अगर ज़मीन उपजाऊ ना भी हो, तो अश्वगन्धा की खेती से ऐसे कमाई करें, कई गुना मुनाफा बनाये

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Ashwagandha ki Kheti
How to do Ashwagandha cultivation in hindi. You can aslo cultivate Ashwagandha on barren land. Ashwagandha ki Kheti kaise karen.

File Photo Used

Bhopal: भारत देश में पुराने समय में लोग अपने क्षेत्र के हिसाब से खेती किया करते थे। लेकिन आज लोग हर प्रकार की खेती करते है। किसान उस खेती को करना ज्‍यादा पसंद करते है, जिसमें उसे ज्‍यादा मुनाफा मिेले। अश्वगन्धा (Ashwagandha) की बात की जाये, तो हमारे देश मे लगभग 5000 हेक्टेयर भूमि में इसकी खेती की जाती है। अश्‍वगंधा की हर साल पूरे देश में करीब 1600 टन की पैदावार होती है।

लेकिन इसकी मॉंग दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। आज भारत में इसकी मॉंग करीब 7000 टन की है। इसी वजह से मार्केट में इसके दाम अच्‍छे खासे प्राप्‍त हो जाते है। इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए आज हम आपको अश्‍वगंधा की खेती करने का तरीका बताऍंगे। ताकि आप भी इसकी खेती करके इसकी मॉंग को पूरी कर सके और ज्‍यादा से ज्‍यादा मुनाफा प्राप्‍त कर सके।

अश्‍वगंधा की खेती (Ashwagandha Ki Kheti) हमारे देश के केवल ठंडे प्रदेशों में नही की जाती है। इसकी खेती सबसे ज्‍यादा मध्‍यप्रदेश के मन्‍दसौर, मनासा, भानपुरा, नीमच और जावद में की जाती है। इसके साथ ही राजस्‍थान राज्‍य के नागौर जिले में भी अश्‍वगंधा की खेती अधिक की जाती है। राजस्‍थान के जिले नागौर के अश्‍वगंधा की मार्केट में अनोखी पहचान है।

खेती के लिए क्षारीय जल की होती है आवश्‍यकता

अश्‍वगंधा एक नकदी फसल है। इसकी खेती कम उपजाऊ जमीन पर भी की जा सकती है। इसके साथ ही इसकी खेती के लिए ज्‍यादा पानी की भी आवश्‍वकता नहीं होती है। कम लागत में ज्‍यादा मुनाफा कमाने का यह एक बहुत ही अच्‍छा तरी‍का है।

इसे हम फसल चक्र के एक विकल्‍प के तौर पर भी अपना सकते है। जहां का पानी खारा होता है। वहां पर अश्‍वगंधा की खेती आसानी से की जा सकती है। क्‍योंकि अश्‍वगंधा पर अगर क्षारीय जल की सिंचाई की जाती है, तो इसकी पैदावार 2 से लेकर 2.5 गुना तक बढ़ जाती है।

कम खाद मे ही मिल जाती है अच्‍छी पैदावार

अश्वगन्धा की खेती (Ashwagandha Farming) करना बहुत ही आसान है। इसमें किसान को ज्‍यादा परेशान होने की आवश्‍यकता नहीं होती है। इसे ना ही ज्‍यादा पानी की जरूरत होती है और ना ही ज्‍यादा खाद की। अश्‍वगंधा को पशु भी नहीं खाते है। इसलिए इसकी देख रेख करना भी किसान को आसान हो जाता है।

अश्‍वगंधा का हर एक भाग किसान को लाभ पहुँचाता है। क्‍योंकि इसकी पत्‍ती से लेकर बीज तक हर चीज की मार्केट में डिमांड रहती है। अश्‍वगंधा के पेड का हर भाग काम में आता है। विशेषकर औषधियों के निर्माण में इसका उपयोग बहुतायत में किया जाता है।

अश्वगन्धा की विशेषताएँ

अश्वगन्धा का उपयोग एक दवा के तौर पर किया जाता है। इसकी जड़ से लेकर तना, पत्‍ती, बीज हर चीज का इस्तेमाल आयुर्वेदिक तथा यूनानी दवाओं के निर्माण में किया जाता है। कहा जाता है, कि अश्‍वगंधा हमारे तनाव को दूर करने में सहायक होता है। इसके साथ ही यह शरीर की इम्‍यूनिटी में भी वृद्धि करता है। यह हमारे तंत्रिका तंत्र को भी बहुत मजबूत बनाता है।

