
Delhi: हमारे देश में काफी ऐसे युवा मौजूद हैं, जो कुछ ना कुछ नया करने की चाह रखते हैं और कुछ ना कुछ नया आविष्कार करते हैं। इंजीनियरिंग क्षेत्र में बहुत से स्टूडेंट्स कुछ अलग अलग आविष्कार करते आए हैं। आज हम कानपुर के अभिषेक वर्मा के बारें में बताएंगे जिन्होंने गाजियाबाद इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की हैं और उन्होंने एक बड़ा ही दिमाग वाला आविष्कार किया है। जिसके बाद उनकी सराहना होने लगी। जिस गंदगी को लोग देखना पसंद नही करते थे आज वही गंदगी अविष्कार के लिये काम आई।
कौन है अभिषेक
साल 2013 में कानपुर (Kanpur) से आए अभिषेक वर्मा (Abhishek Verma) ने ग़ाज़ियाबाद के इंद्रप्रस्थ इंजीनियरिंग कॉलेज के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में दाखिला लिया। यहाँ उनके हॉस्टल के बगल से एक बड़ा और खुला सीवर बहता था, जिसे सब लोग सूर्यनगर नाला के नाम से जानते हैं और यह छात्रों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था। यहां के लोग इससे बहुत परेशान हो गये थे। यंहा से निकलने के लिए भी लोगो को सोचना पड़ता था इतनी गंदगी होती थी।
अभिषेक वर्मा को बचपन से ही कुछ ना कुछ अलग करने का जूनून रहता था, वो कुछ ना कुछ अविष्कार के बारे में विचार करते रहते थे। बचपन से ही अभिषेक को विज्ञान में रूचि थी। अक्सर वे बिजली के यंत्रो को खोलकर, उसके काम करने के तरीके को समझने की कोशिश करते, तो कभी कोई खराबी हो जाने पर उसे ठीक करने के नए समाधान निकलने में लग जाते थे।
अब उन्होंने गटर के नाले को देखा, उनके मन मे उससे कुछ अविष्कार करने का विचार आया। उनको पता नही था ये सफल होगा या नही फिर भी कोशिश करना जरूरी समझा। इसलिए जब एक दिन उन्होंने सूर्य नगर नाले के गंदे पानी से झाग और गैस के बुलबुले निकलते देखा, तो उन्हें सीवर के भीतर होने वाले कार्बनिक कचरे के अपघटन की प्रक्रिया के बारे में याद आया।
उन्होंने तुरंत अपने साथ पढ़ने वाले एक दोस्त, अभिनेंद्र बिंद्रा को इस बारे में बताया। इन दोनों छात्रों ने गैस का सैंपल इकट्ठा किया। अभिषेक वर्मा ने अपने दोस्त के साथ मिलकर इसपर रिसर्च करने का निर्णय किया और फिर उस गटर के कचरे को लैब में परीक्षण के लिए भेजा। फिर उसमें पता चला की ये गोबर गैस या बायो गैस से मेल खाता है।
जब लैब ने इस सैंपल पर गैस क्रोमोटोग्राफी टेस्ट किया, तब उन्हें पता चला कि नाली से निकलने वाली इस गैस की संरंचना गोबर गैस या बायो-गैस से मिलती जुलती है और इसमें 65 प्रतिशत मीथेन होने के कारण यह ज्वलनशील भी है। फिर अभिषेक वर्मा ने अपने दोस्त के साथ मिलकर इसकी प्रक्रिया शुरू की और उनको सफलता मिली और उससे गैस निकला। फिर उन्होंने इसका इस्तेमाल एक टी स्टॉल पर किया।
उन्होंने रामू टी स्टॉल पर सबसे पहले इसका प्रयोग किया और उनको उसमें सफलता मिली और इससे उस चायवाले का भी काफी फायदा हुआ और वो उस समय में महीने में गैस पर जितना पैसा जा रहा था उसका पैसा बचा। अभिषेक ने बाद में एक एलएलपी फर्म की स्थापना की। अभिषेक के इस तकनीक से काफी लोगों की पैसों की बचत हो रही है।
स्थानीय मीडिया ने इसे गटर गैस का नाम दिया गैस के दाम बढ़ने से आम जनता के जीवन मे बहुत प्रभाव पड़ा है जो छोटा ठेला लगाकर अपने परिवार का पेट भरते है उनके लिए जीवन जीना तो एक चुनोती बन गया है। इन सबको देखते हुए अभिषेक के दिमाग में तुरंत यह विचार आया कि कैसे एक ऐसा सिस्टम तैयार करें, जिससे इस गैस के प्रभाव को कम किये बिना, इसे निकालकर रोज़मर्रा के कामों के लिए उपयोग किया जा सके, इस अविष्कार पर काम करना शुरू कर दिया और तय किया कि निकाले गए गैस से, पास में ‘रामू टी-स्टाल’ चलाने वाले शिव प्रसाद की हेल्प करेंगे।
सारे शोध हो जाने के बाद, जून 2014 में इन दोनों ने पहली बार शिव प्रसाद की ‘रामू टी-स्टॉल’ पर अपने इस आविष्कार का प्रदर्शन किया। स्थानीय मीडिया ने इसे ‘गटर गैस’ का नाम देकर इस प्रणाली की काफ़ी तारीफ की। इसने एलपीजी पर निर्भरता हटाकर रामू के चाय के ठेले की आय पहले की आय से चार गुना अधिक बढ़ा दी।
यह कैसे काम करता
जब इन्होंने पाया कि इस नाले से 60-70 प्रतिशत मीथेन गैस निकलती है, तब उन्होंने 6 ड्रम का एक सेट लिया। इन ड्रमों को एक अलग केस में रखा गया और फिर लोहे के बैरिकेड से जोड़कर खुले नाले में डुबो दिया। इससे ड्रमो के अन्दर गैस इकट्ठा होने लगी और जैसे-जैसे गैस का दबाव बढ़ा, इससे ड्रम ऊपर की ओर उठने लगे। इस गैस को लोहे की पाइपों की मदद से निकाला गया, जो कि स्टोव से जुड़े हुए थे। एक वाल्व की हेल्प से आप गैस को आवश्यकता अनुसार उपयोग में ले सकते हैं।
