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Delhi: यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि भारत (Bharat) एक प्राचीनतम सभ्यता (Ancient Culture) वाला सांस्कृतिक देश हैं। यह विश्व के उन गिने-चुने देशों में से एक है, जहां हर वर्ग और समुदाय के लोग शांतिपूर्वक रहते हैं। यहां की भगौलिक स्थिति, जलवायु और विविध संस्कृति को देखने के लिए ही विश्व के कोने-कोने से पर्यटक पहुंचते हैं। वैसे अपनी भारत यात्रा के दौरान पर्यटकों को जो चीज सबसे ज्यादा पसंद आती है, तो वह हैं भारत की प्राचीनतम मंदिर।
मंदिरों की बनावट, विशेषता, महत्व और इतिहास आदि जानने के लिए ही पर्यटक बार-बार भारत की ओर रुख करते हैं। इनमें से कई मंदिर तो ऐसे भी हैं जो कई हजारों साल पुराने हैं और जिनके बारे में जानना पर्यटकों के लिए कौतुहल का विषय है। ऐसे ही एक मंदिर (Temple) के बारे में बताने जा रहे है जिसकी खूबसूरती और रहस्य सड़ आज तक कोई पर्दा नही उठा सका। मंदिर की मजबूती का रहस्य।
इस जांच में सामने आया कि मंदिर वाकई अपनी उम्र के हिसाब से बहुत मजबूत है। काफी कोशिशों के बाद भी विशेषज्ञ यह पता नहीं लगा सके कि उसकी मजबूती का रहस्य क्या है, फिर उन्होंने मंदिर के पत्थर के एक टुकड़े को काटा तो पाया कि पत्थर वजन में बहुत हल्का है। उन्होंने पत्थर के उस टुकड़े को पानी में डाला तो वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बताया जाता है कि काकतीय शिल्पकला के इस अद्वितीय उदाहरण को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किये जाने से न केवल काकतीय काल की इस कला को सम्मान मिला है, बल्कि यह पूरे देश के लिए सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि के लिए वह अपनी ओर से तथा पूरे सदन की ओर से देशवासियों को बधाई देते हैं।
मंदिर की स्थापना
गौरतलब है कि वारंगल से लगभग 60 किमी दूर स्थित रुद्रेश्वर मंदिर का निर्माण 1213 ईस्वी में काकतीय साम्राज्य के शासनकाल के दौरान काकतीय राजा (Kakatiya King) गणपति देव (Ganapati Dev) के एक सेनापति रेचारला रुद्र ने कराया था। यह मंदिर भगवान भोलेनाथ (Bhagwan Bholenath) को समर्पित है। करीब 800 साल पुराने इस मंदिर के निर्माण में लगभग 40 साल का समय लगा था और मंदिर के मूर्तिकार के नाम पर इसे रामप्पा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
बधाइयों का लगा तांता PM से लेकर हर मंत्री ने दी
उप-राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तेलंगाना सहित समस्त देशवासियों को बधाई देते हुए मंदिर परिसर में जाकर इसकी भव्यता को देखने के लिए प्रेरित किया। उप-राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने ट्वीट कर कहा कि गौरव का विषय है कि तेलंगाना के पालमपेट स्थित, 13वीं सदी के काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर के रूप में स्वीकार किया है। यह तेलंगाना की प्राचीन संस्कृति की समृद्धि का प्रमाण है। तेलंगाना के निवासियों की सृजनात्मकता का अभिनंदन करता हूं।
यूनेस्को ने तेलंगाना में स्थित काकतीय रुद्रेश्वर रामप्पा मंदिर को विश्व धरोहर में शामिल कर लिया है। दुनिया अब भारतीय मंदिरों और उसके अतुल्य स्थापत्य को पहचान दे रही है। वारंगल स्थित यह शिव मंदिर इकलौता ऐसा मंदिर है, जिसका नाम इसके शिल्पकार रामप्पा के नाम पर रखा गया।#Ramappa pic.twitter.com/u0oY5x0zZP
— Dr Sumita Misra IAS (@sumitamisra) July 25, 2021
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंदिर की तस्वीरें साझा करते हुए ट्वीट किया, उत्कृष्ट, सभी को बधाई, खासकर तेलंगाना की जनता को। प्रतिष्ठित रामप्पा मंदिर (Ramappa Temple) महान काकतीय वंश के उत्कृष्ट शिल्प कौशल को प्रदर्शित करता है। मैं आप सभी से इस राजसी मंदिर की यात्रा करने और इसकी भव्यता का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने का आग्रह करता हूं।
केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी ने ट्वीट करते हुए कहा, ‘मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि यूनेस्को ने तेलंगाना के वारंगल के पालमपेट में स्थित रामप्पा मंदिर (Ramappa Mandir) को विश्व धरोहर स्थल के तौर पर मान्यता दी है। राष्ट्र, खासकर, तेलंगाना के लोगों की ओर से, मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) का उनके मार्गदर्शन और समर्थन के लिए आभार व्यक्त करता हूं।
देश के लिए गौरव का क्षण। यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में शामिल हुआ हड़प्पा कालीन शहर धोलावीरा और काकतिया रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर। pic.twitter.com/oObtWKdGrf
— Arjun Ram Meghwal (@arjunrammeghwal) July 28, 2021
यूनेस्को ने तेलंगाना में स्थित 13वीं सदी के काकतीय रुद्रेश्वर रामप्पा मंदिर (Kakatiya Rudreshwara Temple) को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) की मान्यता दे दी है। 13वीं सदी में बना यह मंदिर आज भी मजबूती के साथ खड़ा है। जबकि इसके बाद में बने मंदिर खंडहर हो चुके है। वहीं इस मंदिर को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 2019 के लिए यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में एकमात्र नामांकन के लिए प्रस्तावित किया गया था। सावन के पावन महीने में इस शिव मंदिर (Shiv Mandir) को विश्व धरोहर में शामिल किए जाने पर सभी देशवासियों के लिए खुशी का पल है।
मंदिर का निर्माण
रामप्पा मंदिर, जिसे रुद्रेश्वर (भगवान शिव) मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण भारत में तेलंगाना राज्य में स्थित एक यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site in Telangana) है। यह वारंगल से 66 किमी, मुलुगुसे 15 किमी और हैदराबाद से 209 किमी की दूरी पर स्थित है। यह मुलुगु जिले के वेंकटपुर मंडल के पालमपेट गांव की घाटी में स्थित है।
हालांकि अब यह एक छोटा सा गांव है, लेकिन 13वीं और 14वीं शताब्दी के काल में इसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है। मंदिर (Kakatiya Rudreshwara Mandir Telangana) के परिसर में उपस्थित एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण वर्ष 1213 ईस्वी में काकतीय शासक गणपति देव के शासनकाल के दौरान उनके एक सेनापति रेचारला रुद्र देव ने करवाया था।
नक्काशीदार स्तंभ बने आकर्षण
मंदिर एक शिवालय है, जहां भगवान रामलिंगेश्वर की पूजा की जाती है। पुराणिक के अनुसार मार्को पोलो ने काकतीय साम्राज्य की अपनी यात्रा के दौरान इस मंदिर को मंदिरों की आकाशगंगा का सबसे चमकीला तारा नाम दिया था। रामप्पा मंदिर 6 फुट ऊंचे तारे के आकार के चबूतरे पर भव्य रूप से खड़े हुये है। गर्भगृह के सामने के कक्ष में कई नक्काशीदार स्तंभ हैं, जिनकी अवस्थिति इस प्रकार रखी गई है कि यह मिलकर प्रकाश और अंतरिक्ष को अद्भुत रूप से मिलने का प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
शिल्पकार के नाम पर रखा मंदिर का नाम
कई शिल्पी आए, कई योजनाएं लाए लेकिन कुछ जमा नहीं। फिर एक दिन दरबार में पहुंचे शिल्पी रामप्पा। उन्होंने सेनापति को मंदिर निर्माण का भरोसा जताया और मनमुताबिक निर्माण का संकल्प किया। इतिहास कहता है कि रामप्पा शिल्पी ने लगातार 40 साल तक मंदिर का निर्माण किया। पत्थरों की संरचना, उनकी कटान और घुमाव ऐसे हैं कि पुरातत्ववेत्ता आज भी आंखे फाड़ कर देखते हैं और आश्चर्य जताते हैं कि 900 साल पहले ऐसा किस तकनीक से हुआ।
It gives me immense pleasure to share that @UNESCO has conferred the World Heritage tag to Ramappa Temple at Palampet, Warangal, Telangana.
