बकरियां चराने वाले का सपना था IPS बनना, ईंट भट्टो में काम किया, आज है DSP: संघर्ष की कहानी

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Kishore Kumar Rajak DSP
Kishore Kumar Rajak DSP Jharkhand success story in Hindi. Motivational Story of DSP Kishore Kumar Rajak from Ranchi Jharkhand. How he became Police Officer.

Photo Credits: Twitter(@dspkishor)

Delhi: यह कहानी है बुलंद हौसलों की। कभी ना हार मानने की। छोटे से गांव से बड़ी कामयाबी हासिल करने की। गरीबी में जीने और फिर मजदूर से अफसर बनने की। गांवों के बच्चे-बच्चे को प्रेरित करने वाली यह सक्सेस स्टोरी (Success Story) है। अब तक कई आईएएस और आईपीएस (IAS And IPS) के संघर्ष की कहानी से हमने रूबरू कराया है।

आज हम जिस अफसर के बारे में यहां बात कर रहे हैं, उनकी कहानी उन युवाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जो देश की इस प्रतिष्ठित परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और तैयारी के रास्ते में आने वाली कठिनाइयों से घबरा जाते हैं। और अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते है। मेहनत करने वालो की कभी हार नही होती।

मेहनत कभी अमीरी गरीबी नही देखती। सफलता तो हमेशा मेहनत की मोहताज होती है। जो मेहनत नही करना चाहते वो हमेशा अपनी गरीबी का दुखड़ा सुना देते है, लेकिन जिसके शरीर मे जुनून है, वो हर हाल में अपनी सफलता देखना चाहता है, तो वो गरीबी को भी मात दे देता है।

संघर्ष, मेहनत और सफलता की मिसाल बने किशोर कुमार रजक (Kishor Kumar Rajak) कभी बकरियां चराया करते थे। ईंट-भट्टों पर मजदूरी किया करते थे। कॉलेज में फेल तक हो गए थे, मगर अफसर बनने का सपना हमेशा जिंदा रखा। मेहनत करने में कोई कमी नहीं छोड़ी और फिर पहले ही प्रयास में यूपीएससी UPSC परीक्षा क्रैक करके कमाल कर दिखाया।

कहा हुआ जन्म

झारखंड के बोकारो जिले का एक गांव है बुड्ढीबिनोर। यह गांव चंदनकेर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसी गांव में साल 1986 को जन्म हुआ, किशोर कुमार रजक (Kishore Kumar Rajak DSP) का। किशोर कुमार के पिता धनबाद के कोयला खदान में मजदूरी करते थे और पत्नी रेणुका देवी घर संभालती थीं।

गरीबी ने भी नही तोड़ा जस्बा

किशोर कुमार (Kishore Kumar Rajak) के पीता धनबाद की एक कोयला खदान में मज़दूर के रूप में कार्यरत थे और उनकी पत्नी का नाम रेनुका देवी है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नही थी कि वो शरू से ही अच्छी स्कूल में पढ़ाई कर सकते। लेकिन मन मे सपने संजोय अपने मजबूत होसलो से आगे कदम बढ़ाते चले गए।

हालाँकि किशोर कुमार रजक का परिवार बड़ा है, किशोर कुमार (Kishore Kumar Rajak) के चार भाई और एक बहन है, बड़ी परेशानियों के बाद भी आज वह Jharkhand के राजधानी राँची (Ranchi) से थोड़ी दूर खुटी ज़िले के DSP के पद पर नियुक्त हैं। वे अपनी सेवाएं सफलतापूर्वक दे रहे है और अपनी ड्यूटी पूरी निष्ठां से कर रहे है।

दिए की रौशनी से पढ़ा करते थे

गांव के हालात तब ऐसे थे कि वँहा बिजली भी नही मिल पाती थी। उनकी संघर्ष भारी कहानी (Story) सुन किसी को अपनी आंखों पर विश्वास भी नही होता कि कोई इतनी मुश्किलें झेलकर भी सपनो से दूर नही भागा। कभी उनके गाँव में बिजली भी नहीं हुआ करती थी। वह अक्सर एक दिए की रौशनी के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई किया करते थे। पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपने मजबूत होसलो से आगे की ओर बढते चले गये। उनका बचपन बहुत ही आर्थिक तंगी में गुजरा है। उनके पास पढ़ाई के पर्याप्त संसाधन भी नही थे फिर भी वो अपनी किस्मत से लड़ते चले गए।

