22 साल की उम्र में IAS अफसर बनी फौजी की बेटी, इनके जज्बे को सराहते हुये ‘जनता की अधिकारी’ कहते है

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IAS Smitha Sabharwal
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File Photo Credits: Twitter

Delhi: आज महिला भी हर क्षेत्र में पुरुषों से कम नही है। सिविल सेवा परीक्षा (Civil Service Exam) में पुरुषों की तरह महिलाएं भी पीछे नहीं है। बहुत बार तो महिला अधिकारी अपने दबंग अंदाज और हटकर काम करने के अंदाज को लेकर अपनी पहचान बना लेती है। ऐसे ही बहुत सी महिला सिविल सेवक हैं, जिन पर हर देशवासी को फक्र है। ये वंडर महिला न सिर्फ अपने काम को लेकर बल्कि अफसर बनने के अपने संघर्ष को लेकर भी लोगों का सम्मान पाने से पीछे नही हटती हैं।

तेलांगना की एक ऐसी महिला अफसर हैं, जो उनको हर महिला से अलग बनाती है। जनता की अधिकारी नाम से फेमस है। उनके काम करने का अंदाज सबसे अलग है। देश की सबसे युवा आईएएस अधिकारी (IAS Officer) का खिताब भी उनको हासिल है। IAS-IPS सक्सेज स्टोरी (Success Story) में महज 22 साल की उम्र में अफसर बनीं स्मिता सभरवाल (Smitha Sabharwal) के संघर्ष की कहानी से रूबरू कराते है। संघर्ष तो हर किसी के जीवन मे होता है। जीवन संघर्षो से भरा हुआ है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

स्मिता सभरवाल जन्म-19 जून,1977 तेलंगाना कैडर में हुआ है। 2001 बैच की भारतीय प्रशासनिक अधिकारी हैं। वह लोगो में “पीपल्स ऑफिसर” नाम से भी लोकप्रिय हैं। वह पहली महिला आईएएस अधिकारी हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय में नियुक्त किया गया है। स्मिता का जन्म पश्चिम बंगाल में हुआ था। उनकी अधिकतर शिक्षा भारत के वभिन्न भागों में हुई। उनके पिता कर्नल प्रणब दास एक सेनानिवृत्त सेना अधिकारी थे, जों की भारतीय सेना में सेवा करते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा के आखरी दो साल सेट ऐन मार्रेद्पल्ली, हैदराबाद में बीते। बाद में उन्होंने सेंट फ्रांसिस डिग्री कॉलेज से वाणिज्य में ग्रेजुएशन की डिग्री की। वह संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करने वाली सबसे कम उम्र के अधिकारियो में शामिल हैं। उन्होंने सम्पूर्ण भारत में रस्थ्रिये स्टार पर चौथा स्थान हासिल किया और आईऐएस के लिए चयन किया।

उपलब्धि से भरा सफर

मसूरी की नेशनल अकादमी से प्रशासनिक प्रशिक्षण पूरा होने के बाद परिवीक्षाधीन दिनों के दौरान उन्हे आदिलाबाद जिले में प्रशिक्षण दिया गया। उनको अपना प्रथम स्वतंत्र प्रभार मदनपल्ली, चित्तूर के उप कलेक्टर के रूप में मिला था, जिससे उन्हें भूमि अधिग्रहैण प्रबंधन और जिला प्रशासन का अनुभव मिला।

इसके बाद उन्होंने ग्रामीण विकास क्षेत्र में बतौर परियोजना निदेशक, डीआरडीऐ (कडापा) में कार्य किया। वारंगल में नगर निगम आयुक्त के रूप में उन्होंने अपने कार्यकाल ले दौरान फण्ड योर सिटी नामक एक योजना प्रारंभ की जिसके तहत बड़ी संख्या में सार्वजानिक उपयोगिताएं जैसे ट्राफिक जंक्शन, फुट ओवर-ब्रिज, बस स्टैंड, उद्यान, आदि सार्वजानिक-निजी उनकी उपस्थिति में बनाये गए थे।

इसके बाद उन्होंने वाणिज्य कर, विशाखापट्नम में बतौर उपयुक्त पद संभाला और कुरनूल व हैदराबाद (Hyderabad) के संयुक्त कलेक्टर के रूप में भी सेवा की। साल 2011 में अप्रैल में उन्होंने जिला कलेक्टर के रूप में करीमनगर जिले में कार्यभार संभाला, जहाँ उन्होंने स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में विशेष सहयोग दिया। करीमनगर जिले को प्रधानमंत्री के 20 अंक कार्यक्रम के दौरान सर्वश्रेष्ट जिले से सम्मानित किया गया था।

