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Delhi: कहते है ना कि जब इरादा कुछ बड़ा करने का हो और उसके दृढ़ संकल्प भी गहरा हो तो फिर कोई चीज आपको आपका मुकाम हासिल करने से नहीं रोक सकती। अगर आप शांत मन से मेहनत करते हैं, तो आपकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो आप आसानी से सफलता पा सकते हैं। कभी भी सफलता अमीरी गरीबी को नही देखती।
आपके मजबूत इरादे आने वाली मुश्किलों से लड़ने की ताकत देती हैं। बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है कि आप कड़ी मेहनत करते रहें। यदि मन में किसी लक्ष्य को पाने की ठान ली जाए तो बड़े से बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है, इस IAS ने। बचपन में कभी मां के साथ सड़कों पर चूड़ी बेचने वाले रमेश आज आईएएस अफसर (IAS Officer) हैं। कठिन परिस्थितियों में इस मुकाम को हासिल करने वाले रमेश की कहानी बेहद संघर्ष से भरी रही है।
कौन है ये IAS रमेश घोलप
आज हम जिस व्यक्ति के बारे में बता रहे हैं, उनका नाम है रमेश घोलप (Ramesh Gholap)। इनका जन्म महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ है। जीने का सही ढंग कोई इनसे सीखे। एक ऐसा भी समय था जब इन्होंने अपनी मां के साथ चूड़ियां बेचकर अपना पेट पाला और आज वो एक आईएएस अधिकारी है। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वारसी तहसील के महागांव में जन्में रमेश घोलप ने जब होश संभाला तो अपने परिवार सहित खुद को दो समय की रोटी के लिए ज़िंदगी से जूझता पाया।
रमेश के पिता एक साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते थे। इस दुकान से रमेश के परिवार की रोटी चल भी सकती थी, लेकिन इस रोटी और रमेश के पिता के बीच खड़ी थी शराब की बुरी आदत। पैर में पोलियो, घर चलाने के पैसे नहीं, पिता की असमय गुजर जाने पर मां के साथ सड़क किनारे चूड़ी बेचने का काम। जिस समय बच्चे अपना बचपन खेल कूद में गुजरते है, तब से ही रमेश ने मेहनत करना शुरू कर दी थी। माँ के साथ जाकर उनका हाथ बटाते थे। कभी भी हार नही मानी।
Inspirational.!
Story of Ramesh Gholap, a disabled bangle seller who is now an IAS officer. https://t.co/71rI5ZGyXX pic.twitter.com/8cq996R97y— Prasar Bharati प्रसार भारती (@prasarbharati) May 4, 2016
मन मे कुछ बड़ा बनने की चाह ने उनको हारने नही दिया। ना कभी अपनी आर्थिक परिस्थिति का रोना रोया। रमेश घोलप पर जिंदगी चुनौतियों के पहाड़ खड़े करती जा रही थी और वे हर बार मुस्कुराकर उन चल देते थे, मानों उनके कदम रुकने के लिये बने ही नहीं। महाराष्ट्र के महागांव के रमेश घोलप की सफलता की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा से कम नही है। गरीबी के दिन काटने वाले रमेश ने अपनी जिंदगी से कभी हार नहीं मानी और आज युवाओं के लिए वो मिसाल बन गए हैं। वर्तमान में रमेश घोलप को उपायुक्त के पद पर झारखंड में नियुक्त किया गया है।
हार से निराश नही हुये
गरीबी से लड़ाई लड़ आईएएस बने रमेश घोलप (Ramesh Gholap IAS) ने पिछले साल बतौर एसडीओ बेरमो में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इन्होंने अभाव के बीच ना सिर्फ आईएएस बनने का सपना देखा, बल्कि इसे अपनी मेहनत से सच भी कर दिखाया। काम किया, रुपए जुटाए और फिर पढ़ाई की। अपनी पढ़ाई को हमेशा जारी रखा। मन मे सपना था कुछ बड़ा करने का।
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1/ IAS officer Ramesh Gholap (DC, Koderma) was out distributing blankets to the poor when he saw a frail little girl standing in line. On enquiry, he found out that the girl was 11-year-old Sapna whose parents had died recently, leaving her with nowhere to go. pic.twitter.com/tMWjhX0tft— The Better India (@thebetterindia) September 9, 2020
