Sunday, October 17, 2021
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इंजीनियरिंग छात्र गरीब बच्चों के शिक्षक बने, कॉलेज ग्राउंड में खोला गरीब बच्चों का स्कूल, मिली सफलता

Piyush B Mishra

Delhi: बात है साल 2017 से जब पीयूष इंद्रप्रस्थ इंजीनियरिंग कॉलेज गाजियाबाद से बीटेक अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। इस दौरान कॉलेज में निर्माण का कार्य हो रहा था। वहाँ मज़दूर सुबह से शाम तक मजदूरी में लगे रहते थे और उनके छोटे-छोटे बच्चे इधर-उधर घूम अपना समय यूँ ही बर्बाद करते रहते थे।

पीयूष (Piyush B Mishra) इस बीच कॉलेज के हॉस्टल में ही रहते थे और प्रतिदिन यह सब करीब से देखा करते थे। पीयूष को एक दिन इन बच्चों को पढ़ाने का ख़याल आया और फिर क्या था, पीयूष पहुँच गए इन मजदूरों के पास।

शुरूआत में कुछ मज़दूरों ने अपने बच्चों को पढ़ाने में कोई रूचि नहीं दिखाई, वहीं ये बच्चे खुद भी पढ़ना नहीं चाहते थे। हालाँकि बाद में समझा बुझाने के बाद शिक्षा के मायने जान कर बच्चे पढ़ाई के लिए आने लगे फिर पीयूष ने एक खुले मेदान में शाम को बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। पीयूष ने अपने स्कूल को ‘संस्कृति स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस’ (Sanskriti School of Excellence) नाम दिया।

शुरुआत में कुछ परेशानी ज़रूर सामने आईं जैसे कि बच्चों के पास किताबें नहीं थीं। हालाँकि ये जरुरतें बाद में वित्तीय सहायता से पूरी होने लगीं। वक़्त के साथ जब इन बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तब पीयूष के साथी मित्र भी शाम में बच्चों को पढ़ाने के लिए उनका साथ देने लगे I एक छोटा सा स्कूल अब खुले मैदान में शुरू हो गया था।

बच्चों की मदद के लिए बनाया ‘द रोप ऑफ़ होप’ (The Rope Of Hope)

एक दिन पीयूष (Piyush Mishra) को खुले मेदान में बच्चों की पढ़ाई करते देख कॉलेज के चेयरमैन ने इस काम के लिए कॉलेज की क्लास को प्रयोग करने की अनुमति दे दी। फिर क्या था, अब शाम में बच्चों की पढ़ाई कॉलेज के ही एक रूम में चालू होने लगी।

पीयूष अपने दोस्तों की सहायता से कानपुर में कुछ गरीब बच्चों को बिना किसी फीस के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करवा रहे हैं। पीयूष ने अपने सहयोगि दोस्तों के साथ अपने ग्रुप को एक नाम भी दिया, द रोप ऑफ़ होप।

संस्कृति स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस (Sanskriti School of Excellence) में पढ़ा रहे बच्चे आज इसरो और चंद्रयान से जुड़ी स्कूली स्तर की प्रतियोगताओं मे हिस्सा ले रहे हैं। स्कूल को यूनाइटेड नेशन द्वारा करमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है। यह बड़े सम्मान की बात है और उनका अचीवमेंट है।

यहाँ बच्चों को किताबी कीड़ा, रत्तु टोटा नहीं बनाया जाता, बल्कि उनको उनके मन की पढ़ाई कराई जाती है। पीयूष का पूरा प्रयास हैं कि संस्कृति स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस एक मान्यता प्राप्त या पंजीकृत स्कूल बने लेकिन सरकार द्वारा नियमों में कुछ परिवर्तन के कारण यह काम अभी अटका पड़ा है।

ENN Team
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