
Agra: किसी ने ही कहा है की जरुरत ही अविष्कार (Invention) की जननी होती है। किसी भी चीज़ का आविष्कार करने या बनाने के लिए किसी डिग्री या पढाई लिखाई की आवश्यकता नहीं होती है। लगन होने या जरुरत पढ़ने पर जुगाड़ से बनाई गई चीज़ कभी कभी बड़े अविष्कार का रूप ले लेती है। ऐसी ही कहानी उत्तर प्रदेश के आगरा के रहने वाले एक चायवाले (Chaiwale) की है।
UP के आगरा (Agra) में एक चाय वाले ने एक ऐसा काम कर दिया है, जो आगे चलकर दुनिया के लिए एक उपहार बन सकता है। 5वीं पास चाय वाले ने यह आविष्कार किया है। बता दें की इन्होने अपने दोस्तों के साथ मिलकर हवा से चलने वाला इंजन (Air-Powered Engine) बना दिया है।
इसे बनाने में उन्हें 14 साल का वक़्त लग गया। इन्होने एक हिंदी अख़बार को बताया कि यदि यह इंजन बाजार में आ जाए, तो वायु प्रदूषण खत्म हो जाएगा। इस टेक्निक से ट्रेन से लेकर बाइक भी चल सकती है। इस इंजन को बनाने में उन्होंने अपनी सारी पूंजी लगा दी। उन्हें अब सरकार से किसी सहायता की जरुरत है।
बता दें की आगरा के पास फतेहपुर सीकरी निवासी त्रिलोकी (Triloki Chaiwala in Agra) जिनकी उम्र 50 साल है, वे एक चाय की दुकान चलाते थे। इसके अलावा वे साइकिल मरम्मत का भी काम करते थे। साथ ही साथ वे ट्यूबवेल के इंजन बनाने का काम कर लिया करते थे। उन्होंने हिंदी अख़बार को बताया की एक दिन ट्यूब में हवा भरते समय टैंक का वाल्व लीक हो गया। फिर अचानक हवा के प्रेशर से टैंक का इंजन उल्टा चलने लगा। यही देखकर वे हैरान रह गए।
उन्होंने बताया की हवा की पावर इतनी तेज़ थी की वे चकित रह गए। उनके सोचा कि हवा से अगर मशीन चले, तो काफी कम खर्चा आएगा। बस फिर क्या था, वे इसी काम में लग गए। इसके लिए वह 14 साल तक अपने परिवार से अलग रहे और इस अविष्कार में लगे रहे। हाईवे किनारे टोल प्लाजा के पास उन्होंने झोपड़ी को अपना एक छोटा का घर और जुगाड़ का रिसर्च सेंटर बना लिया था।
इस शानदार इंजन के अविष्कारक त्रिलोकी (Air Engine Innovator Triloki) की टीम में उनके दोस्त संतोष चाहर भी शामिल रहे हैं। उनकी इस टीम में सिर्फ वही एक पढ़े लिखे ग्रेजुएट हैं। बाकी के सभी लोग 5वीं से ज्यादा नहीं पढ़े हैं। इनकी टीम के लोग बताते है कि कोई भी इंजन इंसान के शरीर की तरह काम करता है। हमने इस मशीन में इंसान के फेफड़ों के जैसे दो पंप प्लांट किया हैं। इस इंजन को अपने हाथ से घुमाकर हवा का प्रेशर बनाया जाता है। ऐसा करने से इंजन स्टार्ट हो जाता है।
इस इंजन (Pneumatic Engine) की खास बात यह है की यह इंसान के फेफड़ों की तरह हवा खींचता और फेंकता है। इसमें हवा के प्रेशर से इंजन चलता है। यह इंजन लिस्टर इंजन की बॉडी और व्हील से तैयार किया गया है। इन इंजन को चलने के लिए मोबिल ऑयल की आवश्यकता पढ़ती है।
इसमें मोबिल ऑयल गरम भी नहीं होता है। इसके ऑयल में डीजल-पेट्रोल गाड़ियों के इंजन से 3 गुना अधिक समय तक चिकनाई बनी रहती है। एक अन्न ऑब्शन के तौर पर इसे स्टार्ट करने के लिए बैटरी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। टीम का कहना है की इस इंजन को बनाने में त्रिलोकी का 50 लाख का एक प्लाट और खेत बिक गया। कुछ लागत दूसरे साथियों ने भी लगा दी।
चाय वाले के जुनून से आविष्कार:आगरा में 5वीं पास ने 14 साल की मेहनत से बनाया हवा से चलने वाला इंजन, दोस्तों ने दिया साथ और कार दिया कमाल। pic.twitter.com/aQ9Bq18jHi
— sanatanpath (@sanatanpath) November 8, 2021
त्रिलोकी के दोस्त बताते है की दिल्ली में बौद्ध विकास विभाग में सितंबर 2019 को इंजन पेटेंट कराने का आवेदन किया गया था। उस वक़्त इंजन तैयार नहीं हुआ था। ऐसे में बिना चालू इंजन दिखाएं पेटेंट नहीं हो पा रहा था। इसके पुर्जे भी कहीं मिलते ना थे। इस स्थिति में टीम ने खुद वेल्डिंग की। फिर हाल ही में यह इंजन स्टार्ट हुआ और काम करने लगा। अब त्रिलोकी के पास कुछ पूंजी नहीं बची है। अब उन्हें सरकार से मदत की उम्मीद। अगर इंजन पेटेंट होता है, तो फैक्ट्री लगाने के जरुरी पूंजी नहीं हैं।
त्रिलोकी ने हिंदी अख़बार को बताया कि इन इंजन में हवा का कोई रूप चेंज नहीं होता है। यह सिर्फ प्रेशर के जरिए काम करता है। मार्किट में इस इंजन के इस्तेमाल होने से वायु प्रदूषण बिल्कुल खत्म हो सकता है। उनका कहना है कि यह इंजन जेम्स वाट के स्टीम व जर्मन के रेडॉल्स के डीजल इंजन की बराबर ही पावर देता है। अगर यह इंजन चलाया जाए, डीजल-पेट्रोल की कोई जरुरत नहीं है।