कलेक्टर बनने का सपना आंखों में संजोए रमेश पुणे पहुंचे। पहले प्रयास में असफल रहे, पर वे डटे रहे। उन्होंने हार नही मानी। अपने हौसलों को और मजबूत बना दिया। साल 2011 में पुन यूपीएससी की परीक्षा (UPSC Exam) दी। इसमें रमेश 287वां स्थान प्राप्त कर आईएसएस (IAS) बन चुके थे। पर खुशी तब दोगुनी हो गई, जब वे स्टेट सर्विस की परीक्षा में राज्य में फर्स्ट आए।
पिता शराब पर खर्च कर देते थे सारा पैसा
परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी कि हम अच्छी स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर सके। पेट भरने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। बचपन में मां के साथ दिनभर चूड़ी बेचता था। इससे जो पैसे जमा होते थे, उसे पिताजी अपनी शराब पर खर्च कर देते थे। ना रहने के लिए घर था और ना पढ़ने के लिए पैसे। मौसी के इंदिरा आवास में ही हम रहते थे। मैट्रिक परीक्षा से एक माह पूर्व ही पिता का साया उठ गया।
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पिता जी के गुजर जाने के बाद टूट गया था। विकट परिस्थिति में मैट्रिक परीक्षा दी और 88.50% अंक हासिल किया। मां को सामूहिक ऋण योजना के तहत गाय खरीदने के नाम पर 18 हजार ऋण मिले। इस राशि ने मुझे पढ़ाई जारी रखने में हेल्प की। पढ़ाई बंद नही की। अपनी पढ़ाई जारी रखी। फिर इस पैसे को लेकर मैं तहसीलदार की पढ़ाई करने निकला था। बाद में इसी रुपए से आईएएस की पढ़ाई की। दीवारों पर नेताओं की घोषणाओं लिखने का काम किया, दुकानों का प्रचार किया, शादी की पेंटिंग करता था और पढ़ाई के लिए पैसे की इकट्ठा करता था।
आर्थिक तंगी ने कमजोर नही होने दिया
घर में हमेशा आर्थिक तंगी रही। पिता शराबी थे, जितना पैसा कमाते थे सारा शराब में उड़ा देते थे। इसलिए वह घर के सदस्यों की जिम्मेदारी अच्छी तरह नहीं निभाया करते थे। परिवार में पेट भरने के लिए रोटी बहुत मुश्किल से आती थी। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता चला गया उसके पिता की सेहत खराब होती चली गई और जिस दिन रमेश का 12वीं क्लास का लास्ट एग्जाम था उसी दिन उनके पिता का देहांत हो गया।
आईएएस रमेश घोलप का जीवन हमेशा से वैसा नहीं था जैसा आज है। सही मायने में कहें तो रमेश ने अपने जीवन की रूपरेखा खुद तय करी है। खुद उन्होंने अपना वर्तमान रचा है। जिन हालातों और परिवार में उनका जन्म हुआ, वह उनके हाथ में नहीं था पर उन हालतों को बदलने का जज्बा जरूर उनके हाथ में था।
RAMESH GHOLAP IAS JH CADRE IS TAKING & DISTRIBUTE EDUCATION KIT AMONG POOR CHILDREN.
SALUTE HIM FOR GREAT WORK. pic.twitter.com/keJ07ECtAN— Sudhir Kumar 🇮🇳 (@SudhirBadal) May 25, 2016
उन्होंने आर्थिक तंगी के होते हुए भी कभी हार नही मानी। हमेढ मुस्कुरा कर आगे बढ़ते चले गये। पिता की पंचर की दुकान, मां सड़क किनारे चूड़ी बेचती थी, घर में पढ़ाई का वातावरण तो छोड़ो कोई शिक्षित भी नहीं था। फिर भी रमेश ने वो सपना देखा जिसे बड़े-बड़े भी पूरा नहीं में असमर्थ रहते है। केवल रमेश ने यह सपना देखा बल्कि अपने दम पर उसे पूरा भी किया।
बांये पैर में पोलियो
रमेश के जीवन में बचपन से ही बहुत सारी परेशानियां कुंडली बनाकर उनके जिंदगी पर बैठी थी। इतनी समस्याएं रमेश की हिम्मत कम करने के लिये जैसे कम पड़ रही थीं कि उन्हें बहुत कम उम्र में बायें पैर में पोलियो हो गया। पैसे की कमी को विकलांगता का साथ भी मिल गया था। पर कहते हैं न कि किस्मत उनकी भी होती है, जिनके हाथ नहीं होते, शायद इसी तर्ज पर रमेश का पैर जरूर खराब हुआ था पर उनके कदम रुकने वाले नहीं थे।
उन्होंने कभी अपनी कमजोरी सामने नही आने दी। हर परिस्थिति से डटकर मुकाबला करते थे। हार मानकर बैठने वालों में से नही थे। कभी अपनी गरीबी या अपनी जिंदगी का रोना नही गया। हमेशा इतनी तकलीफ के बाद भी मुस्कुरा कर आगे बढे। रमेश ने अपनी इस कमजोरी को कभी अपनी सफलता (Success) के रास्ते में नहीं आने दिया। वो निरंतर आगे बढ़ते रहे। आज नतीजा सबके सामने है।
