इस टीम ने लंबा रास्ता तय कर हिमालय के गाँवों में बिजली पहुंचाई, किन्तु मीडिया ने नहीं बताया

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Paras Loomba Story of Himalaya
Paras Loomba Team Journey to electrify the remotest villages in Himalayas led us to an incredible intersection in science. How light came to Himalayan dark villages.

Photo Credits: Twitter(IEEE Smart Village)

विचार कीजिए कि आप 11,000 फीट की ऊंचाई पर एक ट्रेक पर हैं, 2 फीट चौड़े मार्ग पर चलते हुए सांस लेने के लिए मेहनत कर रहे हैं और आगे केवल एक गलत कदम से आपकी जान खतरे में आ सकती है। लेकिन दुनिया के अलग अलग प्रान्त के लोगों के एक समूह ने इस अकल्पनीय ट्रेक जो कि असम्भव था, के माध्यम से लद्दाख, शेड में 1000 वर्ष पुराने गांव को उजाला देकर विद्युतीकरण किया।

ट्रेकिंग समूह ने धाराओं, खतरनाक सड़कों और खड़ी घाटियों से होकर वाहनों के जरिये से 300 किमी से अधिक की यात्रा की और फिर उस गांव तक पहुंचने का संघर्ष जारी रखा उसके लिए 125 किलोमीटर की ट्रेकिंग की। ग्रुप ने 2 ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन द्वारा निर्मित किए गए 5 सौर ऊर्जा संचालित DC माइक्रोग्रिड स्थापित करने के लिए गांव में 2 दिन गुजारे थे।

इस समूह ने 82 गांवों को विद्युतीकृत किया

यह एकमात्र ऐसा गांव नहीं जिसे “ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन” की समूह ने उजाला देकर विद्युतीकरण किया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस समूह ने 35,000 से ज्यादा लोगों को प्रभावित करने वाले 82 गांवों को विद्युतीकृत किया है। ऐसे कई संगठन या समूह हैं जो गांवों में बुनियादी बिजली प्रदान करने का काम करते हैं, जो सरलता से सुलभ हैं, लेकिन बहुत कम संख्या में हैं, जो उन गांवों को बिजली पहुचाते हैं जो मार्ग से जुड़े नहीं हैं और बहुत दूर स्थित हैं।

इन गांवों तक पहुंचने के लिए मोटरेबल सड़क के आखिरी जगह से टीम को बहुत दिनों तक ट्रेक करना पड़ता है। किस प्रकार हुई “ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन” की Starting? इलेक्ट्रॉनिक्स ऐण्ड कम्युनिकेशन इंजीनियर पारस लूम्बा ने 2012 में रॉबर्ट स्वान, OBE संस्थापक के आधिकारिक में एक अंतर्राष्ट्रीय अंटार्कटिका अभियान खत्म करने के बाद अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी।

पारस लूम्बा ने मीडिया में यह बातें बताई थी

उन्होंने बताया कि “मैंने महसूस किया कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके क्लाइमेट बदलकर मुकाबला करने के लिए इंडिया में ही एक बड़ी जरूरत है। भारत वापस आने के बाद, मैंने एक ऐसा प्रोग्राम चालू किया जो सामाजिक प्रभाव से भरपूर था। सुदूर हिमालयी गांवों में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने की प्लानिंग है। इस तरह “ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन GHE” Start हुआ।

पहले अभियान में 10 विभिन्न प्रान्तों के 20 लोग सम्लित हुए थे।” एक सेना अधिकारी के बेटे होने के नाते, पारस उत्तर पूर्व के कई दूरदराज के क्षेत्रों में और जम्मू-कश्मीर में निवास कर चुके थे। पारस पहले से ही इन इलाको से को अच्छे से जानते थे। उन्होंने पहले लद्दाख को अपनी योजना में शामिल किया, क्योंकि इसमें अधिक संख्या में ऑफ-ग्रिड ट्रेकेबल गाँव थे, जो सड़क रास्ते से नहीं जुड़े थे।

पहले अभियान के अंतर्गत, ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन टीम ने वर्ष 2013 में लेह के महाबोधि स्कूल में 14×20 कमरे में लद्दाख के स्टूडेंट्स के लिए डिजिटल और अनुभवात्मक शिक्षा पहुचाने के उद्देश्य से “थर्ड पोल एजुकेशन बेस” नामक एक शिक्षा केंद्र का शुभारंभ किया। स्कूल में आसपास के 50 गांवों के स्टूडेंट्स रहते हैं।

JHE की टीम के बारें में

“ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन” ग्रुप में 5 फुल समय कर्मचारी और करीब 24 Contract पर कर्मचारी मौजूद हैं, जो विभिन्न कार्यों की देख रेख करते हैं। JHE के अधिकांश फुल समय कार्यकर्ता इस योजना का हिस्सा बनने के लिए अपनी कॉर्पोरेट नौकरियां छोड़ चुके हैं। ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन अब एक व्यक्ति की तुलना में “Team Story” है।

समूह डीसी सोलर माइक्रोग्रिड तकनीक पर स्थानीय इलेक्ट्रीशियन को भी प्रशिक्षित करके योजना को समझती है, जिससे भविष्य में इन ग्रिडों की Help के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित इलेक्ट्रीशियन उपलब्ध हों।

भविष्य की प्लांनिग:

लद्दाख के गांव के विद्युतीकरण के बाद, समूह की प्लानिंग उत्तर पूर्वी भारत और दुनिया के अन्य पर्वतीय इलाको में जाने की है। भविष्य में ग्लोबल हिमालयन एक्सपेडिशन ग्रुप लद्दाख के सभी गांवों में एक ही माइक्रोग्रिड द्वारा संचालित वायरलेस संचार प्रणाली को Start करना चाहती है।

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