
Kolkata: किसी ने कहा है कि मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। दो वक्त की रोटी के लिए दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली बेबी हालदार के लिए लेखिका बनाना इतना आसान नही था। बेबी की पूरी कहानी से पता चलता है कि इंसान के भीतर का दर्द किस तरह पूरी दुनिया के दर्द को मजबूत बना देता है।
बेबी हालदार (Baby Halder)की पहली किताब आलो आंधारि (Autobiography Aalo Aandhari) कुछ बरस पहले हिंदी में प्रकाशित हुई थी और अब तक उसके कई संस्करण छप चुके हैं। उनकी एक किताब का दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ। लोगों ने उनसे प्रेरणा ली, लेकिन इतना सब हासिल करने से पहले उन्हें उतने दुख झेलने पड़े जितने किसी भी अच्छे भले इंसान को आत्म-हत्या के लिए उकसाने के लिए पर्याप्त होते हैं। लेकिन बेबी ने कभी हार नहीं मानी।
इसका बांग्ला संस्करण भी प्रकाशित हुआ है जिसका विमोचन सुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन (Taslima Nasrin) ने किया। यह उपन्यास छपने के बाद बेबी के अड़ोस-पड़ोस में काम करने वाली दूसरी सभी नौकरानियों को भी लगने लगा है कि यह तो उनकी ही खुद की कहानी है।
कौन है काम वाली बाई
कमाल यह है कि बेबी हालदार आज भी खुद को काजेर मेये (काम करने वाली बाई) कहती हैं। 29 साल पहले उनके पिता सेना में थे जम्मू एवं कश्मीर मे वही पर उनका जन्म हुआ। अभाव और दुख की पीड़ा बेबी ने बचपन में ही देख ली थी। जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि अपनी किताब आलो आंधारि (Book Aalo Aandhari) को मानती हैं।
बेबी हालदार की आत्मकथा
पिता सेना में थे इसलिए घर से उनका रिश्ता कम ही था। सेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद पिता बिना किसी को कुछ बताए, कई-कई दिनों के लिए कहीं चले जाते। लौटते तो हर रोज घर में कलह, लड़ाई, झगड़े होते थे।
A bestselling author, Baby Halder works as a domestic help in Gurgaon http://t.co/L8a2hj7WVK pic.twitter.com/T6cXyRVGed
— Hindustan Times (@htTweets) January 4, 2014
एक दिन पिता कहीं गए और उसके कुछ दिन बाद मां मन में दुख और गोद में मेरे छोटे भाई को लेकर यह कह कर चली गई कि बाजार जा रही हैं। इसके बाद मां घर नहीं आईं। इसके बाद पिता ने एक के बाद एक तीन शादियां कीं। इस दौरान मैं कभी अपनी नई मां के साथ रही, कभी अपनी बड़ी बहन के ससुराल में और कभी अपनी बुआ के घर बस इधर से उधर जाती थीं।
नही मिला माँ का साथ
मां नहीं होने के कारण मेरे मन में पहाड़ जैसा दुख भर दिया था। यहां-वहां रहने और पिता की लापरवाही के कारण पढ़ने-लिखने से तो जैसे कोई वास्ता ही नहीं रहा था। सातवीं तक की पढ़ाई करते-करते 13 वर्ष की उम्र में मेरी शादी करा दी गई। मुझसे लगभग दुगनी उम्र के एक आदमी से कर दी गई। फिर तो जैसे अंतहीन दुखों का ये रास्ता शुरू हो गया। पति द्वारा बिना कारण मार-पीट लगभग आम सा हो गया था। पति की प्रताड़ना और पैसों की तंगी के बीच जि़ल्लत भरे दिन जाते रहते थे।
पति करता था प्रताड़ित
उसी क्रम में दो जून की रोटी की मशक्कत के बीच पति का अत्याचार बढ़ता गया। अंतत: एक दिन अपने बच्चों को लेकर घर से निकल गई। एक घर से दूसरे घर, नौकरानी के बतौर लंबे समय तक काम किया। नौकरानी के बजाय बंधुआ मजदूर कहना ज्यादा बेहतर होगा। सुबह से देर रात तक की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी खुशियों की कोई रोशनी कहीं दिखाई नही दे रही थी। गमो का अंधेरा मानो जिंदगी में कुंडली बनाकर बैठा था।
Baby Halder needs little introduction to lovers of Bengali literature. Let us stand by her in this time of need, as our gratitude for her contributions to Bengali literature. Please contribute if you are able, and share this far and wide. pic.twitter.com/HrlgjWQrX3
— Swati Moitra (@swatiatrest) November 20, 2020
