झाड़ू-पोंछा का काम करने वाली लड़की ने टहनी से हॉकी खेलना सीखा और अब देश की टीम से भी खेलेगी

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Sagu Dawar Hockey Player
Mandsaur hockey player Sagu Dabur selected in the Madhya Pradesh Team for the Junior Hockey player. Story of Sagu Dawar Hockey player MP.

Photo Credits: Twitter

Mandsaur: हमारे देख में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। बस पैसो और संसाधनों के अभाव में कोई प्रतिभा ख़त्म नहीं होनी चाहिए। क्या आपने कभी सोचा है की आपके घर पर काम करने वाली मेड या नौकरानी के बच्चे जीवन में कुछ बड़ा भी कर सकते हैं और टैलेंटेड भी हो सकते हैं। किसी गरीब या सफाईकर्मी के बच्चे अफसर बन जाएँ या देश का प्रतिनिधित्व करें, तो वाह पल यादगार और हैरान करने वाला बन जाता है। इस लिस्ट में एक बेटी भी शामिल हो गई है।

सागु जैसी बेटियां आज हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। जो मुश्किल हालातों का सामना करते हुए भी अपने सपनों को पूरा कर जाती हैं। सागु एक गरीब परिवार से आने वाली बिटिया है। सागु आज मध्यप्रदेश राज्य की हॉकी टीम (Madhya Pradesh Hockey Team) का हिस्सा है। वह एक राष्ट्रीय स्तर की हॉकी खिलाड़ी है और भविष्य में देश की महिला हॉकी टीम से भी वह खेलेगी, ऐसी पूरी उम्मीद है।

MP Hockey Team का हिस्सा बनकर अपना हुनर दिखाया

मध्यप्रदेश के मंदसौर (Mandsaur) जिले की सागु डाबर (Sagu Dawar) को प्रदेश की हॉकी टीम के लिए चुना गया है। उसने पिछले साल रांची में हुई जूनियर हॉकी चैंपियनशिप में MP की टीम का हिस्सा बनकर अपना हुनर दिखाया है। इसके बाद हॉकी चैंपियनशिप के लिए हिमाचल और ओडिशा में मध्यप्रदेश टीम का नेतृत्व किया। अब तक सागु 7 राष्ट्रीय मैचों में हिस्सा ले चुकी हैं। देश में केरल, असम, रांची, भोपाल में नेशनल मैच खेल चुकी है।

सागु ने एक पत्रकार को बताया की अब वह महिला हॉकी विश्वकप में भारतीय हॉकी टीम का की खिलाडी बनकर देश के लिए मैडल लाये। सागु के यहां तक पहुंचने का सफर भी बहुत कठिन रहा। वह MP के मंदसौर की झुग्गी बस्ती के कच्चे मकान में रहा करती थीं। उसकी फॅमिली में कमाई का अच्छा साधन नहीं था। वह अपने भाई-बहनों के साथ स्कूल जाता और फिर अपनी मां के साथ काम में हाथ बंटाती थी। दूसरों के यहाँ काम करना उनकी कमाई का जरिया था। सागु 5 बहनों और 3 भाइयों में सबसे छोटी हैं।

अपनी मां के साथ घरों के जूठे बर्तन भी धोये

सागु के पिता भुवान डाबर के निधन के बाद माँ मेघा डाबर ही परिवार का लालन पालन करती रहीं। पिता के देहांत के बाद परिवार के बच्चों ने मां का काम में हाथ बंटाया। सागु ने एक पत्रकार को बताया की जब मैं छोटी थी, तो मां के साथ दूसरों के घर जाती थी। मां घरों के जूठे बर्तन धोती और मैं उन्हें पोंछकर रखती जाती थी। वो झाडू लगाती और मैं पोछा लगाने में माँ का हाँथ बटाती थी। स्कूल भी जाती थी। उनमे से दो बहनों की शादी हो गई और कुछ साल पहले एक भाई का दुर्घटना में निधन हो गया।

स्कूल में सहेलियों को हॉकी खेलते देखा

इस घटना के बाद उनकी मां बहुत निराश हो गईं। तब सगु को मन किया की पढ़ाई करके कुछ अच्छा काम किया जाये और माँ की मदत की जाये। सागु ने इसके पहले कभी किसी खेल में कोई इंट्रेस्ट नहीं दिखाया था। फिर 7वीं क्लास में आने के बाद उसने स्कूल में अपनी सहेलियों को हॉकी खेलते देखा और पहली बार हॉकी स्टिक देखीं।

सगु का कहना है की जब मैंने हॉकी को अपने हांथो में थामा, तो ऐसा लगा कि सबसे ताकतवर चीज है। अब मैं हॉकी खेलना चाहती थी।परन्तु स्कूल में हॉकी उन्हीं बच्चों को मिलती थी, जो टीम का हिस्सा होते। सागु ने अपनी मां से कहा कि वो हॉकी खेलना चाहती है। लेकिन मां के पास इतने पैसे नहीं थे, की हॉकी दिलवा सके।

लकड़ी की मोटी टहनी ने हॉकी खेली

माँ ने सागु को एक मोटी टहनी लाकर दी। फिर दोनों ने टहनी को साफ किया और खेलने लायक बना लिया। इसके बाद वो स्कूल आकर उसी टहनी से पत्थरों को हिट करके खेलती। फिर कुछ रद्दी कपडों से एक बॉल भी बना ली और बहुत प्रैक्टिस की।

सागु रोज सुबह 6 बजे उठती और 7 से 8 बजे तक तीन गाड़ियों की सफाई का काम करती थी, इसके बाद वो माँ के काम में मदद करने के बाद स्कूल जाती। फिर शाम को स्कूल से आकर घर का काम करती और अपनी हॉकी की प्रैक्टिस किया करती। गाड़ियों की सफाई के काम के उसे 1500 रुपए हर महिमे मिलते, जिससे वो खुद ही अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल रही थी। जिन घरों में माँ काम करती थीं वहां से कभी खाना, कभी पैसे, कभी कपडे मिल जाते थे।

हॉकी की प्रैक्टिस कभी मिस नहीं की

सागु को स्कूल की हॉकी टीम में शामिल कर लिया गया। अब सागु हॉकी की प्रैक्टिस स्कूल और घर दोनों जगह करने लगी। सागु ने पैसों की कमी के चलते अपनी पढाई और हॉकी प्रैक्टिस (Hockey Practice) बंद नहीं की। सागु ने हॉकी की प्रैक्टिस कभी मिस नहीं की। सागु के स्कूल कोच उसकी मेहनत से बहुत खुश थे। स्कूल लेवल पर सागु ने बहुत मैच खेले और टीम को जीत दिलाई। इसके बाद हॉकी कोच अविनाश उपाध्याय और रवि कोपरगांवकर की नजर उस पर पड़ गई।

उन्होंने सागु (Sagu Dawar) की की योग्यता को परखकर उनकी खेल तकनीक में और सुधर कार्य किया। फिर उसे जिला स्तर से राज्य और राज्य से राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का अवसर दिया। सागु बताती हैं कि जब टूर्नामेंट में जाने के लिए पैसों की जरूरत होती थी, तो मा लोगों से उधार लेती थी।

वह दूसरों के पुराने बैग लेके हॉकी टूर्नामेंट में खेले दूसरे शहरों में जाती रही। सागु के खेल को देखकर, जिला हॉकी एसोसिएशन ने सागु की मदद की। अभी सागु 12वीं क्लास में पढ़ रही है और मध्यप्रदेश की महिला हॉकी टीम से खेल भी रही है। उसका भविष्य भारत की हॉकी टीम में देखा जा रहा है।

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