On behalf of the nation, particularly from people of Telangana, I express my gratitude to Hon PM @narendramodi for his guidance & support. pic.twitter.com/Y18vDBAJKS
— G Kishan Reddy (@kishanreddybjp) July 25, 2021
मंदिर का नाम इसके मूर्तिकार रामप्पा के नाम पर रखा गया है, और शायद यह भारत का एकमात्र मंदिर है, जिसका नाम उस शिल्पकार के नाम पर रखा गया है, जिसने इसे बनाया था। अभी तक ऐसा बहुत कम देखने और सुनने को मिला हो कि मंदिर का नाम उसके शिल्पकार के नाम पर रखा गया हो।
मंदिर (Mandir) के शिल्पी का नाम था रामप्पा। काकतीय राजा गणपति देव और सेनापति की इच्छा थी कि भगवान रुद्र (Bhagwan Rudra) का यह मंदिर ऐसा हो, जो कि राज्य की रक्षा का संकल्प बने और सदियों तक इसकी मजबूती यूं ही बुलंद रहे। इस इच्छा को पूरी करने के लिए मुनादी हुई।
मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया
मंदिर की मुख्य संरचना का निर्माण तो लाल बलुआ पत्थर से किया गया है, लेकिन बाहर के स्तंभों को लौह, मैग्नीशियम और सिलिका से समृद्ध काले बेसाल्ट के बड़े पत्थरों से बनाया गया है। मंदिर पर पौराणिक जानवरों और महिला नर्तकियों या संगीतकारों की आकृतियों को उकेरा गया है, और यह काकतीय कला की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं, जो अपनी महीन नक्काशी, कामुक मुद्राओं और लम्बे शरीर और सिर के लिए विख्यात हैं।
किस दिन हुआ विश्व विरासत स्थल के रूप शामिल
मंदिर को 2019 में यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर स्थल की प्रस्तावित अस्थायी लिस्ट में द ग्लोरियस काकतीय मंदिर और गेटवे गौरवशाली काकतीय मंदिर और प्रवेश द्वार के रूप में सम्लित किया गया था। प्रस्ताव को 10 सितंबर 2020 को यूनेस्को के समक्ष पेश किया गया। 25 जुलाई 2021 को, मंदिर को काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर, तेलंगाना के रूप में विश्व विरासत स्थल के रूप में सम्लित किया गया।
900 साल का इतिहास समेटे है मंदिर
मंदिर को देखकर कई सवाल मन में आते है, लेकिन इन सवालों का जवाब मिलेगा तेलंगाना के मुलुगू जिले में स्थित पालमपेट जिले में। यही वह स्थान है जहां पर तकरीबन 900 साल का इतिहास अपने आप में समेटे पत्थरों का एक ढांचा बड़ी ही खूबसूरती से खड़ा है। इस इमारत का नाम रामप्पा मंदिर है, यहां मंदिर के गर्भगृह में रुद्रावतार शिव विराजित हैं, तो इसलिए इसे, रुद्रेश्वर मंदिर भी से भी पहचाना जाता है और शिव को श्रीराम के आराध्य माना जाता है। इस कारण इन्हें रामलिंगेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
1213 ईस्वी में काकतीय शासन में हुआ निर्माण
मंदिर को रामाप्पा मंदिर कहने के पीछे भी एक कहानी है। दरअसल, रुद्रेश्वर मंदिर का निर्माण 1213 ईस्वी में काकतीय साम्राज्य के शासनकाल के दौरान कराया गया था। यह मंदिर रेचारला रुद्र ने बनवाया था, जो काकतीय राजा गणपति देव के एक सेनापति थे। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर के अधिष्ठाता देवता रामलिंगेश्वर स्वामी हैं। मंदिर तो राजा ही बनवाते हैं, लेकिन इनकी संरचना को अमर बनाने का काम शिल्पी का होता है।
