उत्तराखंड के जंगलों और नदियों को बचाने के लिए बसंती देवी ने पूरी जिंदगी खपाई, अब पद्म श्री सम्मानित

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Basanti Devi Padma Shri
How Basanti Devi became Environmentalist and safe Forest and Kosi River. Basanti Devi from Uttarakhand has been conferred with Padma Shri in the Social Work category.

Dehradun: हाल ही में इस साल देश ने 73वें गणतंत्र दिवस पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किया। राजधानी दिल्ली के लाल किले पर फिर से भारतीय धवज तिरंगा शान से लहराया। इस अवसर पर भारत के कई लोगो को अलग-अलग क्षेत्र में उनके द्वारा किये गए कार्यो के लिए पद्म श्री (Padma Shri) पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

देश के पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम की में रहने वाली बसंती देवी (Basanti Devi) को उनके द्वारा की गई समाज सेवा (social Work) के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बता दें की उत्तराखंड की कोसी नदी (Kosi River) हज़ारों लोगों की आजीविका और जीवन यापन का जरिया है। लोग इसकी पूजा भी करते हैं।

बढ़ती जनसंख्या के कारण पानी का इस्तेमाल भी बहुत बढ़ने लगा है। यहाँ के आर्मी कैन्टोनमेंट और शहरों तक पानी सप्लाई करने के चलते नदी का बहाव और जल स्तर कम होता जा रहा है। ऐसा वक़्त था जब यह नदी जंगलों और पहाड़ो को सींचते हुए गुजरती थी। अब पानी कम होने के चलते उन जंगलों के अस्तित्व पर संकट छा गया है। शहर में लोगों की सुविधा के चलते पानी सप्लाई करने के कारण जंगल और आस-पास गांव के लोगों को पानी की कमी हो गई।

एक महिला से यह सब देखा ना गया और उनके सब बदल कर ठीक करने का बीड़ा उड़ाया। उन्होंने नदी को नया जीवन देने के अलावा लोगों को भी पर्यावरण के प्रति जागरूक करके प्रेरित किया। यह महिला ‘बसंती देवी’ हैं, जिन्हे गाँव के लोग ‘बसंती बहन’ के नाम से पुकारते हैं।

The New Indian Express में छपी रिपोर्ट के मुताविक बसंती देवी का बाल विवाह हो गया था और वो केवल 12 साल की उम्र में विधवा भी हो गईं थी। कुछ भला चाहने वाले रिश्तेदारों ने बसंती को गांधी आश्रम भेजने की समझाइश दी। इस प्रकार एक 12 साल की बाल विधवा 1980 में ज़िला अल्मोड़ा में कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में रहने लगी। अब यही उसका घर था। यहां बसंती ने बुनाई-कढ़ाई सीखी। बसंती बहन शादी से पहले चौथी कक्षा तक पढ़ ली थी, तो उन्होंने अपनी पढ़ाई फिरसे शुरु की और 12वीं क्लास पास की।

लक्ष्मी आश्राम ने पूरे ज़िले में ‘बालवाड़ी’ खोलना शुरू किया, तो बसंती बहन वहां जाकर पढ़ाने का काम करने लगी। कुछ समय पहले तक इस क्षेत्र में 15 साल की लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। उनके आश्रम ने 25-30 स्कूल शुरू कर दिए। फिर एक समय ऐसा भी आया, जब बसंती बहन के पिता को उनके शिक्षक बनने की खबर लगी, तब उन्होंने भी उनके काम को सराहा और तारीफ की।

बसंती बहन का भी एक वक़्त बाल विवाह हुआ था और वो इसके असर को अच्छे से जानती और समझती थी। ऐसे में वे गाँव गांव में घर-घर जाकर लोगों को अपनी नाबालिग बच्चियों की शादी न करवाने के लिए जागरूख करने लगी। बसंती लड़कियों को शिक्षित करने के लिए पहले से ही काम कर रही थी। अब वे महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी आवाज़ उठाने लगीं।

बसंती बहन (Basanti Behan) ने कुछ वक़्त देहरादून में भी काम किया और 2002 में वे कौसानी वापस आ गई। उत्तराखंड में नदी और जंगल की स्थिति देखकर वे रह नहीं पाई। ऐसे में ‘नदी, जंगल और ज़मीन’ (River and Forest) को किसी भी हाल में बचाने का फैसला किया। एक अख़बार की रिपोर्ट में बताया गया की बसंती बहन ने सबसे पहले अपनी एक मित्र पार्वती गोस्वामी को गांव की सड़कें दिखाने को कहा।

साल 2003 में बसंती बहन ने एक हिन्दी अख़बार में पढ़ा की जंगल की कटाई के चलते आने वाले 10 साल में कोसी नदी पूरी तरह सूख जाएगी। बसंती ने वनों की कटाई रोकने के लिए महिलाओं को जागरूख करके एक पहल शुरु की। वो पेड़ काट रही महिलाओं के पास जाती और उन्हें अखबार की वही खबर दिखाती।

उन्होंने आस पास की महिलाओं को इकट्ठा होकर पहाड़ी के जंगलों की सुरक्षा करके का फैसला किया। बसंती बहन ने उन्हें बांज के पेड़ (Oak Tree) के फ़ायदों के बारे में भी बताया। उनकी टीम की महिलाओं ने इस बात पर ध्यान दिया की कोई बाहरी शख्स आकर पेड़ न काटने लगे। बसंती और उनकी टीम से प्रेरणा पाकर लोकल निवासियों ने हरे-भरे पेड़ नहीं काटने की कसम खाई और वन विभाग अधिकारियों ने सूखे पेड़ ले जाने की हामी भरी। बसंती बहन के प्रयास से सूखती कोसी नदी को बचा लिया गया।

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