संघर्ष भरा बचपन
रमेश के पिता गोरख घोलप की साइकिल पंचर की दुकान थी। दुकान से ऐसे ही कमाई खास नहीं होती थी, उस पर उन्हें शराब की आदत थी। जिसके चलते कमजोर हो गये थे। 2 वक़्त की रोटी भी नसीब से मिलती थी। ऐसे में जो थोड़ी बहुत कमाई होती भी थी, वो शराब पर खर्च हो जाती थी। इसी आदत की वजह से वे बीमार रहने लगे और एक दिन छोटी बीमारी ने उन्हें ऊना शिकार बना लिया।
From selling bangles to becoming an IAS officer – who says hard work and determination don’t pay off?#IAS_Ramesh_Gholap #IAS #Inspiration pic.twitter.com/Z2O52EVws7
— BYJU'S Exam Prep (@Byjus_ExamPrep) March 20, 2018
इसी बीमारी के चलते उनका देहांत हो गया। चूंकि रमेश के गांव में पढ़ाई की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। गांव में शिक्षा के संसाधनों की कमी थी।
इसलिये वे अपने चाचा के पास बरसी में पढ़ रहे थे। उस समय बरसी से उनके गांव का किराया मात्र 07 रुपये था जिस पर भी विकलांग होने की वजह से रमेश को केवल 02 रुपये किराया देना था।
किस्मत का लेख देखिये रमेश के पास उस समय दो रुपये की भी व्यवस्था नहीं थी। पड़ोसियों ने पैसे दिये तो वे अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल हो पाये। इसी समय उनकी बारहवीं की परीक्षा भी थी, लेकिन इतने बड़े दुखो के पहाड़ के बावजूद रमेश ने बारहवीं में 88.50 प्रतिशत अंक प्राप्त किये।
सड़को पर मां के साथ बेची चूड़ियां
पिता के देहांत के बाद परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। माँ ने परिवार पालने की जिम्मेदारी खुद ही उठाई। ऐसे में रमेश की मां विमल घोलप सड़क किनारे चूड़ियां बेचकर गुजारा करने लगीं। पेट भरने के लिए काम शुरू कर दिया। रमेश ने भी मां के काम में साथ दिया और उन्होंने भी चूड़ियां बेचीं। लेकिन शिक्षा के प्रति उनका झुकाव उन्हें निरंतर इसी दिशा में जाने के लिये प्रेरित करता था। कभी पढ़ाई से दूरी नही बनाई।
रमेश ने बारहवीं के बाद स्नातक पास किया और शिक्षा के क्षेत्र में डिप्लोमा लेकर टीचर बन गए और अपने गांव में ही पढ़ाने लगे। लेकिन उनका मन तो कुछ और बनने का था। बहुत दिन उनका मन इस नौकरी में नहीं लगा, क्योंकि उनके दिमाग में तो अफसर बनने का जुनून चढ़ा था। रमेश ने नौकरी छोड़ दी और दिन-रात यूपीएससी की इस परीक्षा की तैयारी करने लगे।
IAS officer Ramesh Gholap is currently the Deputy Commissioner of Koderma, Jharkhand. Recently he rescued 35 children out of forced labour and enrolled them in local schools. Proud of you Sir. #inspiration #rameshgholap #IAS #society #rescue #childlabour #education #sociostory pic.twitter.com/ZEeU204NZp
— Socio Story (@SocioStory) November 19, 2020
गरीबी ने रमेश का साथ नही छोड़ा, यहां भी गरीबी आड़े आयी तो मां ने कर्ज लेकर रमेश को परीक्षा की तैयारी के लिये पुणे भेजा। रमेश ने पहला अटेम्पट 2010 में किया जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद वे दोगुनी मेहनत से तैयारी में जुट गये और आखिरकार साल 2012 में यूपीएससी परीक्षा में 287वीं रैंक हासिल की। वर्तमान में रमेश झारखंड के खूंटी जिले में बतौर एसडीएम (SDM) तैनात हैं।
सफलता का रास्ता ()
रमेश की सफलता ही कहानी हमें बताती है कि जीवन में हमेशा बड़े सपने देखो। उनको पूरा करने के लिए दिन रात पीछे पड़ जाओ। कभी भी परिस्थिति का रोना नही रोना। हर पल मुस्कुरा कर आगे बढ़ते चले जाना है। जिसे सच में कुछ बड़ा हासिल करना होता है, वह रास्ते में आने वाली किसी भी तरह की परेशानी पर नजर ही नहीं डालता, बस अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है, वरना रमेश का पूरा जीवन ही ऐसी दुखद घटनाओं से भरा पड़ा था कि अगर वे उन परेशानी को देखते तो शायद अजितन बड़ा मुकाम ना हासिल कर पाते। हर परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया।