मीडिया से बातचीत के दौरान बताते है कि उनका बचपन बेहद गरीबी में बीता। घर में बिजली नहीं थी। दीया और लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करते थे। गांव के खेतों में धान रोपने के बाद पशुओं के चरने के लिए जगह नहीं बचती थी। ऐसे में किशोर कुमार अपने दोस्त निरंजन, वरुण, सबल आदि के साथ घर से तीन-चार किलोमीटर दूर घने जंगलों में बकरियां व बैल चराने जाया करते थे। यह सिलसिला खेत खाली होने तक जारी रहता था।

पैसों के लिए ईंट-भट्टों पर की मजदूरी

किशोर कुमार कहते हैं कि बकरियां चराने के साथ-साथ ईंट-भट्टों पर मजदूरी करने वाले वो दिन हमेशा याद रहेंगे। चाचा के साथ ईंट-भट्टों पर मजदूरी करने जाता था। मुझे आज भी याद है उस वक्त भट्टे पर एक हजार ईंट निकालने के चार रुपए और रोड में ईंट भरने के 12 रुपए मिला करते थे। तब कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन अफसर बन सकूंगा, मगर टीचर की एक बात ने पूरी जिंदगी बदल दी। टीचर ने बोला था कि मजदूरी करोगे, तो मजदूर बनोगे और पढ़-लिख लोगे तो अफसर। बस यही बात दिल पर घर कर गई थी। आगर टीचर ऐसा ना बोलती तो शायद आज कही और ही होता।

किशोर कुमार की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव के ही एक सरकारी स्कूल से हुई। जिस सरकारी स्कूल से वो पढ़ाई करते थे, उसकी छत भी बरसात के दिनों में टपकती थी। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद किशोर ने साल 2004 में इग्नू से इतिहास विषय में स्नातक के लिए एडमिशन लिया। वर्ष 2007 में एक सेमेस्टर में वो पास नही सके तो हौसला टूटने लगा,लेखों आगे बढ़ना था इसी जुनून से फिर मेहनत की 2008 में स्नातक की डिग्री हासिल की।

गरीबी में किसी ने नही दिया साथ

किशोर यूपीएससी की तैयारी करने के लिए दिल्ली आना चाहते थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नही थी कि उनकी पढ़ाई का खर्च उठा सके। पेसो के कारण वो आगे नही बढ़ पा रहे थे कुछ दोस्तों से मदद भी मांगी लेकिन गरीबी को देखते हुए किसी ने मदद के नाम पर कुछ नही दिया। फिर भी मन मे हौसला मजबूत था।

फिर उनकी बड़ी बहन पुष्पा ने गुल्लक तोड़ उन्हें 4 हजार रुपए दिए थे। उन रुपये को लेकर आईपीएस (IPS) बनने का ख्वाब लेकर दिल्ली आए किशोर कुमार ने अपनी मेहनत के दम पर यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा साल 2011 में पास कर ली थी। हालांकि वो आईपीएस तो नहीं बन पाए लेकिन सशस्त्र सीमा बल के असिस्टेंड कमांडेंट के पद पर उनका सेलेक्शन हो गया। साल 2016 में इन्होंने स्टेट पीसीएस परीक्षा पास की और झारखंड पुलिस में डीएसपी बने।

चाणक्य की नीति (Chanakya Niti) से सीखा

ज्ञान वो है, जो मरता नही है, जो सड़ता नही है, जिसे चोरी नही की जा सकती है। ज्ञान वो धरोहर है जो जो प्रसिद्धि, सोहरत, नाम और पहचान देता है। यह समय के साथ बढ़ते जाता है। इसीलिए चाणक्य कहते हैं “किसी भी ज्ञानी व्यक्ति को हरा पाना मुश्किल होता है” एक पाँच रुपये की पेन पाँच लाख रुपये की पिस्तौल से ज्यादा ताकतवर होती है और सौ रुपये की एक किताब सौ करोड़ रुपये से ज्यादा कीमती हो सकती है।

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