हर मकर संक्रांति को इस मंदिर में आशिकों का मेला लगता है और जमा होते हैं प्रेमी जोड़े(Aashiqo Ka Mela)

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Aashiqo Ka Mela Bhuragarh fort Banda
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Banda, Uttar Pradesh: हर इंसान को अपने जीवन में काम से काम एक बार तो प्रेम जरूर होता है। प्रेम का अहसास प्रेम करने वाला बेहतर जानता है, वह हमें लिखने की जरुरत नहीं है। उत्तर प्रदेश के बांदा (Banda UP) जिले मे केन नदी के तट पर भूरा गढ़ किला (Bhuragarh Fort) स्थित है। यहां पर हर साल मकर संक्रांति (Makar Sankranti) पर मेला लगता है। आसपास के इलाकों मे इस आयोजन को “आशिकों का मेला” (Aashiqo Ka Mela) नाम से जाना जाता है।

प्रेम के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देने वाले नट महाबली के मंदिर (Temple) मे मकर संक्रांति पर लगने वाले मेले (Aashiqon ka Mela Bhuragarh fort Banda UP) मे हजारों की संख्या मे प्रेमी जोडे इस मंदिर मे अपनी अपनी मम्मत मांगने के लिए आते हैं। स्थानीय लोग इसे प्रेम का मंदिर मानते हैं, श्रद्धालु केन नदी मे स्नान करके मंदिर मे भूरागढ़ किले मे स्थित प्यार के मंदिर मे पूजा करते हैं और मुराद मांगते हैं। इस बारे मे यहां के स्थानीय लोगों मे यह कहानी बहुत प्रचलित है।

आज से करीब 600 साल पहले महोबा के अर्जुन सिंह (Arjun Singh) भूरागढ़ किले के किलेदार थे। किले मे ही मध्यप्रदेश के सरबई गांव का निवासी 21 वर्षीय नट बीरन (Nat Artist Beeran) नौकरी किया करता था। नट समुदाय उस समय नाचने गाने का काम करता था, किले मे नौकरी के दौरान ही राजा की बेटी को बीरन से प्यार हो गया। बीरन एक तपस्वी नट था। बेटी के प्रेम के बारे मे जब अर्जुन सिंह को पता चला तो उन्होंने बीरन के सामने एक शर्त रखी।

राजा ने कहा बीरन अगर कच्चे धागे की रस्सी पर चढकर पर नदी के दूसरी ओर स्थित बांबेश्वर पर्वत से किले मे पहुंच जाएगा तो राजकुमारी से उसकी शादी कर दी जाएगी। सन 1850 मे मकर संक्रांति के दिन प्रेमी ने प्रेमिका के पिता की शर्त पूरी करने के लिए नदी (River) के इस पार से किले तक रस्सी बांध दी। कच्ची रस्सी पर चलता हुआ वह नट किले की ओर बढने लगा, उसका हौसला बढाने के लिए नट बिरादरी के लोग गाजे बाजे के साथ लोक संगीत बजा रहे थे।

नट ने रस्सी पर चलते हुए नदी पार कर ली ओर किले के समीप जा पहुंचा। यह तमाशा अर्जुन सिंह किले से देख रहा था, उसकी बेटी भी अपने प्रेमी के साहस का नजारा देख रही थी। युवा नट किले मे पहुंचने ही वाला था, तभी किलेदार नोने सिंह ने रस्सी काट दी। नट नीचे चट्टानों पर जा गिरा, और वहीं पर उसकी मौत हो गयी। प्रेमी (Lover) की मौत का सदमा किलेदार की बेटी बर्दाश्त न कर पायी, उसने भी किले से छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।

इन दोनो प्रेमी प्रेमिकाओं की याद मे उसी जगह पर 2 मंदिर बनवाए गए, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ था। दोनो ही मंदिर आज भी बरकार हैं, नट बिरादरी के लोग आज भी विशेष तौर पर इसे पूजते हैं। प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए यह खास दिलचस्प स्थान बन गया। तभी से हर साल मकर संक्रांति पर यहां मेला लगाया जाता है और दूर-दूर से हजारों की संख्या मे प्रेमी-प्रेमिका इस मेले मे आकर मंदिर मे पूजा के साथ अपने प्यार की खातिर मन्नतें भी मांगते हैं।

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