मतदान प्रतिशत में इजाफा करने के लिए उन्होंने एक मतदान पंदुगा नामक एक योजना भी शुरू की थी। उन्हें लोगो के अधिकारी के रूप में भी पहचान मिली हैं और तकनीक के क्षेत्र में नवीनतम कार्यक्रमों का उपयोग, विशेष रूप से क्षेत्र में सरकारी कार्यक्रमों को लागू कराने के लिए जाना जाता हैं। स्काइप के जरिए सरकारी डॉक्टरों की निगरानी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में परिदृश्य को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए सॉफ्टवेयर के जरिये से सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन की निगरानी में करीमनगर और मेडक जिले अपने कार्यकाल के दौरान राज्य में शीर्ष स्थान बन चुके हैं।

पुरस्कार की रूपरेखा

भारतीय एक्सप्रेस देवी पुरस्कार 2013, ई-भारत(ई-स्वस्थ्य श्रेणी), सर्कार डिजिटल पहल 2013, सर्वश्रेष्ठ जिले के लिए मुख्यमंत्री का पुरस्कार(21 पॉइंट फ्लैगशिप पुरस्कार), 2011-12, प्लैटिनम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। एक बार स्मिता सभरवाल को लेकर एक मैग्जीन ‘आउटलुक’ (Outlook) ने आपत्तिजनक कार्टून और लेख भी लिखा था। इस लेख को पढ़ने के बाद यह उनको बहुत गुस्सा आया जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुचा था।

इस मैग्जीन में इस अफसर के लिए ‘आई कैंडी’ जैसे वर्ड का उपयोग किया गया था। उस समय उन्होंने कहा था कि मैंने बरसों तक सर्विस की है। लेख ने मुझे बहुत आहत किया है। सभी तरह की महिलाएं इस तरह की पीत पत्रकारिता का शिकार हो सकती हैं। हमें आगे आकर इसे रोकना होगा।
अपने दृढ़ संकल्प के साथ, माता-पिता के समर्थन के साथ, 2000 में UPSC में आ रही बाधा को अपनी मेहनत से समाप्त कर दिया। यह सबसे कम उम्र के IAS Officer की कहानी है।

बचपन से उनकी प्रशंसा करने से कोई नही चुकता, चाहे फिर शिक्षा ही क्यों ना हो। स्मिता (IAS Smitha Sabharwal) ने अपनी स्कूली शिक्षा सेंट एनन्स, मार्रेडपल्ली, हैदराबाद से की। पढ़ाई में शुरू से होशियार थी, हर चीज़ सीखने में उनकी रुचि थी कि पूरे भारत में 12वीं कक्षा में आईसीएसई बोर्ड में टॉप किया।

आसमान साफ थे और अभी भी बदलाव के कोई संकेत नहीं थे। स्मिता ने महिलाओं के लिए सेंट फ्रांसिस डिग्री कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक की पढ़ाई जारी रखी। इसके अलावा, इस IAS अधिकारी का कहना है कि जिस व्यक्ति ने वास्तव में उसे समाज में बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया, वह उनके पिता थे।

माता पिता ने बढ़ाया हौसला

अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद, स्मिता ने UPSC परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। हालाँकि, नियति ने उसके लिए कुछ और ही योजना बनाई थी। अपने पहले प्रयास में, वह अपना पहला राउंड क्लियर नहीं कर सकी। लेकिन इसने उसे न तो निराश किया और न ही हतोत्साहित किया। उन्होंने अपने होसलो को मजबूत बनाये रखा। परिवार ने भी उनका हौसला टूटने नही दिया। 2000 में, उन्होंने UPSC परीक्षाओं को पास किया, 23 साल की उम्र में उन्होंने अपनी IAS यात्रा शुरू की।

सफलता की कहानी

अन्य दोस्तो की तरह, स्मिता का सफर भी कठिन था, लेकिन वो हार मानने वालों में से नही थी। अपनी मंजिल को पाना ही उनका लक्ष्य था। वह अपने शिक्षा और उनके शौक के बीच एक उचित संतुलन बनाए रखने में विश्वास करती थीं। यह महसूस करने के बाद कि वह क्या करना चाहती है, स्मिता ने अपने हौसलों को मजबूत बनाया, कठिनाइयों से डरी नही, वह बिना किसी रुकावट के हर दिन छह घंटे पढ़ाई करती थी।

मन को शांत रखने के लिए, वह हर शाम कम से कम एक घंटे के लिए आउटडोर गेम्स में समय देती थी। वह अपने आपको समय के साथ अपडेट रखने के लिए दैनिक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का अध्ययन करती थी। हालांकि उनका विषय वाणिज्य पृष्ठभूमि से संबंधित था, लेकिन उन्होंने अपने वैकल्पिक विषयों के रूप में मानव विज्ञान और सार्वजनिक को चुना।

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