खड़गे जी ने 1871 में अंग्रेजी कंपनी में काम किया। यहॉं पर काम करके के दौरान उन्‍होंने जंगल पर एक अभ्‍यास स्‍थल का निर्माण किया।

इस समय उनके साथ ज्‍योतिबा फुले तथा लोकमान्‍य तिलक जी भी थे। यही पर ही फड़के जी ने अपनी सेना बनानी शुरू कर दी थी। बलवंत जी की फौज में रामोशी, डांगर, तथा कोली जा‍ति के युवा थे। बलवंत जी को घुड़सवारी और कुश्‍ती का काफी शौक था।

मॉं कि मृत्‍यू के बाद गुलामी से मुक्‍ति का प्रण लिया

जब बलवंत फडके जी अंग्रजो की मिलिट्री डिपाटमेंट में अकाउंट्स की नौकरी कर रहे थे। उस समय उन्‍हें अपनी मॉं के बीमार होने की खबर लगी। लेकिन अंग्रेज अफसरों ने उन्‍हें अपने गॉव जाने से मना कर दिया। इसलिए बलवंत फड़के जी बिना छुट्टी लिये ही अपनी मॉं के पास आ गये। लेकिन जब तक वह अपने गॉंव पहुँचे, उनकी मॉं की मृत्‍यू हो गई थी।

जिसके बाद से ही बलवंत फड़के जी के मन में अंग्रजो की गुलामी के खिलाफ मुक्‍ति का प्रण लेने का विचार आया। इसी बीच बलवंत जी की मुलाकात लाहूजी वस्‍ताड साल्‍वे जी से हुई। उनसे मिलने के बाद ही फड़के जी की सेना बनाने और अंग्रेज हुकुमत के खिलाफ खड़े होने की सोच मजबूत हो गई।

अंग्रेज भी डरते थे बलवंत जी के नाम से

जब फड़के जी ने आदिवासियों की सेना बना ली तो सेना संगठित करने के बाद से ही उन्‍होंने अंगेज हुकुमत के खिलाफ विदोह की कोशिशे शुरू कर दी थी। 1879 में उन्‍होंने यह घोषणा कि वह अंग्रेजों के खिलाफ संगठित होंगे।

उन्‍होंने विद्रोह के लिए आवश्‍यक पैसों के इंतजाम के लिए डाके भी डाले। वासुदेव जी का प्रभाव उस समय महाराष्‍ट्र के 7 जिलों में था। इनका प्रभाव इतना अधिक था, कि अंग्रेज भी फड़के जी की गतिविधि से डरने लगे थे। अंग्रेज उनके नाम से थर थर कांपने लगे थे।

अंग्रेज अधिकारियों ने रखे थे उनपर कई ईनाम

उनके खौफ कि वजह से ही उनके ऊपर अंग्रेज अधिकारियों ने उनपर 50000 का इनाम रखा था। हालांकि अलग अलग स्‍त्रोंतो पर उनके इनाम की जानकारी अलग अलग है। कहीं 5000 तो कहीं 50 हजार बताया गया है।

इसी बीज फड़के जी के हस्‍ताक्षर के इश्‍तेहार मुबंई की गलियों में लगने लगे थे। इसलिए अंगेजों ने ऐलान किया कि अब जो भी रिचर्ड अफसर को मारने वाले फड़के को पकड़वायेगा उसे पूरे 75000 रूपये ईनाम में मिलेगा।

गदृदार के कारण पकड़े गये बलवंत जी

हैदराबाद के कमिश्‍नर अब्‍दुल हक तथा अंग्रेज मेजर डनियल उस समय फड़के जी की तलाश में यहॉं वहा भटक रहे थे। उसी समय एक गदृदार ने फड़के जी की जानकारी अग्रेज अधिकारी तथा हैदराबाद के निजाम के पुलिश अधिकारी को दे दी। चूँकि काफी समय से पुलिश अधिकारी फड़के जी की तलाश कर रहे थे।

ऐसे में उनके बहुत से साथी मारे गये थे। जब वह थक हार कर पंढरपुर रास्‍ते में पड़ने वाले मंदिर पर आराम कर रहे थे। उस समय ही गदृदार ने अंग्रेज मेजर डेनियल को इस बात की जानकारी दे दी। 20 जुलाई सन् 1879 को फड़के जी को गिरफ्तार कर लिया गया।

डायरी बनी अपराधसिद्धि का कारण

फड़के जी को पकड़कर जब कोर्ट में पेश किया गया, तो उस समय उनके खिलाफ कोई भी गवाह अंग्रेजो के पास में नहीं था। ऐसे में उनके खिलाफ अपराध सिद्ध कर पाना कोर्ट के लिए बहुत ही मुश्किल था। परन्‍तु बलवंत फड़के जी को अपने क्‍लर्क की नौकरी करने के दौरान एक आदत लग गई थी वह थी डायरी लिखने की। जिसमें वह अपने जीवन के हर महत्‍वपूर्ण बात को लिखा करते थे।

यही किताब उनके अपराध को सिद्ध करने का सबसे बड़ा हधियार बनी। इसमे फड़के जी ने लूट के साथ साथ अंगेजो को देश के बाहर खदेड़ने की सारी योजना भी लिखी थी। फड़के जी को अंग्रेज सिर्फ एक डाकू समझते थे। लेकिन उनकी डायरी पढ़ने के बाद वह दंग रह गये थे।

उनकी डायरी पढ़ने के बाद अंगेजो ने उन पर राजद्रोह का केस चलाया। जिसके अंतर्गत उन्‍हें काला पानी की सजा दी गई। काला पानी की सजा के लिए उन्‍हें अंडमान भेजा गया। अपनी कालापानी की सजा के दौरान ही वासुदेव बलवंत फड़के जी वीरगति को प्राप्‍त हो गये। 17 फरवरी सन् 1883 को देश के वीरसपूत ने दूनिया को अलविदा कह दिया।

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