ऐसे ही किसी दिन मेरे एक जान-पहचान वाले ने मुझे गुड़गांव में एक घर में काम दिलवाया जहा में आराम से कम कर रही थी। यहां मैंने पाया कि इस घर का हर शख्स मेरे साथ इस तरह व्यवहार करता था, जैसे मैं इस घर की एक मेम्बर हूं। घर के बुजुर्ग मुखिया, जिन्हें सब की तरह मैं भी खुश रखती थी। अक्सर मुझसे मेरे घर-परिवार के बारे मैं जानकारी लेते रहते थे। उनकी कोशिश रहती कि हर तरह से मेरी हेल्प करें।
अतिक्रमण ने छीना घर
कुछ माह बाद अतिक्रमण वाले आए ओर तोड़ने के दौरान मेरे किराये के घर को भी ढहा दिया गया और घर के मालिक ने मुझे अपने बच्चों के साथ अपने घर में रहने की पनाह दी। इसके बाद दूसरे घरों में काम करने का सिलसिला भी खत्म हो गया।
तातुश के घर में सैकड़ों-हजारों किताबें थीं। बाद में पता चला कि तातुश प्रोफेसर के साथ-साथ बड़े कथाकार भी हैं। उनकी कहानियां और लेख इधर-उधर छपते रहते हैं। उनका नाम प्रबोध कुमार है। और यह भी कि तातुश हिंदी के सबसे बड़े उपन्यासकार प्रेमचंद के नाती हैं।
किताब को देख याद आये बचपन के दिन
अक्सर किताबों की साफ-सफाई के दौरान मैं उन्हें उलटते-पलटते पढ़ने की कोशिश करती। खास तौर पर बांग्ला की किताबों को देखती तो मुझे अपने बचपन के दिन याद आ जाते। तातुश ने एक दिन मुझे ऐसा करते देखा, तो उन्होंने एक किताब देकर मुझे उसका नाम पढ़ने को कहा। मैंने सोचा, पढ़ तो ठीक ही लूंगी लेकिन गलती हो गई तो, फिर तातुश ने टोका तो मैंने झट से किताब का नाम पढ़ दिया-आमार मेये बेला-तसलीमा नसरीन। तातुश ने किताब देते हुए कहा कि जब भी फुर्सत मिले, इस किताब को रीड करना।
Baby Halder is a real life story of determination, perseverance, bravery, tenacity & courage of a lone woman fighter who rose from the clasps of being a Child Bride & Domestic Help to become a Bestselling Author!
A story of youth icon from #Kashmir – https://t.co/1aKBtwVgeP pic.twitter.com/MCg7B7FLqZ— Rabyanoor (@rabyanoor1) November 22, 2017
फिर एक दिन कॉपी-पेन देते हुए तातुश ने अपने जीवन के बारे में लिखने को कहा। मेरे लिए इतने दिनों बाद कुछ लिखने के लिए कलम पकड़ना किसी परीक्षा से कम न था। मैंने हर रोज काम खत्म करने के बाद देर रात तक अपने बारे में लिखना स्टार्ट कर दिया। पन्नों पर अपने बारे में लिखना ऐसा लगता था, जैसे फिर से उन्हीं दुखों से सामना हो रहा हो।
तातुश उन पन्नों को पढ़ते, उन्हें सुधारते और उनकी जेराक्स करवाते। लिखने का यह काम महीनों चलता रहा। एक दिन मेरे नाम एक पैकेट आया, जिसमें कुछ पत्रिकाएं थीं। मैंने अंदर देखा तो देखती रह गई। अपने बच्चों को दिखाया और उन्हें पढ़ने को भी बोला। मेरी बेटी ने पढ़ा बेबी हालदार, मेरे बच्चे भोचके रह गए, मां किताब में तुम्हारा नाम है। तातुश के कहानीकार दोस्त अशोक सेकसरिया और रमेश गोस्वामी ने कहा, ये तो एन फ्रैंक की डायरी से भी अच्छी रचना है।
पहली किताब लिखी बांग्ला में
बेबी हालदार कहती हैं, मैं अपनी कहानी लिखती गई, लिखती गई। फिर एक दिन एक प्रकाशक आए। वो मेरी किताब छापना चाहते थे। तातुश ने बांग्ला में लिखी मेरी आत्मकथा (Autobiography) का अनुवाद हिंदी में कर दिया था। इस तरह मेरी पहली किताब छपी-आलो आंधारि।
At the age of 12, I was married off to a man 14 years older to me. While my friends studied and played, I became a mother. The abuse that started on day one and continued till I decided to end it. -Baby Halder. Watch her Journey https://t.co/NucG1mHoNL #ReachForBetter @FTIIndia pic.twitter.com/G7k1RJ7Jto
— The Better India (@thebetterindia) November 22, 2018
कोलकाता के रोशनाई प्रकाशन (Kolkata Roshnai Prakashan) ने इस किताब को प्रकाशित किया है। कुछ ही समय में किताब का दूसरा संस्करण निकला, फिर इसका बांग्ला संस्करण। ये कहानी (Story) कहती है कि इंसान के लिए अच्छा यही है कि वह काम को छोटे या बड़े के रूप में देखने के बदले अपनी नजर वहां रखे जहां से उसकी जिंदगी को कोई मुकम्मल जहां हासिल हो सके।