बहुत कम लागत से अत्यधिक गैस का उत्पादन
इस छः यूनिट सिस्टम की लागत केवल 5000 रुपये थी और इससे एक बार में 200 लीटर गैस को निकाला जा सकता था। जहाँ एक ओर कुछ ग्राहक गटर गैस के प्रयोग को लेकर सबके में बहुत सारे सवाल आते, लेकिन उसका इस्तेमाल देख लोग इसकी तारीफ करते हुए नही थकते। वहीं दूसरी ओर चाय के स्वाद और गुणवत्ता में कोई कमी न आने से शिव प्रसाद का व्यवसाय बढ़ता गया।
कचरे से निकलती यह गैस बिलकुल फ्री थी, इसलिए शिव प्रसाद की लागत अब कम हो थी और आय ज्यादा। 2013 के बाद, अभिषेक ने इस सिस्टम में कुछ ऐसे बदलाव लाने की कोशिश की, जिनसे आम लोगों को इसे उपयोग करने में दिक्कत न हो। ‘रामू टी-स्टॉल’ से पहले जहाँ शिव प्रसाद एक महीने में 5000 रुपये तक आमदनी थी, वहीं अब वह इतनी रकम सिर्फ एक हफ्ते में ही कमा ले रहे है।
गटर गैस से जलता है चुल्हा
मेरा उद्देश्य एक ऐसे सिस्टम को विकसित करना था, जिसे लगाना और रखना आसान हो। मैं चाहता था कि इसमें लागत बहुत अधिक ना आये। पहला अविष्कार बनाये हुए हमे छः साल हो गए और वह आज तक सही तरीके से काम कर रहा है। नए मॉडल में जो बदलाव लाये गए हैं, उससे यह 7-10 वर्षों तक बिना कोई परेशानी के आराम से चल सके।
इसे आप एलपीजी की जगह उपयोग कर सकते है। इसे चलाने के लिए बिजली भी नहीं लगती और यह मीथेन को ऐसे प्राकृतिक इंधन में बदलता है, जिसे खाना बनाने या गाड़ियों के लिए इंधन के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है। इससे बहुत हद प्रदुषण भी कम किया जा सकता है। कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले मीथेन का ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में 70 प्रतिशत अधिक योगदान है।
इसे बेहतर बनाने और दोहराने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है, सीवर से निकली इस गैस को खाना पकाने के लिए एलपीजी या गाड़ी चलाने के लिए सीएनजी के बदले इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। अभिषेक और अभिनेन्द्र ने इस परियोजना का प्रदर्शन गाज़ियाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी (GDA) के सामने भी किया, जिसने इस प्रस्ताव को यह कह कर स्वीकृति नहीं दी कि यह प्रणाली असुरक्षित है और किसी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
प्रधानमंत्री ने की तारीफ
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद ये दोनों अपनी-अपनी राह पर चल दिए। पर अभिषेक ने इस परियोजना को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने इस सिस्टम को बाज़ार में बेचने के लिए ‘पीएवी इंजिनियर’ नामक एक एलएलपी फर्म की स्थापना की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 10 अगस्त, 2018 को विज्ञान भवन, दिल्ली में ‘वर्ल्ड बायोफ्यूल डे’ पर अपने भाषण में ख़ास तौर पर अभिषेक के इस आविष्कार का उल्लेख किया। अभिषेक बताते हैं, प्रधानमंत्री द्वारा इस तकनीक का उल्लेख करने के बाद, पूरे देश के लोग इसे अपनाने के लिए आगे आने लगे। इससे आम लोगों में भी इसके बारे में जागरूकता फैली है।
गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण ने दिया साथ
अभिषेक के मौजूदा सिस्टम की जांच के बाद अब गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण भी इसको आगे बढ़ाने के लिए उनके साथ काम कर रही है। अभिषेक का मानना है कि इस सिस्टम को बड़े पैमाने पर लागू करना ज़्यादा फायदेमंद होगा, क्यूंकि ऐसा करने से 70 प्रतिशत अधिक गैस निकाला जा सकता है।
डिमांड बड़ी
जब इस तरीके से बनाये गैस की मांग बढ़ने लगी तब अभिषेक ने इसे आसानी से कहीं भी ले जाने योग्य बनाने के बारे में विचार शुरू किया। जिससे किसीको कोई दिक्कत का सामना ना करना पड़े। अब हर किसी के लिए संभव नहीं कि वो नाली के पास अपना स्टाल खड़ा कर ले। इसलिए हमने निर्णय लिया कि इस गैस को हम 5 किलो के सिलिंडर में डालेंगे, जिससे इसे कहीं भी ले जाने में कोई दिक्कत ना हो।
अभिषेक बताते है कि भारत में मेरे जैसे कई आविष्कारी हैं, जो लगातार कुछ नया और बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, पर इनके पास ऐसा कोई प्लेटफार्म नहीं है, जहाँ ये अपनी हुनार को दिखा सके। इन्हीं लोगों के लिए मैं ऐसा ही प्लेटफार्म तैयार करना चाहता हूँ, जिससे वे अपनी तकनीक को भारत के उन लोगों तक पहुंचा पाए, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा आवश्यकता है। कम लागत में ज्यादा मुनाफा हो सके।



