मीडिया की खवरो के अनुसार दुनिया की दूसरी महाशक्ति मानी जाने वाली अमेरिका ने भी भारत को नाटो देशों के बारबर रेंक दिया है। रूस के साथ भारत के पहले से ही रक्षा संबंध प्रगाढ़ और प्राथमिक हैं।अधिकांश रक्षा और न्यूक्लियर परियोजनाएं रूस और भारत आपसी सहमति के आधार पर कर रहे हैं।
एशिया पेसेफिक देशों के साथ कोई भी रिश्ता रूस भारतीय हितों को देख कर ही बनाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश के समय से भारत को रेंक दिये जाने की जो प्रकिया शुरू हुई है वो डोनल्ड ट्रंप तक चल रही है। गोर करने वाली बात यह है कि ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूस से एस-400 मिसाइल system न लेने की बात कही थी।
सूत्रों की खवरो के मुताविक जी-20 शिखर सम्मेलन से पूर्व ट्रंप ने अपने विदेश मंत्री माइक पोम्पियो को भारत भेजकर इस सौदे को समाप्त करने का दबाव बनाने का प्रत्यन भी जारी रखा था। भारत ने पोम्पियो को दो टूक कहा था कि इस बारे में भारतीय हितों को सर्वोपरि रखेंगे। ट्रंप के प्रशासन में भारत को यह रेंक दिये जाने से यह सिद्ध हो गया है कि अमेरिकी राजनीति और कूटनीति में भारत की स्थिति बहुत ताकतवर है।
भारत को नाटो देशों के बराबर सम्मान दिये जाने का प्रस्ताव पारित होते ही पाकिस्तान की स्थिति गंभीर हो गई है। प्रस्ताव पारित होते ही पाकिस्तान को बहुत चिंता हो गई है। पाकिस्तान के साथ चीन भी अमेरिका के इस बात से हैरान है लेकिन अभी तक चीन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया सामने आती हुई नजर नही आई है।
सूत्रों की खबरो के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खांन जुलाई में अमेरिका यात्रा के समय भारत को नाटो देशों के बराबर रेंक दिये जाने के खिलाफ बोल सकते हैं। अमेरिकी संसद ने भारत को नाटो देशों के बराबर रेंक देने वाले प्रस्ताव को पारित कर दिया है। अब रक्षा संबंधों के मुद्दों में अमेरिका भारत के साथ नाटो के अपने पड़ोसी देशों जैसे इजरायल और साउथ कोरिया की तर्ज पर ही सम्बंध बनाएगा।
वित्त वर्ष 2020 के लिए नैशनल डिफेंस ऑथराइजेशन ऐक्ट को अमेरिकी सेनेट ने पिछले हफ्ते प्रस्ताव स्वीकार किया है। अब इस प्रस्ताव में संशोधन के प्रस्ताव को भी स्वीकृति मिल गई है। सेनेटर जॉन कॉर्निन और मार्क वॉर्नर की ओर से पारित किए गए प्रस्ताव में कहा गया था, कि हिंद महासागर में भारत के साथ मानवीय सहयोग, आतंक के विरुद्ध संघर्ष, काउंटर-पाइरेसी और मैरीटाइम सिक्यॉरिटी पर कार्य करने की आवश्यकता है।
खवरो के अनुसार मेरिका ने भारत को 2016 में बड़ा रक्षा हिस्सेदार माना था। इस बात का अर्थ है कि भारत उससे अधिक उन्नति और महत्वपूर्ण तकनीक वाले हथियारों को ले सकता है। अमेरिका के पड़ोसी देशों की तरह ही भारत उससे हथियारों और तकनीक को ले सकता है।



