
Bengaluru: कुछ लोग गांव की मिट्टी को छोड़ शहर (City) में जाकर रहना चाहते है, वही रहकर जिंदगी गुजरना चाहते है। लेकिन उन सबसे भी हटकर कई लोग होते है, जो पूरी दुनिया घूमने के बाद अंत मे गांव में ही अपना बचा जीवन गुजरना चाहते है, गांव की हरियाली को अपनाकर उसके वातावरण में अपने आपको रंग कर गांव की दुनिया (Village Life) मे बस जाना चाहते है।
आज हम आपको एक ऐसे परिवार से मिलवा रहे हैं, जिन्होंने बेंगलुरु जैसे शहर को छोड़ मैंगलोर के पास एक गाँव में जाकर सुकून भरी जिंदगी बिता (Living In Village) रहे हैं। आज हम बात कर रहे हैं ज्वेन लोबो और अविन पाइस की। इस पति-पत्नी की अधिकतर ज़िंदगी बड़े शहरों मे बिताई है।
ज्वेन फैशन इंडस्ट्री में बतौर कंटेंट राइटर काम करती थीं, तो अविन IT कंसलटेंट हैं। दोनों पति-पत्नी ने ही कई वर्षो तक बड़े-बड़े शहरों में रहकर इंडस्ट्री में काम किया है। मैंगलोर आने से पहले वे लगभग 10 वर्षों तक बेंगलुरु में रहे। ज्वेन बताती है कि बचपन से ही उनकी दिली तमन्ना थी गाँव में रहने की।
वह हरियाली के बीच अपना आशियाना बनाना चाहती थीं। उनके पति भी उनकी इस तमन्ना को पूरा करने में उनके साथ है। इसलिए उन दोनों को जैसे ही अवसर मिला, उन्होंने अपनी इस दिली तमन्ना को साकार करने का निर्णय किया।
साकार किया सपना
पति-पत्नी बताते हैं कि उन्होंने कई वर्ष पहले से अपने इस दिली तमन्ना को आकार देने के लिए काम स्टार्ट कर दिया था। नौकरी के दौरान जब भी फ्री समय मिलता उसका सदुपयोग कर बेंगलुरु के आसपास खेतों, झीलों या उद्यानों में घूमने जाया करते थे। ऐसे लोगों से मिलते थे उनसे बात करते थे। उनके बारे में जानने की कोशिश करते थे जो इस तरह की जीवन शैली जी रहे हैं।
भागदौड़ भरी जिंदगी को दिया विराम
शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी जीने का कोई मज़ा नही था कोई शुकुन नही था। क्योंकि अधिकतर समय तो सिर्फ घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक ट्रेवलिंग में ही व्यर्थ हो जाता था। तब सोचकर लगता था कि हम किस तरह की जिंदगी गुजार रहे हैं।
हम अपने बच्चों के लिए ऐसी जिंदगी नहीं चाहते थे, जहाँ वे हमेशा किसी दौड़भाग में ही उलझे रहे परिवार के लिए समय ही ना निकाल पाये। उन्हें हर चीज के लिए दूसरों के साथ जोड़ा जाए। हम चाहते हैं कि वे लाइफ स्किल्स सीखें जिससे हर तरह की परेशानी का हल आसानी से निकाल सकें।
किसी बात की प्रतीक्षा क्यो करें
फिर एक दिन ज्वेन लोबो ने अविन पाईस से ससवाल किया क्या पता है कि हम 60 की उम्र तक जीवित रहेंगे? अगर जीवित रहे भी तो इस बात की क्या साक्ष्य है कि उसके बाद हम अपने सभी सपने पूरे करने में सक्षम होंगे, हम किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं? अविन ने बताता हैं, हम दोनों ने इस बारे में गहराई से चिंतन किया और निश्चय किया कि अगर अभी नहीं तो कभी नहीं। लेकिन एकदम से किसी गाँव में बस जाना ये भी सही नही होगा। पहले हमने एक साल के लिए वहां की चीज़ों को समझने की कोशिश की जिससे इस एक साल के अनुभव के आधार पर आखरी फैसला ले सकें।
दोस्त ने दिया साथ
साल 2018 में ज्वेन और अविन एक साल के लिए अपने दोस्त के मैंगलोर स्थित फार्म में रहने लगे। यहां पर उन्होंने एक शिपिंग कंटेनर को अपना रहना का आशियाना बनाया, जिसमें न तो 24 घंटे पानी की सप्लाई थी और न ही बिजली की सुविधा थी।
उन्होंने चूल्हे पर खाना बनाने के लिए ट्रेनिंग ली और थोड़े-बहुत खेती का प्रशिक्षण लिया। लेकिन एक साल बाद उन्हें अहसास हो गया कि वे फार्म पर कम से कम चीजों में अपनी जिंदगी आराम से जी सकते हैं। इसके बाद उन्होंने मूदबिद्री तालुका के एक गांव में एक फार्महाउस बनवाया। इस घर की खास बात यह है कि ये घर मिट्टी से बना है।
घर बना ख्वाहिश का महल
केवल 550 स्क्वायर फ़ीट स्थान में घर बनाया है। घर की नींव में लेटराइट पत्थर और दीवारों के लिए मिट्टी की ईंटों का इस्तेमाल किया है। चिनाई के लिए सीमेंट का उपयोग किया गया, लेकिन घर पर किसी तरह का कोई प्लास्टर नहीं किया है। छत के लिए भी RCC की बजाय जीआई फ्रेम और सेकंड हैंड मैंगलोर टाइल्स का उपयोग किया गया है। उनके घर में एक बेडरूम, एक मचान, किचन, बाथरूम और टॉयलेट मौजूद है।
उन्होंने घर में केवल आवश्यकता के अनुसार ही फर्निशिंग की है। अपने पुराने पड़े फर्नीचर को फेकने की जगह उनका उपयोग कर अलमारी, मेज, सोफे और बेड तैयार किए हैं। इसके बारे में उनका कहना हैं कि उनका लक्ष्य कम से कम साधनों में एक बेहतर जीवन जीना है। दुनिया की भागदौड़ से दूर शुकुन के पल जीना।



