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Delhi: नागार्जुन प्राचीन भारत (Nagarjuna In Ancient India) के एक महान शक्स का नाम है। नागार्जुन का जन्म एक अनुमान के मुताबिक पहली शताब्दी के मध्य में या दूसरी शताब्दी के प्रारम्भ में दक्षिण भारत के विदर्भ साम्राज्य, जो अभी के समय के महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में स्थित है, में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
नागार्जुन आगे जाके गणित, भौतिकी और खगोल विज्ञान के बहुत बड़े ज्ञाता बने, बल्कि रसायन शास्त्र (Ancient Chemistry) में भी उस वक़्त पूरी दुनिया में उनके जैसा कोई दूसरा ग्यानी नहीं था। अभी के महान रसायन शास्त्री प्रफुल्ल चंद्र रे की पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमेस्ट्री में भारत के इस अद्धुत प्राचीन रसायन शास्त्र के बारे में लिखा गया है।
नागार्जुन ने रस रत्नाकर (Ras Ratnakar Book of Nagarajan) और रसेंद्र मंगल (Rasendra Mangalam of Nagarjuna) जैसे ग्रंथों की रचना की थी और इनमे ऐसा ज्ञान था, जो आज के विज्ञान (Science) के पास भी नहीं है।
जिस तरह वेदों और महाकाव्यों की कुछ प्रतियां आज भी हमारे पास है, ठीक ऐसे ही विज्ञान के अद्भुत प्रयोग भी इन ग्रंथों के रूप में सुरक्षित हैं। कुछ लोगो ने इस डाटा को समय समय पर सजोये रखा और इसका कुछ अधूरा हिस्सा आज भी सुरक्षित है।
नागार्जुन भारत के प्राचीन रसायन शास्त्र का सबसे बड़े ज्ञाता थे। अपने समय में नागार्जुन ने अपने ज्ञान को समेत कर इन महान ग्रंथों की रचना की। महाराष्ट्र के नागलवाड़ी ग्राम में उनकी प्रयोगशाल होने के प्रमाण मिले हैं। कुछ प्रमाणों के अनुसार वे ‘अमरता’ (Immortality) की प्राप्ति की खोज करने में लगे हुए थे और उन्हें पारे (Mercury) और लोहे (Iron) के निष्कर्षण का ज्ञान था।
नागार्जुन की सबसे फेमस रचना रस रत्नाकर (Ras Ratnakar) है, लेकिन अन्य रचनाओं की तरह इसे भी लगातार कई लोगो ने कुछ चेंज करके संपादित किया। फिर भी रस रत्नाकर ग्रंथ से ये तो सिध्द होता है कि रसायन शास्त्र का इतिहास भारत में बहुत ही प्राचीन (Chemistry in Ancient India) था।
Do you know?
The Golden Shine on the artificial jewellery of modern times is a gift by Nagarjuna.
Now,u might be wondering,who is Nagarjuna?
Nagarjuna was the name of an ancient Indian scholar&scientist whose name is associated with the fields of Alchemy,Chemistry& Metallurgy. pic.twitter.com/1cEm2Gq5Ow
— Vibhu Vashisth 🇮🇳 (@VIBHU_Tweet) April 17, 2021
ऐसा पाया गया की नागार्जुन ने रसायन शास्त्र (Chemistry) और धातु विज्ञान (Metal Science) पर बहुत खोज और रिसर्च कार्य किया। रसायन शास्त्र पर उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें ‘रस रत्नाकर’ और ‘रसेन्द्र मंगल’ बहुत प्रसिद्ध हैं। रसायनशास्त्री और धातुकर्मी होने के अलावा इन्होंने अपने चिकित्सकीय ज्ञान से अनेक असाध्य रोगों की औषधियाँ बनाई थी।
नागार्जुन धातु से सोना बनाने वाले प्रयोग में लगे थे
आपको बता दें की नागार्जुन को सबसे अधिक सोना बनाने की विधि बनाने वाले तौर पर जाना जाता है। दिल्ली के बिड़ला मंदिर (Birla Mandir Delhi) में सोना बनाने की एक घटना (Making Gold Incident) का वर्णन लिखा हुआ है।
इतिहासकार राजेंद्र सिंह जी ने अपने एक लेख में अपने जीवन काल में भी अन्य धातुओं से सोना बनाने वाले कुछ वैद्यों को जानने का दावा किया है। उन्होंने अपने इसी लेख में बिड़ला मंदिर के इस लेख का जिक्र करते हुए लिखा है कि साल 1930-32 में बिड़ला जी ने ये प्रयोग करवाया था।
इस किताब में ऐसा बताया गया की उन्होंने ऋषिकेश के एक वैद्य को बुलाया, जिन्होंने एक तरल पदार्थ (Liquid) बनाया था। इस पदार्थ को उन्होंने तांबे (Copper) पर डाला, तो वह तांबा तत्काल सोने में बदल (Copper Convert into Gold) गया था। इसे सुनारों को दिखाया गया और उन्होंने उसके सोना होने की बात मानी। ये उस समय 75 हजार रुपए में बेचा भी गया था। यह एक किस्सा है।
Nagarjuna of Ancient India had method of Convert Metals into Gold. It was ancient Indian Science. pic.twitter.com/R2ShOLNWH5
— sanatanpath (@sanatanpath) August 27, 2021
ऐसे में नागार्जुन के ग्रंथों से ये बात पता चलती है कि प्रयोगशाला में नागार्जुन (Nagarjuna in Lab) ने पारे पर बहुत प्रयोग किए थे। उन्होंने पारे को शुद्ध करना और उसके अन्न प्रयोग की विधियां बताई हैं। अपने ग्रंथों में नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं का मिश्रण बनाने, उसमे पारा उपयोग कर अन्य धातुओं का शोधन करने और विभिन्न धातुओं को सोने या चंडी में बदलने की विधि (Method of Convert Metals into Gold and Silver) बताई है। यह एक धातु रसायन विज्ञान (Metal Chemistry Science) है।
आज के आधुनिक रसायनशास्त्रियों में भी नागार्जुन के ग्रंथो और उनके प्रयोगों को समझने की ललक है, परन्तु नागार्जुन के ग्रन्थ और वह प्राचीन डाटा आज के समय में अधूरा ही प्राप्त है और अज्ञानता के चलते कोई भी इसे समझ नहीं पाया है। जो ज्ञानी वैद्य इस विधि को जानते थे, वे अब या तोह जीवित नहीं है या इस विधी और विद्या को दुनिया से बचाने और सुरक्षित रखने के चलते सामने नहीं ला रहे है।



