हॉलैंट को हॉकी में हराने वाला भारतीय खिलाड़ी, आज गरीबी के चलते झोपड़ी में जीवन बिताने को मजबूर है

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Tekchand Yadav Hockey
Tekchand Yadav disciple of Major Dhyanchand had defeated Holland, today he is living in a hut. Tekchand Yadav Hockey Former Player of India.

Photo Source: Twitter

Sagar: दोस्तों हमारा भारत देश प्रतिभा का धनी है। यहां आज से नहीं बल्कि सदियों से ही एक से एक योद्धा गायक डांसर एवं बड़े से बड़े खिलाड़ियों का जन्म हुआ। अगर खेल की बात करें, तो पूरी दुनिया में भारतीय खिलाड़ियों ने अलग-अलग समय पर देश का मान बढ़ाते हुए सफलता के झंडे गाड़े हैं। क्रिकेट ने तो मानो एक इतिहास सा लिख दिया खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड बनाकर।

वही हम ओलंपिक की बात करें तो हाल ही में नीरज चोपड़ा एवं उनकी तरह के प्रतिभान खिलाड़ियों ने गोल्ड मेडल की झड़ी सी लगा दी। पर सफलता से पहले इन खिलाड़ियों ने जो अभ्यास किया जो मेहनत की अपने खेल को चमकाने के लिए इसके चलते वह अपने धन अर्जन के लिए किसी दूसरे कैरियर के लिए समय नहीं दे पाते है।

नतीजा अगर वह खेल में अच्छे हो जाते हैं, तो पैसे कमाने का कोई रोजगार नहीं बना पाते। ऐसे ही एक हॉकी के खिलाड़ी कि हम बात करने वाले हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय खेल में अपना डंका बजा दिया पर आज गरीबी की हालत में झोपड़ी में जीने को मजबूर है।

मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर में कट रही जिंदगी

दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं टेक चंद यादव (Tekchand Yadav) की जो एक समय में भारतीय हॉकी इंटरनेशनल टीम के 1 स्टार खिलाड़ी हुआ करते थे। उन्होंने अपने हॉकी के जादू से देश को कई टूर्नामेंट जिताए। परंतु सच बताइए क्या आपने कभी इनका नाम सुना है। बिल्कुल ऐसी ही गुमनामी की जिंदगी बिता रहे टेकचंद जी मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के जिला सागर (Sagar) में कैंट क्षेत्र के अंतर्गत एक झोपड़ी बना करके रह रहे हैं।

उन्होंने अपने खेल की दीवानी की के चलते हॉकी में तो महारत हासिल कर ली परंतु समय खेल में खर्च कर देने की चक्कर में कोई दूसरा रोजगार तैयार ना कर सके, आज उनके मेडल भी उनके कोई काम ना आए। शायद इसीलिए भारत में प्रतिभावान खिलाड़ी होने के बावजूद खेल क्षेत्र में लोग कम ही आगे आते हैं।

इनकी हॉकी ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए, ऐसे थे खिलाड़ी

जानकारी के अनुसार टेकचंद यादव हॉकी के एक बेहतरीन खिलाड़ी (Hockey Player) थे और 1960 के दशक में भारतीय टीम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लीड करते थे। 1961 में हॉलैंड से हुए हॉकी मैच के दौरान इन्होंने अहम गोल दागे जिसकी वजह से हॉलैंड को हार का सामना करना पड़ा और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जबरदस्त जीत हासिल हुई।

हॉकी में इनका खेल का स्तर इतना बेहतरीन होने के पीछे मेजर ध्यानचंद का भी बहुत बड़ा सपोर्ट रहा है। सागर जिले के अंदर मेजर ध्यानचंद जी ने करीब 3 महीने तक एक कैंप के दौरा इनको ट्रेनिंग दी थी। उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का हुनर सिखाया जिससे इनका खेल निखर के सामने आया।

हॉकी स्टार टेकचंद यादव का जीवन सफर एक नजर में

9 दिसंबर 1960 सागर कैंट क्षेत्र में जन्म लेने वाले टेकचंद यादव एक साधारण परिवार से आते थे। उनके पिताजी दूध का व्यापार करते थे। इसी दौरान टेकचंद अक्सर बच्चों को हॉकी खेलते हुए देखा करते थे, जिससे उन्हें हॉकी की प्रेरणा मिलनी शुरू हुई।

मजाक-मजाक में ही एक साधारण लकड़ी को हॉकी स्टिक की तरह बनाकर उन्होंने अपने मोहल्ले के बच्चों के साथ खेल शुरू किया। लेकिन इनके खेल में एक अलग ही बात थी, जिसे उनके पिताजी ने पहचाना और उन्हें एक असली की हॉकी स्टिक ला करके दी।

बस यही से इनके करियर की शुरुआत हो गई। बाद में डिस्टिक हॉकी एसोसिएशन ने इनकी प्रतिभा को समझते हुए टीम में जगह दी जहां से खेलते खेलते यह भारत देश की नेशनल हॉकी टीम तक पहुंच गए।

जिंदगी जीने की जद्दोजहद ने हॉकी से नाता तुड़वाया, सरकार से कोई मदद नहीं

बातचीत के दौरान टेकचंद जी ने बताया कि ध्यानचंद जी से ट्रेनिंग मिलने के बाद उनके जीवन का लक्ष्य सिर्फ हॉकी रह गया था। उन्होंने मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ दी और सारा ध्यान खेल में लगा दिया। जिस वजह से वह अपने किसी दूसरे रोजगार को मजबूत करने के लिए समय दे नहीं सके और उनके पास पैसे कमाने का कोई जरिया नहीं बचा।

खेल से कमाए ढेरों मेडल और सर्टिफिकेट जीवन जीने की जद्दोजहद में कहां गुम हो गए आज उन्हें याद भी नहीं। अपनी दुर्दशा को रोने के बजाय टेकचंद जी कहते हैं कि, मैंने तो अपना जीवन काट लिया और जो कुछ हासिल किया उससे मैं जीवन में संतुष्ट हूं।

परंतु हम सरकार से यह निवेदन जरूर करना चाहेंगे कि देश के ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ियों को जीवन के उनके आखिरी पड़ाव में कुछ ऐसी व्यवस्था बना कर दें, ताकि उनकी सफलता से देश के अन्य बच्चे प्रेरणा भी ले सके और वह एक बेहतर जीवन यापन कर सकें।

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