IIT के बाद लाखों की नोकरी छोड़ देने लगा खेती का प्रशिक्षण और संवार दिया 35000 आदिवासियों का जीवन

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IIT Vishal Singh
Story Of Vishal Singh Co-Founder Gram Samriddhi Trust. IIT graduate is uplifting the lives of deprived children and small-scale farmers. IIT Kharagpur Alumnus Quit His Lucrative Job to Help Farmers.

Banaras: आईआईटी (IIT) से मास्टर्स की डिग्री ले चुके बनारस के निवासी विशाल सिंह (Vishal Singh) ने ऐसा काम किया जिसको बहुत ही कम लोग कर पाते है। उन्होंने नौकरी कर खु़द को दुनिया मे अमीर बनाने की वजह गरीब आदिवासियों तथा ग्रामीणों का जीवन सुधारने का रास्ता चुना। आज विशाल अपने दम पर 35 हजार से ज्यादा किसानों का जीवन संवारने में सफल सावित हुये है।

एक साधारण से परिवार में जन्मे विशाल के दादा और फिर पिता सभी किसान ही थे। 34 साल के विशाल एक माध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता किसान हैं। घर में खेती के सिवा कोई और आमदनी का रास्ता नहीं था। इसलिए उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना भी किया। विशाल का सपना था आईआईटियन बनना। खेती ही एकमात्र साधन था पैसा कमाने का।

ऐसे में भी विशाल के पिता ने उन्हें पढ़ाने में कोई कमी नही होने दी। विशाल IIT से पढ़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 12वीं के दौरान दो बार कोशिस की लेकिन कामयाब ना हो सके। घर के स्थिति को देखते हुए विशाल ने अपना समय व्यर्थ नही जाने दिया और बिना IIT के ही किसी अन्य कॉलेज में एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में एडमिशन ले लिया।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के वाराणसी (Banaras) के रहने वाले विशाल सिंह आईआईटियन हैं। IIT खड़गपुर से एमटेक (M Tech) के बाद उनको अच्छी जॉब मिल गई। लाखों की सैलरी, लेकिन विशाल को अधूरा से लग रहा था उनको इससे वेयो खुशी नही मिली जिसको वो चाहते थे। तीन साल काम करने के बाद उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और मन मे ठाना कि उन लोगों की जिंदगी में खुशियां लेकर आऊंगा जो गरीब हैं, जिनकी माली स्थिति ठीक नहीं है।

लक्ष्य तो बहुत कठिन था लेकिन बुलन्द होसलो से आगे बढ़ते चले गये। कभी हार नही मानी लगातार कोशिश करते रहे। आज विशाल अपनी मेहनत के दम पर 35 हजार से ज्यादा गरीब और आदिवासियों की जिंदगी में खुशियों के रंग भर चुके हैं। उनको रोजगार दे रहे हैं, उनके बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं।

विशाल का कहना हैं कि जब ग्रेजुएशन में IIT नहीं मिला तो ठाना कि मास्टर्स की पढ़ाई IIT से ही करेंगे। इसलिए पहले साल से ही गेट की तैयारी में जुट गये और पहले ही अटेम्प्ट में एग्जाम सफलता हासिल भी कर ली। रैंक बढ़िया था इसलिए मुझे IIT खड़गपुर में एडमिशन मिल गया। विशाल का परिवारिक व्यवसाय खेती था और उन्होंने इंजीनियरिंग भी एग्रीकल्चर स्ट्रीम से की थी। इसलिए उन्होंने फूड प्रोसेसिंग की पढ़ाई करने का फैसला लिया।

आदिवासियों की गरीबी दूर करने का ठाना

ओडिशा के 6 जिलों में विशाल के फार्म हैं। वहां वे किसानों और स्टूडेंट्स को मुफ्त ट्रेनिंग (Free Tranning) भी देते हैं पढ़ाई के दौरान मुझे एग्रीकल्चर की खूबियों और कमर्शियल फायदे के बारे में इन्फॉर्मेशन मिली। तब मुझे एहसास हुआ कि किसानों के लिए प्रोडक्शन बड़ा मुद्दा नहीं है।

अगर किसान फूड प्रोसेसिंग का काम सीख लें तो उसे आमदनी में चार चांद लग जाएंगे। इस फील्ड में ग्रोथ और डेवलपमेंट के रास्ते बहुत है। अगर किसी चीज की कमी है तो वह है सही मार्गदर्शन की। पढ़ाई के दौरान वे अक्सर खड़गपुर के आसपास के ट्राइबल क्षेत्रों में जाते रहते थे। उनकी माली स्थिति देखकर विशाल को अंदर से काफी निराशा होती थी।

आदिवासियों और गरीब किसानों को ऑर्गेनिक फार्मिंग की ट्रेनिंग देते

यहां उन्हें ट्राइबल बेल्ट में गरीबों के साथ काम करने का मौका मिल गया। वे कॉलेज के बाद अपना वक्त इन्हें खेती का प्रशिक्षण देने में बिताने लगे। इस दौरान उन्हें कॉलेज की तरफ से NSDC के एक प्रोजेक्ट को लेकर काम करने का अवसर मिला। जिसमें उन्हें कुछ पिछड़े गांवों को स्मार्ट विलेज के रूप में परिवर्तन करना था। विशाल के लिए यह चेलेंज टर्निंग पॉइंट रहा। उन्होंने कॉलेज से अधिक समय गांवों में बिताना शुरू किया।

पुरुषों के साथ ही बड़ी संख्या में महिलाओं को भी ट्रेनिंग देकर सशक्त बनाया

विशाल कहते हैं कि आदिवासियों के बीच काम करने के बाद मुझे अनुभव हुआ कि इनका स्तर बढ़ाना चाहिए। दूसरे इलाकों में भी ऐसे गरीब लोग हैं जिन्हें ऊपर उठाने और आर्थिक रूप से बेहतर बनाने की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने 2016 में अपनी नौकरी छोड़ दी।

इसके बाद उन्होंने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर ग्राम समृद्धि नाम से एक ट्रस्ट की नींव रख उसका शुभारंभ किया। इसमें उन्होंने आहार मंडल नाम से एक प्रोजेक्ट लॉन्च किया और लोगों को जानकारी देना शुरू किया। फिर उन्हें इंटीग्रेटेड फार्मिंग से जोड़ा।

जिस किसी के घर के आगे या पीछे थोड़ी सी जमीन खाली पड़ी थी, वहां उन्होंने घर के आवश्यक की लगभग सभी चीजें उगाने के मॉडल पर काम करना स्टार्ट किया। इसमें लागत भी न के बराबर रहती थी और सिंचाई के लिए पानी की भी कमी नहीं थी। घर की नालियों से निकलने वाले पानी को ही उन्होंने उपयोग करना शुरू कर दिया। इससे कुछ समय मे ही अलग-अलग तरह की सब्जियां निकलने लगीं।

आज की तारीख में ये लोग हर साल 2 से 3 लाख रुपए कमाने में सक्षम हो गये हैं। इन्हें अपनी जीविका के लिए शिकार की आवश्यकता नहीं करना पड़ती है। इसका फायदा इनके बच्चों को भी मिल रहा है। वे अब मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं, शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

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