Bhopal: गरीबी के चलते माता पिता इतने मजबूर हो जाते है कि वो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में कामयाब नही हो पाते। मजदूरों की जिंदगी ही क्या है, वे दिन-रात मेहनत कर दो समय की रोटी को ही पेट भरने के लिए जुटा पाते हैं। उनके बच्चे बहुत बार उन्ही घरों में पलकर बढे होते हैं जहां वे काम कर रहे होते हैं।
इनके सिर पर खुद की छत भी नसीब तक नहीं होती ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजना पढ़ाना तो बहुत दूर की बात। ऐसे ही केरल का वायनाड एक आदिवासी क्षेत्र है। ये इतना पिछड़ा एरिया है कि लोग यहां स्कूल और पढ़ाई लिखाई को जानते समझते तक नहीं। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में ही जीवन यापन करते है। यहां बच्चे जंगलों में रहकर मां-बाप के साथ या तो टोकरी, हथियार बनाने में सहायता करते हैं या मजदूरी करते हैं।
इसी एरिया में एक मनरेगा मजदूर भी थे जिनकी बेटी ने गांव की पहली IAS अफसर बन इतिहास रच दिया। गरीबी में पली-बढ़ी इस लड़की ने अपने बुलंद हौसलों से पूरे देश में ख्याति पाई। 2018 के UPSC सिविल सर्विस एग्जाम के रिजल्ट कुछ दिनों पहले ही अनाउंस किए गए। हर साल लाखों लोग इस परीक्षा को क्रैक करने के लिए दिन-रात एक करते हैं। ताकि वो IAS और IPS बन सके।
वहीं हर साल इसके परिणाम के साथ कुछ ऐसी सफलतापूर्ण स्टोरी सामने आती हैं जिसे पढ़ने के बाद ये मानना जरूरी हो जाता हैं कि अगर आपमें कुछ करने की लगन हो तो आप उस मुकाम को हासिल करने में सफल हो ही जाते है फिर चाहे कुछ भी परिस्थिति हो,परिस्थिति इसके बीच दीवार नही बनती। इस साल भी एक ऐसी ही UPSC क्रैक करने वाली लड़की की सफलता की कहानी सामने आई है।
इस राज्य में आदिवासी समाज से किसी ने सिविल सर्विसेज की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी। श्रीधन्य यह परीक्षा पास करने वाली पहली लड़की बनी। जबकि यहां पर बहुत बड़ी जनजातीय आबादी है। यहां बहुत कम लोग हैं, जो यूपीएससी के बारे में इन्फॉर्मेशन रखते हैं। उस बेटी को विश्वास है कि मेरी उपलब्धि से प्रेरित होकर अब यहां के युवा सिविल सर्विसेज की तैयारी करेंगे और अपने सपनो को सफल भी करेंगे।
श्रीधन्या सुरेश नाम गरीबी, मेहतन और कामयाबी की मिसाल का है। महज 22 साल की उम्र में इन्होंने इतिहास रच दिया। वर्ष 2018 में 410वीं रैंक प्राप्त कर UPSC परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी के साथ ही केरला की पहली जनजाति महिला IAS बनने का रिकॉर्ड श्रीधन्या सुरेश के नाम दर्ज हो गया। केरल के सबसे पिछड़े जिले वायनाड की रहने वाली है।
वह कुरिचिया जनजाति से ताल्लुक रखती है। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, जो गांव के ही बाजार में धनुष-तीर बेचने का काम करते हैं, जबकि मां मनरेगा के तहत काम करती हैं। उसके तीन भाई-बहनों का पालन-पोषण बुनियादी सुविधाओं के अभाव में हुआ।
श्रीधन्या सुरेश केरल की पहली आदिवासी लड़की है, जिसने यूपीएससी की परीक्षा पास कर IAS बनने का सपना को सच किया है। श्रीधन्या के पिता मनरेगा में मजदूरी करते थे और बाकी समय धनुष-तीर बेचा करते थे। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण परिवार को घर बनाने के लिए सरकार से जमीन मिली थी, लेकिन जमीन मिलने के बाद भी उनके पास इतने पैसे नही थे वे अपना घर बना पाए। पैसे के अभाव के चलते घर नहीं बनवा पाएं। उनके माता-पिता बहुत गरीब मजदूर थे।
#UPSC सिविल सेवा परीक्षा में केरल के वायनाड जिले की रहने वाली 22 साल की श्रीधन्या सुरेश ने इतिहास रचा है. वो सिविल सेवा परीक्षा में पास होने वाली केरल की पहली आदिवासी महिला हैं. #ThursdayMotivation #sheleadsindia #GirlPower pic.twitter.com/RrspWVOppd
— SheThePeople Hindi (@STP_Hindi) April 18, 2019
श्री धन्य ने बताया कि हमारे समुदाय में बेटे-बेटी में ज्यादा भेदभाव नहीं होता है। लेकिन जैसा कि आमतौर पर अन्य आदिवासी परिवारों में होता है, मेरे माता-पिता ने मुझ पर कभी कोई पाबन्दी नहीं लगाई। मेरा परिवार बेहद गरीब था, पर माता-पिता ने अपनी गरीबी को मेरी पढ़ाई के बीच आने नही दिया। प्राथमिक पढ़ाई वायनाड में करने के बाद मैंने कालीकट विश्वविद्यालय से अप्लाइड जूलॉजी में परास्नातक किया।
उस समय मेरे परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं केरल से दिल्ली तक की यात्रा खर्च वहन कर सकूं। यह बात जब मेरे दोस्तों को पता चली, तो उन्होंने आपस में चंदा इकट्ठा करके चालीस हजार रुपयों की व्यवस्था की, जिसके बाद मैं दिल्ली पहुंच सकी। मैंने तीसरे प्रयास में यह कामयाबी हासिल की।
परीक्षा के अंतिम रिजल्ट आने से एक दिन पहले मैं अपनी दोस्त के साथ तिरुवनंतपुरम में थी, जैसे-जैसे रिजल्ट का वक़्त पास आ रहा था, मुझ पर तनाव का असर बढ़ने लगता था। तब मैं अपनी दोस्त के साथ कोचिंग चली जाती। परिणाम आने के बाद जब सोशल मीडिया में बधाइयों का सिलसिला प्रारंभ हुआ, मुझे उस समय तक भरोसा ही नहीं हो पा रहा था कि मैंने यह परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है।
इसके बाद मैंने अपनी मां को फोन किया और यह खुशखबरी दी, पर तब तक कई मीडिया वाले मेरे घर पहुंच गए, जो बेहद खराब स्थिति में था। हालांकि मुझे इससे बेहतर रैंक की आशा थी, पर मेरी मेहनत का जो परिणाम मिला, वह भी खुश होकर स्वीकार है। मुझे हमेशा महसूस होता रहा है कि कोशिश और सफल होने की जिद ही आपको कामयाबी की ओर ले जाती है।




