हमेशा बहस करने वाले बच्चों को डांटने के बजाये यह तरीके अपनाये, बच्चों में होगा सुधार: Children Tips

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Argumentative Child
Handling Stubborn Kids: How to deal with an argumentative child. Tips to handle and argumentative child in Hindi.

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Bhopal: जब बच्चे छोटे होते है, तो उनका परिवार ही उनका सब कुछ होता है। कहा जाता है कि परिवार ही बच्‍चे कि पहली पाठशाला होती है। लेकिन बच्‍चा जैसे-जैसे बडा़ होता है। उसका दायरा और भी बढ़ जाता है। वह केवल परिवार तक ही सीमित नही रह जाता, वह स्‍कूल और हमारे आसपास के लोगों से जुड़ता चला जाता है। जहॉं वह अच्‍छे गुण भी सीखता है, तो कुछ बुरे गुण भी सीख जाता है। इस स्‍टेज में बच्‍चे घर के लोगो की जगह अपने दोस्‍तों की बात ज्‍यादा मानने लगता है और उनका साथ बच्‍चो को ज्‍यादा भाता है।

आज के समय में अभिभावक भी अपनी दुनिया में इतने खो जाते है, कि उनके पास अपने बच्‍चे के साथ समय बिताने का समय ही नहीं रहता। आजकल मॉं और पिता (Mother And Father) दोनों ही जॉब करना पसंद करते है।

जिस वजह से बच्‍चा घर के लोगों के साथ समय नहीं बिता पाते और अपने दोस्‍तों के साथ ज्‍यादा समय स्‍पेण्‍ड करने लगता है और धीरे धीरे हम देखते है, कि हमारे बच्‍चे बहुत ही जिद्दी और गुस्‍सेल (Argumentative Child) हो गये है और वह अपनी बात मनवाने के लिए किसी हद तक चले जाते है।

आजकल यह आम समस्‍या हो गई है। इसका कारण हमारा बच्‍चों को समय ना देना और साथ ही बच्‍चों का मोबाइल, फोन, टीवी और टैबलेट्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का अधिक इस्‍तेमाल करना भी है। जिस वजह से हमारा बच्‍चा जिद करने लग जाता है और बात यहॉं तक आ जाती है, कि अपनी बात मनवाने के लिए वह बहस करने लगते है। जब बच्‍चे छोटे होते है, तो हमें उतना बुरा नहीं लगता। लेकिन जब बच्‍चे बढे़ होकर भी इसी तरह कि हरकत करने लगते हे, तो उनका इस तरह का व्‍यवहार हमें बहुत ही दुख पहुँचाने लगता है।

जब आपके बच्चे आपसे करने लगे बहस

अधिकांशत: देखा गया है, कि बच्‍चे अपनी जिद मनवाने के लिए अपने पेरेंट्स से बहस करते है। अगर उनकी बात नहीं मानी जाती, तो वह अपने मॉं बाप का अपमान करने से भी पीछे नहीं हटते। जब बच्‍चे इस तरह का व्‍यवहार करने लगते है, तो हमें समझ नहीं आता कि वह इस तरह का व्‍यवहार आखिर क्‍यों करते है।

Argumentative Childs
Stubborn And Argumentative Child Demo Photo

इस अवस्‍था में हमें समझ नहीं आता कि हम किस तरह से अपने बच्‍चे को ट्रीट करे। जब इस तरह व्‍यवहार हमारे बच्‍चे पडोसियों या रिश्‍तेदारों के सामने करने लगते है, अपने बच्‍चे के इस अडियल और बहस वाली हरकतों से परेशान होकर हम उन्‍हें डाटने और सजा देने लगते है। जोकि बिल्‍कुल गलत है। अगर आप भी बच्‍चो की इसी तरह की समस्‍या से परेशान है, तो हम आपके लिए कुछ ऐसे टिप्‍स लेकर आये हे। जिससे आपको अपने बच्‍चों को हेंडल करने में मदद मिलेगी।

बच्‍चों को डॉंटकर नहीं बल्‍कि प्‍यार से समझाए

जब आपके बच्चे जिद करने लगे, आपकी बात मानना बंद कर दे और हर बातों पर गुस्‍सा दिखाने लगे तब अभिभावक को उन्‍हें डॉंटने कि जगह अपने बच्चे को प्यार से समझाना चाहिए। उन्‍हें बताना चाहिए कि उनका यह व्‍यवहार सही नहीं है और उन्‍हें बताए कि बिना गुस्सा हुए और बिना चिल्‍लाए भी वह यह बात उन्‍हें बता सकते है। क्‍योंकि अगर वह आराम से उनसे बात करेंगा, तो उन्‍हें ज्‍यादा अच्‍छे से उसकी बात समझा आयेगी।

