
Patan: भारत के पारंपरिक परिधानों में साड़ी का अहम रोल है। इसलिए भारत के हर एक प्रांत में साड़ियों का अलग-अलग फैशन पिछले कई सालों से चलन में है। जैसे नॉर्थ इंडिया मैं साड़ी (Sari) का कल्चर एवं डिजाइन कुछ अलग होती है, तो वही साउथ इंडिया में कांजीवरम जैसी साड़ियों का चलन है।
गुजरात का सूरत शहर साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है दुनियाभर में यहां से साड़ियां एक्सपोर्ट की जाती है। वही राजस्थान का साड़ियों का कल्चर (Saari Culture) भी राजसी ठाट बाट के साथ एकदम निराला है। आधुनिक समय में साड़ियों की बुनाई मशीनों से की जाती है, जिससे कम समय में ही ढेरो साड़ियों की बुनाई हो जाती है।
परंतु पहले के समय में हांथ से ही साड़ियों को तैयार किया जाता था, तो ऐसे ही हाथों से बनी एक साड़ी ऐसी भी है, जिसकी कीमत 4 लाख रुपए तक होती है। और ये ऐतिहासिक साड़ी पिछले 900 सालों से एक ही परिवार द्वारा बनाई जाती रही है।
आइए जानते हैं इस पटोला साड़ी के बारे में विस्तार से
दोस्तों हम की साड़ी की बात कर रहे हैं, उसे पाटन पटोला साड़ी (Patan Patola Saree) के नाम से जाना जाता है। पाटन गुजरात के अंतर्गत आने वाला एक शहर है, जहां पर यह पटोला साड़ी हाथों द्वारा तैयार की जाती है। पटोला रेशम बहुत ही पवित्र और अच्छा माना जाता है। जिससे यह साड़ी पहनने के बाद पहनने वाले को देवी जैसा एहसास होता है। इसीलिए यह साड़ी सदियों से राजवंशों की शान रही है।
यहां तक कि गुजरात में पाटन पटोला साड़ी को लेकर के यहां की महिलाओं में एक लोकगीत भी प्रचलित है। हाथों से बुनाई होने की वजह से यह बहुत जटिल और महीन कारीगरी से तैयार की जाती है। पटोला साड़ी को संस्कृत भाषा में पट्टकुल के नाम से जाना जाता है।
पाटन पटोला अस्तित्व एवं पुराना इतिहास
आपको बताना चाहेंगे कि पाटन पटोला वेबसाइट के अनुसार गुजरात में ईस साड़ी की शुरुआत 12 वीं शताब्दी में की गई थी। राजा कुमारपाल जो सोलंकी राजवंश (King Kumarpal of Solanki dynasty in Patan) से आते थे, उन्होंने जालना महाराष्ट्र से पाटन पटोला साड़ी बनाने वाले बुनकरों के 700 से अधिक परिवारों को गुजरात के पाटन में स्थापित किया, जिससे यह सुंदर साड़ी उन्हें उनके राज्य में ही बनकर तुरंत प्राप्त हो सके।
बुनकरों को गुजरात बसाने के पीछे एक कहानी यह भी कही जाती है कि, शायद जालना के राजा पटोला साड़ी बनने के बाद उन्हें इस्तेमाल करते थे, उसके बाद दूसरे राजाओं को बेचा करते थे, इसलिए भी राजा कुमारपाल ने बुनकरों का समुदाय जिन्हें साल्वी समाज (Salvi Cast) कहा जाता है।
The Salvi family from Patan, #Gujarat, has been weaving exquisite Patola #sarees since the last 900 years. #Thread #SareeTwitter pic.twitter.com/TUO6zd3aqt
— 30 Stades (@30stades) September 12, 2020
उन्हें जालना से गुजरात लाकर स्थापित कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार अजंता एलोरा की गुफा में जो चित्र देखने मिलते हैं, उनमें से भी कुछ चित्र में पाटन पटोला साड़ी को चित्रित किया गया है।
शाही विरासत से पहुंची, विदेशों तक इसकी ख्याति
पटोला साड़ी के बारे में ऐसा कहा जाता है कि, रामायण एवं नरसिंह पुराण में भी इसका उल्लेख किया गया है। वही माता सीता जी की विदाई के वक्त मायके से पटोला साड़ी उपहार के तौर पर उन्हें दी गई थी। तो सदियों तक पटोला साड़ी सिर्फ शाही परिवार में एक सम्मान के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी।
White double ikat patan patola saree
Design – double ikat patola
Color – WhiteYour queries are best answered through WhatsApphttps://t.co/yzJRxHfL5V
or alternatively, pic.twitter.com/8rEuLljl3N
— Kiran Sawhney (@sohumsutras) January 12, 2023
18वीं शताब्दी के बाद जब बाजार का वैश्वीकरण हुआ तब यह साड़ी गुजरात के पाटन से निकलकर दुनिया में पहुंचने लगी। थाईलैंड इंडोनेशिया मलेशिया जैसे देश इसके व्यापक खरीददार है। इन देशों के जरिए यह साड़ी रोम तक भी पहुंच चुकी है।
आइए मिलते हैं इस साड़ी बनाने वाले 900 साल पुराने साल्वी परिवार से
राहुल सालवी से बातचीत के दौरान जानकारी मिली कि आज पूरे पाटन में सिर्फ सालवी परिवार ही बचा है, जो पिछले 900 सालों से पुश्तैनी तरीके से पटोला साड़ी बुनता आया है। कैसे मार्केट में कुछ और लोग भी दावा करते हैं, परंतु वह सिर्फ इन साड़ियों की नकल है।
Multi colour double ikat patan patola saree
Type – double ikat patola
Material – silk
Color – Multi colourYour queries are best answered through WhatsApphttps://t.co/O1e3z8hTpu
or alternatively, pic.twitter.com/FY6A8QzxYz
— Kiran Sawhney (@sohumsutras) January 15, 2023
ओरिजिनल शिल्पकार राहुल साल्वी का ही परिवार है। इन्हें 2 नेशनल और एक शिल्प गुरु के अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। साड़ी की असली महिमा को लोगों तक पहुंचाने के लिए साल्वी परिवार ने एक पटोला हेरिटेज तैयार किया जिसमें देश विदेश से बुलाए गए सैकड़ों साल पुराने कपड़ों को सजाकर प्रदर्शित किया गया।