जटिल नक्काशी से हुआ डिजाइन
संस्कृति मंत्रालय के बयान के मुताबिक, काकतियों के मंदिर परिसरों की विशिष्ट शैली, तकनीक और सजावट काकतीया मूर्तिकला के प्रभाव को अद्भुत कलाकारी को प्रदर्शित करती हैं। रामप्पा मंदिर इसकी अभिव्यक्ति है और काकतियों की रचनात्मक प्रतिभा का प्रमाण पेश करती है। मंदिर छह फुट ऊंचे तारे जैसे मंच पर खड़ा है, जिसमें दीवारों, स्तंभों और छतों पर जटिल नक्काशी से सजावट की गई है, जो काकतिया मूर्तिकारों के अद्वितीय कौशल को प्रमाणित करती है।
यूरोपीय भी थे मंदिर से मंत्रमुग्ध
मंदिर अपने आप मे इतने रहस्य समेटे हुये है कि इसी कोई भी समझ नही सकता। दूर दूर से पर्यटक मंदिर का दर्शन उसकी मनमोहक छवि को देखने आते है। यूरोपीय व्यापारी और पर्यटक मंदिर की सुंदरता से मंत्रमुग्ध थे और ऐसे ही एक यात्री ने उल्लेख किया था कि मंदिर दक्कन के मध्ययुगीन मंदिरों की आकाशगंगा में सबसे चमकीला तारा है।
काकतीय धरोहर न्यास (केएचटी) के न्यासी एम पांडुरंगा राव ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि वे विश्व धरोहर स्थलों की लिस्ट के लिए भारत के नामांकन में रामप्पा मंदिर को शामिल कराने के लिए 2010 से तेलंगाना (Telangana) राज्य पुरातत्व विभाग और एएसआई के साथ मिलकर इसका प्रस्ताव देने वाला एक डोजियर तैयार कर रहे थे।
Kakatiya Rudreshwara (Ramappa) Temple in Telangana has been inscribed as a UNESCO World Heritage Site
(Photo credit: UNESCO) pic.twitter.com/Ps15vP7p8t
— ANI (@ANI) July 25, 2021
विकिपीडिया पर दर्ज दस्तावेजी आख्यानों के मुताबिक, मंदिर की मजबूत संरचना ने कुछ साल पहले ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। आश्चर्य हुआ कि मंदिर इतना पुराना है फिर भी यह टूटता क्यों नहीं, जब कि इस के बाद में बने मंदिर खंडहर हो चुके है। इतने पुराने मंदिरों का उनका कोई अस्तित्व भी नही बचा है। पुरातत्व वैज्ञानिकों ने इस तथ्य की जांच पालमपेट जा कर की।
यहां आर्किमिडिज का सिद्धांत गलत साबित हो गया। तब जाकर मंदिर की मज़बूती का रहस्य (Mystery) पता लगा कि और सारे मंदिर तो अपने पत्थरों के वजन की वजह से टूट गये थे, पर रामप्पा मंदिर के पत्थरों में तो वजन बहुत कम है इस वजह से मंदिर टूटता नहीं। अभी भी इसका अस्तित्व बना हुआ है।
रहस्य है पत्थरों की बात
अब तक वैज्ञानिक उस पत्थर का रहस्य पता नहीं कर सके कि रामप्पा यह पत्थर कहां से लाए। क्योंकि इस तरह के पत्थर विश्व में कहीं नहीं पाये जाते जो पानी में तैरते हों। तो फिर क्या रामप्पा ने 800 वर्ष पहले ये पत्थर खुद बनाए, अगर हां तो वह कौन सी तकनीक थी उनके पास, वो भी 800-900 वर्ष पहले ही ये सब बनाने में उनकी हेल्प की। ये सब रहस्यमय बना हुआ है।



