पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह: नेहरू चीन को असम सौंपने राजी हुए थे, सेना को यह आदेश दिए थे

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Image Credits: File Photos From Wikipedia

Leh/Laddakh: लद्दाख में गलवान घाटी पर भारत-चीन के बाच तनाव और झड़प के बाद से स्थिति बेहद तनावपूर्ण बन गई है। 15 जून को दोनों देशों के सैनिको के बीच झड़प और सैनिको की शहादत के बाद एक बार फिर चीनी सेना ने उसी स्थान पर टैंट लगा दिए है, जहाँ भारत के 20 जवान वीरगति हो प्राप्त हुए और चीन के 45 सैनिक निपटाए गए थे। चीन की हरकतों का सिलसिला काफी पुराना है और भारत की भूमि पर वह आँख टिकाये रहता है।

इस सबके बाद भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने एक बार फिर दावा किया है कि भारतीय सेना के जवानों ने गलवान घाटी पर चीन के 40 से ज्यादा सैनिकों को घराशाही किया है। पूर्व सेनाध्यक्ष और अभी केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सही तरीके से एक्सप्लेन किया है। वीके सिंह ने नमो ऐप के माध्यम से भारत-चीन के हर फैक्ट पर विस्तार से जानकारी दी है।

इस एप्प के माध्यम से मंत्री वीके सिंह ने बताया कि भारत-चीन का मामला देश की आजादी के बाद से ही चला आ रहा है। आजादी के बाद भारत अपनी स्थिति-परिस्थितयों से निपट रहा था, तो चीन भारत की जमीन पर आंख टिकाये बैठा था कि कब वो भारत की भूमि पर कब्जा कर ले।

V K सिंह ने कहा, ‘भारत की जो सीमाएं थीं वो अंग्रेजों ने तय की थी। उन्होंने जो संधियां की थीं उसी के मुताबिक हमारी सीमाएं बंटी हुई थीं। जिस वक्त भारत अपनी स्थिति बेहतर करने में जुटा था तभी चीन ने 50 के दशक में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। नेहरू जी ने जवानों से पीछे आने के लिए कह दिया। इससे पहले ल्हासा के अंदर भारतीय सेना की एक टुकड़ी तैनात होती थी। भूटान के अंदर भी भारतीय जवानों की एक टुकड़ी तैनात रहती थी।’ आगे भी उन्होंने कई बांटे बताई।

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने कहा, भूटान, लातुंग, सिक्किम ये रास्ता हुआ करता था। चीन ने जब वहां पर कब्जा करना चाहा था, तो नेहरू जी ने कहा कि सेना को पीछे ले आओ। तभी दलाई लामा बाघकर भारत आ गए और चीनियों ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इसी तरह चीन ने सिक्यांग पर भी कब्जा कर लिया।

आगे उन्होंने बताया ‘अब चीन के लिए दिक्कत थी कि वो तिब्बत और सिक्यांग को कैसे जोड़े, क्योंकि उन दोनों के बीच भारत का हिस्सा पड़ता था। जब चीन ने देखा कि भारत का तो कोई आता ही नहीं है, इस क्षेत्र में तो उन्होंने सड़क बनाना शुरू कर दिया। उस स्थान पर सड़क बनाना बहुत आसान हैं, क्योंकि वहां पठार क्षेत्र है। चीन ने सिक्यांग और तिब्बत को जोड़ने के लिए अक्साई चिन के बीच से एक रोड बना दी। इस तरह उसनेचीन ने दोनों क्षेत्र को जोड़ दिया।’ यह चीन ने बहुत चालाकी से किया था।

सिंह ने और जानकारी देते हुए बताया की फिर भारत को इसकी खबर लगी, तो भारत ने विरोध किया। चीन ने कहा कि वो तो उसका इलाका है। इसके बाद 1959 में चीन के राष्ट्राध्यक्ष भारत आए और उन्होंने पटाधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मिलकर हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा दिया। उसके बाद उन्होंने नेहरू जी को एक छोटे सा कागज का टुकड़ा दिया और कहा कि ये रहा नक्शा और बीच में एक रेखा खींच दी, जोकि कहीं से स्पष्ट नहीं थी।

इस चीनी नक़्शे में चीन लद्दाख के काराकोरम पर्वत को भी अपने हिस्से में दिखा रहा था, जबकि यह तो भारत के बहुत भीतर था। बार में मामला बिगाड़ा तो चीन ने भारत के साथ 1962 की जंग कर दी। वीके सिंह ने भारत-चीन के सीमा विवाद पर एक बड़ा दावा किया कि 1962 में नेहरू जी ने जंग के बाद कहा कि असम को खाली कर दो, लेकिन चीन असम तक नहीं घुस पाया। 1962 जंग की एक खास बात ये थी कि जहां-जहां पर भारतीय जवान रहे वहां पर चीन कब्जा नहीं कर पाया था।

जनरल वीके सिंह ने दवा किया की उस दिन भी हमारे फौजी यदि वहां अपना पराक्रम नहीं दिखते, तो नेहरू जी ने असम को खाली करने के लिए कह दिया था। उन्होंने कहा कि चीन फिर अपनी हरकत करता, परन्तु ऐसा ना करके वह मैकमोहन रेखा के पास चला गया, क्योंकि यहां पर उसका कोई दावा नहीं बन रहा था। परन्तु लद्दाख के अंदर आकर चीनी सेना ने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया, क्योंकि सिक्यांग और तिब्बत का बहुत जरुरी रास्ता जो बनता था।

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