पिता चलाते थे ऑटो, मां ने दुकान चलाकर उठाया खर्च, अब बेटा बन गया लेफ्टिनेंट

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Success story of student who join Indian Army. A auto driver son join Army and became officer. Safalta ki Kahani Hindi Main.

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Delhi: सफलता सभी को अच्छी लगती है और वह बड़े संघर्ष से आती है। अंबाला छावनी में गरीबी रेखा के नीचे जीवन चलाने वाली भूपिंदर कौर का छोटा बेटा नरेंदर सिंह सेना में लेफ्टिनेंट बता तो जीवन सफल हो गया। नरेंदर के पिता जोगिंदर सिंह ऑटो चलाकर परिवार का पेट पालते थे। साल 2003 में उनका स्वर्गवास हो गया था, जिसके बाद मिट्ठापुर चौक पर एक कमरे में अपने दोनों बेटों के साथ भूपिंदर ने छोटी दुकान खोल ली।

एक ऑटो रिक्शा चालाक पिता ने अपने बेटे को सेना में अफसर बनाने का सपना देखा था। इसके लिए वह रात दिन काम भी करते थे। वह जब भी किसी आर्मी अफसर को देखते तो उनके मन में केवल यही बात आती कि वह अपने छोटे बेटे नरेंद्र सिंह को देश की सेवा के लिए आर्मी में भेजेंगे। सेना के जवान को देखते ही उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। इस पिता की किस्मत में यह नहीं था कि वह अपने बेटे को आर्मी का अफसर बनते हुए देख सकें। हार्टअ-टैक के चलते उनका स्वर्गवास हो गया।

इसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी बड़े बेटे ओंकार सिंह (16 साल) पर आ गई। हरियाणा के अंबाला जिले के गांव मिटटापुर में रहने वाले ओंकार ने भी इस जिम्मेदारी को खुशी खुशी स्वीकार कर लिया। छोटे भाई नरेंद्र सिंह की उम्र उस वक्त मात्र 14 साल थी। नरेंद्र के सिर से जब पिता का साया उठ गया, तो उसके बड़े भाई ओंकार ने सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।

ओंकार ने अपनी दसवीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, जिससे कोई काम करके अपने परिवार का पालन पोषण कर सके। पूरे परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया। फिर भी ओंकार ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने तुरंत ही मेहनत मजदूरी करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने छोटे भाई नरेंद्र की पढ़ाई छूटने नहीं दी।

डिग्री हासिल करने के बाद नरेंद्र ने घर वापिस आकर अपने भाई का हाथ बंटाना शुरू कर दिया। उन्होंने अंबाला डाकघर में ग्रामीण डाक सेवक का काम शुरू कर दिया, ताकि परिवार की कुछ आर्थिक सहायता हो जाए। वह सुबह सुबह बच्चों को टयूशन भी पढ़ाते थे। इस दौरान नरेंद्र सिंह ने डिफेंस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी थी। नरेंद्र ने अपने पिता का सपना साकार करने के लिए साल 2018 से ही डिफेंस की परीक्षा देनी शुरू कर दी थी।

नरेंद्र ने भी अपने बड़े भाई को पिता का दर्जा दिया और रात दिन पढ़ाई पर ही ध्यान दिया। उन्होंने समलेहडी के सरकारी स्कूल से 12 वीं तक की शिक्षा प्राप्त की। स्कूल के टीचर भी नरेंद्र के हालातों को देखते हुए उसका पूरा सहयोग करते थे। नरेंद्र भी पढ़ाई में हमेशा से ही अव्वल आता था। इसलिए सभी लोग उसे प्यार भी करते थे।

मजदूरी करने के बाद ओंकार ने भी अपने पिता की तरह से ऑटो रिक्शा चलाना शुरू कर दिया और छोटे भाई नरेंद्र को उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए जालंधर रवाना कर दिया। जालंधर यूनिवर्सिटी से नरेंद्र ने 81 प्रतिशत अंक लेकर बीटेक एयरोनॉटिकल की डिग्री हासिल की। पढ़ाई में बेहतर होने की वजह से नरेंद्र को कॉलेज से स्कॉलरशिप प्राप्त हो गई थी।

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