
Bhopal: पर्यावरण को प्रदूषित करने में कई हद तक इंसानों का हाथ है। ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल करते है, जिस्से पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान होता है। हम सब समझते हुये भी गलती किये जा रहे है, इसका परिणाम क्या होगा इससे बेख़ौफ़ होकर जिये जा रहे है।
घर पर आराम से बैठकर हम बिजली का उपयोग करते हैं, लेकिन ये हमें जितना बेनिफिट देती है, उतना ही पर्यावरण को नुकसान पहुँचती। इन सब बातों को देखते हुए वैज्ञानिक क्लीन एनर्जी (Clean Energy) के लिए एक खास उपकरण डिजाइन कर रहे हैं, जो पृथ्वी पर ही सूरज जैसी ऊर्जा तैयार करेगा।
आशा जताई जा रही है कि भविष्य (Future) में इससे बहुत अधिक बदलाव देखने को मिलेंगे। ये किसी एक देश का प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि इस खास मशीन को बनाने के लिए 35 देशों को एक साथ मिलकर इसको तैयार करना पड़ रहा।
10 साल से चल रहा काम
वैज्ञानिक पिछले 10 सालों से एक अनूठा प्रकार का मैग्नेट डिजाइन करने में जुटे हैं, जो विशालकाय मशीन इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आईटीईआर) का पार्ट है। इस मैग्नेट का नाम सेंट्रल सोलेनॉयड रखा गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ये मैग्नेट प्लाज्मा में शक्तिशाली करंट का प्रवाहित करेगा। जिससे इस फ्यूजन रिएक्शन को कंट्रोल करने में और शेप करने में काफी हेल्प मिलेगी। इसके साथ ही एक स्वच्छ साफ ऊर्जा का निर्माण होगा।
वैज्ञानिक पिछले 10 सालों से एक विशेष प्रकार का मैग्नेट तैयार करने में जुटे हैं, जो विशालकाय मशीन इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आईटीईआर) का हिस्सा है। साथ ही इस मैग्नेट का नाम सेंट्रल सोलेनॉयड रखा गया है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक ये मैग्नेट प्लाज्मा में शक्तिशाली करंट का प्रवाहित करेगा। जिससे इस फ्यूजन रिएक्शन को कंट्रोल करने में और शेप करने में काफी मदद मिलेगी। इसके साथ ही एक स्वच्छ ऊर्जा का निर्माण होगा।
इसके ताकत की बात करें, तो इसमें हाइड्रोजन प्लाज्मा को 150 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक हीट किया जा सकता है, जो सूरज के भीतरी भाग से 10 गुना ज्यादा गर्म होगा। सबसे खास बात तो ये है कि इस मशीन के चलने से ना तो ग्रीनहाउस गैस (कार्बन डाई आक्साइड, नाइट्रस आक्साइड, मीथेन आदि) का उत्सर्जन होगा और ना ही इससे रेडियोएक्टिव कचरा निकलेगा।
जिससे प्रदूषण को काफी हद तक कम करके स्वस्छ ऊर्जा बनाई जाएगी। इन्हीं सब खासियतों को देखते हुए इसे पृथ्वी का सूरज कहा जा रहा है। वैसे तो इसका अमेरिका के कैलिफॉर्निया में बनाया जा रहा था, लेकिन अब इसे फ्रांस शिफ्ट किया जाएगा। वहां पर ये 2023 तक इंस्टाल हो जाएगा। जिसके बाद 2025 तक इसके जरिए ऊर्जा उत्पन्न होने की संभावना है।
वहीं इस पर 24 बिलियन डॉलर्स का खर्च आने की उम्मीद है। भारत के हिसाब से ये राशि 17 खरब रुपये होगी। साथ ही इस प्रोजेक्ट में भारत, चीन, जापान, कोरिया, रूस, यूके, अमेरिका और स्विट्जरलैंड जैसे 35 देशों से मदद ली जा रही है।
चीन के ‘कृत्रिम सूरज’ ने 20 सेकंड तक असली सूर्य के तापामान से भी 10 गुना ज्यादा तापमान हासिल कर लिया है। चीन, एक्सपेरिमेंटल एडवांस्ड सुपर कंडक्टिंग टोकामैक (EAST) पर काम कर रहा है, जो सूर्य की ऊर्जा निर्माण प्रक्रिया की नकल पर आधारित है।
चीन की सरकारी मीडिया का दावा है कि इसने 101 सेकंड तक 12 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान पर चलकर एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। अगले 20 सेकंड तक तो इस ‘कृत्रिम सूरज’ (Artificial Sun) ने 16 करोड़ डिग्री सेल्सियस के उच्चतम तापमान को भी हासिल कर लिया, जो की सूर्य (Sun) से भी 10 गुना से भी ज्यादा गर्म है।
एक्सपेरिमेंटल एडवांस्ड सुपर कंडक्टिंग टोकामैक (ईएएसटी) रिएक्टर एक एडवांस्ड न्यूक्लियर फ्यूजन प्रायोगिक शोध उपकरण है। यह चीन के हेफेई स्थित चाइनीज एकैडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा फिजिक्स में मौजूद है। ‘कृत्रिम सूरज’ (आर्टिफिशियल सन) का उद्देश्य न्यूक्लियर फ्यूजन की उसी प्रक्रिया (Nuclear fusion process) को दोहराना है, जिस तरह से सूर्य को शक्ति (Power Of Sun) मिलती है।
ईएएसटी चीन के तीन टोकामैक में से एक है, जो इस समय वहां काम कर रहे हैं। ईएएसटी के अलावा चीन इस समय एचएल-2ए रिएक्टर के साथ-साथ जे-टीईएक्सटी भी चला रहा है। पिछले साल दिसंबर में पहली बार चीन ने अपने सबसे बड़े और सबसे अत्याधुनिक न्यूक्लियर फ्यूजन एक्सपेरिमेंटल रिसर्च डिवाइस एचएल-2ए टोकामैक को सफलतापूर्वक चलाया था, जिसे चीन के परमाणु शक्ति शोध क्षमता के विकास में मील का पत्थर बताया जाता है।
The world’s largest artificial sun is being used to find clean energy pic.twitter.com/hYClWcknGb
— NowThis (@nowthisnews) June 12, 2019
ईएएसटी 2006 से ही ऑपरेशनल है और तब से इसने कई रिकॉर्ड बनाए हैं। यह प्रोजेक्ट इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्यर (आईटीईआर) फैसिलिटी का हिस्सा है और 2035 में ऑपरेशनल होने के बाद यह विश्व का सबसे बड़ा न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर बन जाएगा। इस प्रोजेक्ट में कई देशों का योगदान है, जिसमें भारत के अलावा दक्षिण कोरिया, जापान, रूस और अमेरिका भी शामिल हैं।