इसके साथ ही ऐसे बच्‍चों को दूसरे बच्चों का उदाहरण देकर आराम से उनकी बाते बतानी चाहिए कि किस तरह वह आराम से बात करते हुए अपनी बात दूसरे के सामने रखता है। अगर आप ऐसा करते है, तो आपके बच्‍चे आपकी बात जरूर सुनेंगे।

बच्‍चो कि बात समझने की कोशिश करें उनकी भी बात सुने

अगर हम बच्‍चों किे बात ना सुन कर केवल उन्‍हें बुरी तरह डांटे फटकारे, तो इससे बच्‍चे के मन में आपके प्रति डर गुस्‍सा और नकारात्‍मकता बढ़ जायेगी। इसलिए इस तरह के व्‍यवहार से हमें बचना चाहिए और बच्‍चे क्‍या कहना चाह रहे है और वह आपसे क्‍या चाहते है। उन्‍हें समझने का प्रयास करना चाहिए।

जब आप इस तरह से उनकी बातें सुनने लगेंगे, तो आपको भी उसके मन की बात समझ आयेगी और साथ ही आप उनकी बात सुन रहे है। यह देखकर वह आपसे थोड़ा शांति से बात करने लगेगा और उसका गुस्‍सा भी शांत हो जायेगा।

कभी कभी ऐसा होता है कि बच्‍चे जिद करते करते यह भी भूल जात है, कि सही क्‍या है और गलत क्‍या है। ऐसे में वह केवल अपनी बात को ही सही मानत है और बहस करने लग जाते हे। बच्‍चों को समझा ही नही आता कि वह क्‍या गलत कर रहे है।

ऐसे में आपका फर्ज बनता है, कि आप अपने बच्‍चे को सही और गलत में अंतर करना सिखाए। उन्‍हें बताए कि वह जो व्‍यवहार कर रहे वह गलत है और वह इसकी जगह दूसरे तरीके से भी अपनी बात उनके सामने रख सकते है। और उन्‍हें बताए कि आक्रामक हो कर हर बात को सही साबित नहीं किया जा सकता है।

खुले विचारों वाले विकल्प दें

ज्‍यादातर देखा गया है, कि माता-पिता अपने बच्‍चों की बात को मानने कि जगह उनकी बात का विरोध कर देते है और अपनी सोच उन पर थोपने की कोशिश मे लग जाते है। ऐसे में बच्‍चा उनके खिलाफ बोलने लगता है और तेज आवाज में बात करने लगता है। क्‍योंकि उसे लगने लगता है, कि उसकी बात इसी तरह से मानी जायेगी। क्‍योंकि अगर वह अच्‍छे से बात करेगा, तो उसकी बात नहीं मानी जायगी।

इस स्‍टेज में आपका फर्ज बनता है, कि आप अपने बच्‍चे कि कोई बात जिसे आप नहीं मानना चाहते उसकी जगह पर उसे कोई दूसरा ऑप्‍शन करने के लिए दे। ताकि उसे यह लगे कि उसकी बात मना भी नहीं की जा रही है और दूसरे तरीके से वह पूरी भी हो रही है। इससे आपका बच्‍चा थोडा नियंत्रण मे रहेगा।

हर बात को बहस में बदलने से बचे

कभी कभी हम बच्‍चों को सही गलत के बारे में बताते बताते यह भूल जाते है, हम भी उनसे बहस करने लगे है। उन्‍हें यह बताने में कि वह इस जगह गलत है, हम भी उनकी ही तरह उनसे बहस करने लगे है। जिस वजह से बात आगे बढ जाती है।

इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि इस तरह की चीजों से बचे और उदाहरण देकर खेल खेल में बच्‍चों को समझाने कि कोशिश करें और बच्‍चे के साथ पॉजीटिव तरीके से कम्‍यूनिकेट करने की कोशिश करे। और साथ ही उनके दोस्‍त बनने की कोशिश करें। ताकि वह भी अपनी बात आपके सामने रखने से हिचकिचाए ना।

सकारात्‍मक बातें हमारे मन और स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक होती है। बच्‍चें को बोलने का मौका देने से वह आपके सामने खुल जाते है, आपकी सकारात्‍मक बांते सुन कर वह आगे चलकर दूसरों को आपकी बात के जरिये समझाने की कोशिश करने लगते है। सकारात्‍मक बातों से बच्‍चो में जिद करने की आदत छूट जाती है।

आपका फर्ज है, कि बच्‍चे को आप यह फील करवाए कि किसी भी परिस्थिति में आप उनके साथ नहीं छोडेंगे ओैर हमेशा उनके साथ रहेंगे। इससे बच्‍चों के मन में आपके प्रति भरोसा बढ़ जायेगा। और वह आपकी बात मानने लगेगा।

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