
Bikaner: जब से इस जमीन पर मानव की उत्पत्ति हुई हैं, तभी से इस धरती पर खेती हो रही है। शुरुआत में संसाधन की कमी से लोगो को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा परंतु जैसे जैसे समय बिता विज्ञान ने तरक्की की और खेती के काम में उपयोग होने वाले उपकरण बने जिससे किसानों की काफी मदद मिली।
अब विज्ञान के कुछ खास प्रयोग ने पारंपरिक खेती को आधुनिक खेती में तब्दील कर दिया। फलस्वरूप किसान भाई जो अभी तक नफा और नुकसान के तराजू में झूलते थे। अब उन्हे केवल फायदा ही फायदा होता है। कई किसान भाइयों से कहते सुना है, खेती अकेले से उनका परिवार नही चलता, उन्हे अपने परिवार को चलाने के लिया खेती के साथ अन्य कारोबार भी करना पड़ता है।
बदलते समय ने उनकी किस्मत भी बदल कर रख दी। आपको बता दें आधुनिक खेती के तहत राजस्थान में खजूर की खेती हो रही है, जो राजस्थान के किसान भाइयों को आर्थिक रूप से मजबूत बना रही है, तो आइए जानते है कोन है वो किसान भाई और कैसे खजूर की खेती (Date Farming) से लाखो का व्यापार कर रहा है।
राजस्थान के चिकित्सीय पेशेवर के व्यक्ति द्वारा की जा रही है खजूर की खेती
राजस्थान के बीकानेर जिले के महाजन इलाके के पास NH-62 पर एक गांव मोखमपुरा में दिल्ली के एक डॉक्टर ने खजूर का बाग बनाया हुआ है। खजूर के इस बाग से उन्हे प्रत्येक वर्ष लाखो के फल प्राप्त होते है और उनकी आमदनी दिन रात बढ़ती जा रही है।

राजस्थान के बारानी इलाके के कुछ किसान भाई आज भी पारंपरिक फसले जैसे मोठ, तिल, बाजरा, ग्वार आदि की ही उगाते है। आज से करीब 7 वर्ष पूर्व दिल्ली के एक डॉक्टर ने पहली बार खजुर की खेती की तो सभी किसान भाईयों ने उनके इस काम पर संदेह किया वे सोचते थे की ये शहर से आया व्यक्ति गांव की खेती किसानी के बारे में नहीं समझेगा।
उनका मानना था की जो चीज यहां पैदा हो नही सकती, उसकी फसल यहां लगा कर वो समय के साथ पैसे भी बर्बाद कर रहा है। परंतु जब खजूर के पौधे लगाए और उनमें फल आना शुरू हुए, तो आस पास के निवासी बाग को देख कर हैरान रह गए उन्हे सब कुछ एक सपना लग रहा था।
खजूर की खेती करने वाले किसान
दिल्ली के डॉक्टर जो खजूर की खेती कर रहते है उनका नाम बलवीरसिंह है और इस बाग की देख भाल के लिए उन्होंने गांव के ही एक व्यक्ति जिनका नाम कालूराम (Kaluram) है, को रखा हुआ है। देख भाल करने वाले कालूराम कहते है, आज से करीब 8 वर्ष पहले दिल्ली से आए चिकित्सक बलवीरसिंह ने 30 बीघा जमीन पर अरबी खजूर के करीब 1250 पौधो का रोपण कराया। जानकारी देते हुए आगे कालूराम बताते है की इस बाग में खजूर की कम से कम 4 वेराइटी लगी हुई है। जो खलास, खूनेजी, बरी व मेडज़ूल आदि है।
जैविक उर्वरक खाद का किया जाता है इस्तेमाल
बीकानेर के डॉक्टर ने अपने खजूर की फसल के लिए अरबी प्रजाति के पौधे लगाए और सभी वृक्ष में जैविक उर्वरक यानी केचुए से बनी खाद का इस्तेमाल किया। डॉक्टर के द्वारा लगाई गई किस्म का नाम मेडजूल खजूर है।

आपको बता दे इस फसल में किसी भी रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसमें गोबर खाद और केंचुआ से बनाई गई खाद को डाला जाता है। खजूर की खेती (Khajur Ki Kheti) राजस्थान के कई जिलों में की जा रही है, जेसे जालोर, बाड़मेर, चूरू, जैसलमेर, सिरोही, श्रीगंगानगर, जोधपुर, हनुमानगढ़, नागौर, पाली, बीकानेर आदि।
कृषि विशेषज्ञ की सलाह
भारत में इस समय कृषि विज्ञान का काफी क्रेज है। छात्र कृषि से संबंधित कई तरह के प्रयोग करते है। इन्ही में से एक है अब्दुल अमीन, जिन्होंने कृषि के क्षेत्र में काफी खोज की हुई है। इन्होंने बताया कि मरूस्थलीय भूमि खजूर की खेती के लिए काफी अच्छी है।
इस रेतीली जमीन पर किसान आसानी से खजूर की खेती कर सकता है। एक बार पेड़ लगाने के बाद किसान भाइयों को करीब 3 वर्ष तक उनकी देखभाल करनी होती है। उसके बाद खजूर के फल प्राप्त कर वे लाखो की कमाई कर सकते है।