इसके अलावा कई गंभीर बीमारियों के इलाज में भी इसका इस्‍तेमाल होता है, जैसे त्‍वचा रोग, कमर दर्द, पेट में कृमि, नेत्र रोग, शक्‍ति वर्धक, गठिया, फेफडे में सूजन, कैंसर, लकवा और रीढ़, पेशाब, तपेदिक इत्‍यादि।

अश्‍वगंधा का उपयोग शक्‍तिवर्धक च्‍यवनप्राश को बनाने में बहुत अधिक किया जाता है। अश्‍वगंधा में विथेनिन, विथेफेरिन, सोमिनीन , निकोटीन, सोम्‍नीफेरीन, कोलीन, बिथेनेनीन, विटानिऑल, स्‍टार्च, शुगर, ग्‍लाइकोसाइड इत्‍यादि एल्‍केलाइड्स पाये जाते है।

किस माह में की जा सकती है अश्‍वगंधा की खेती

अश्वगन्धा को वर्ष में दो बार लगाया जा सकता है। इसे रबी और खरीफ दोनों ही फसलों के समय में लगाया जा सकता है। रबी की फसल को फरवरी-मार्च माह में बोया जाता है। तो वही खरीफ की फसल को अगस्त-सितम्बर माह में बोया जाता है। अश्वगन्धा की उपज हमें हर 5 महीने में प्राप्‍त हो जाती है। इसकी उपज में मुख्‍य जड़ होती है। जिस क्षेत्र का तापमान 35 डिग्री हो वहा पर अश्‍वगंध की खेती आसानी से की जा सकती है।

किस तरह की जाये अश्वगन्धा की खेती

अश्वगन्धा की खेती करने के लिए सबसे पहले बुआई करना होता है। इसके लिए हम बीजो को मार्केट से लाकर बुआई कर सकते है, या फिर नर्सरी से अश्‍वगंधा के पौधे लाकर लगा सकते है। पौधों के बीज में 5 सेमी का अंतर होना आवश्‍यक होता है।

अगर आप और अच्‍छी उपज चाहते है, तो पौधों की कतार की दूरी 1 सेमी रखनी चाहिए। ताकि निंराई आसानी से की जा सके। एक हेक्टेयर की भूमि के लिए 5000 ग्राम बीज काफी होता है। बीजों को लगाने के बाद लगभग 10 दिन में इसमें अंकुर आ जाता है।

अश्‍वगंधा पर हर 7 से 10 दिन में पानी पर डायथीन नाम का कीटनाशक डालकर छिड़कते रहना चाहिए। इसके साथ ही हर 20 से 25 दिन में खरपतवार को अश्‍वगंधा की फसल से अलग करते रहना चाहिए।

अश्वगन्धा की फसल प्राप्ति एवं भंडारण

अश्वगन्धा की खेती से लगभग 135 से लेकर 150 दिन के बाद में फसल प्राप्‍त होने लगती है। जब इसकी पत्‍ती पीली हो जाती है तो इसे खेत से खोद कर अलग कर दिया जाता है। खुदाई के समय में अश्‍वगंधा का पूरा पौधा जड़ से उखाड़ा जाता है। फिर इस पौधो को अलग अलग भाग में काट कर सुखाया जाता है। अश्‍वगंधा की लगभग 6 से 7 सेमी तक लम्बी जड़ को सबसे अच्‍छी क्‍वालिटी की अश्‍वगंधा जड़ माना जाता है।

अश्वगन्धा की खेती मे लागत और मुनाफ़ा

अश्वगन्धा की फसल में केवल उसकी जड़ ही नही, बल्‍कि उसके बीज पत्‍ती और पौधें का भूसा भी बाजार में बिकता है। यानि की अगर आप अश्‍वगंधा की खेती करते है, तो आपको उसके हर एक भाग से मुनाफा प्राप्‍त करने का मौका मिलेगा। अश्‍वगंधा की जड़ें और बीज बाजार में 150 से लेकर 200 रुपये पर किलोग्राम बिकती है। अश्‍वगंधा का भूसा भी 15 रूपये पति किलो के भाव से मार्केट में बिकता है।

अश्‍वगंधा की खेती से एक हेक्टेयर भूमि द्वारा लगभग 8 क्‍विंटल जड़ तथा 50 से लेकर 60 किलो तक का बीज मिलता है। इसकी खेती पर 10 से लेकर 12 हजार प्रति हेक्‍टेयर का खर्चा बैठता है। इस प्रकार 10 हेक्‍टेयर खेती करने के बाद लगभग 75 लाख की उपज प्राप्‍त होती है। इस तरह हम कम खर्चे में अश्‍वगंधा की खेती से 6-7 गुना तक का मुनाफ़ा प्राप्‍त कर सकते है।

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