
Kunikeri/Haveri: एक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का क्या महत्व है इस बात को वही समझ सकता है, जो अशिक्षित है और समाज में रहने के लिए मेहनत कर रहा है। शिक्षा व्यक्तिगत पहचान के साथ एक सकारात्मक सोच वाली समाज का निर्माण भी करता है।
आज के समय में आप दुनिया में कही भी चले जाओ अगर आप शिक्षित है, तो आप भटक नही सकेंगे। इस शिक्षा के लिए लोग देश विदेश तक जाते है। समय के साथ शहरों ने तो खूब तरक्की की शिक्षा से लेकर व्यवसाय के भी काफी अच्छे अवसर दिए, परंतु गांव में आज भी प्रारंभिक शिक्षा के लिए बच्चे इधर उधर भटकते हैं।
कुछ गरीब बच्चे होते हैं, जो दिमाग से बहुत इंटेलिजेंट होते है, परंतु आर्थिक परेशानी और गांव में शिक्षा के अभाव के चलते वे पढ़ लिख नहीं पाते है। इन समस्याओं को ज्यादातर लड़कियां झेलती है, क्योंकि एक गांव से दूसरे गांव पढ़ने के लिए बेटियो को भेजने से अभिभावक थोड़ा हिचकिचाते है।
आज समाज में एक नेक उदाहरण बन कर आई एक बुजुर्ग महिला जिसने अपनी एक करोड़ की जमीन दान में दे दी। शिक्षा का मंदिर (School) बनाने में इस बुजुर्ग महिला (Old Woman) के काम की सभी लोग तारीफ कर रहे है, तो आइए जानते है इन दादी की कहानी को।
गांव के लिए किया समाज सुधार का काम
आज कल समाज में हर कोई अपने फायदे के बारे में पहले सोचता है, बहुत कम लोग ऐसे है, जो समाज के बारे में सोचते है लोगो का एक ही उसूल है की अपना काम होना चाहिए फिर चाहे वो कैसे भी हो।
गरीबी और अभाव ग्रस्त व्यक्ति को समाज के कुछ नेक व्यक्तियों के कारण ही मदद मिल पाती है, समाज कल्याण के प्रति उठने वाले कदमों में से एक कदम हन्चम्मा चौदरी का भी है, जिन्होंने समाज कल्याण के साथ देश का भविष्य सुधारने का भी काम किया है।
आपको बता दें कर्नाटक राज्य के एक छोटे से कस्बे की रहने वाली हन्चम्मा चौदरी जो पिछले कई सालों से इस गांव में रह रही है। वे जब से वहा रह रही थी, उन्होंने शुरू से ही एक समस्या देखी वो है गांव में पाठशाला का ना होना, जिससे उस गांव की प्रगति रुकी हुई थी। कई दफा स्कूल निर्माण के प्रस्ताव आए, परंतु हमेशा अपर्याप्त भूमि के कारण इस समस्या का निवारण ना हो सका। जो गांव की विकट समस्या थी गांव के बच्चो को अक्सर दूसरे गांव जाना पड़ता था।
हर बार गांव वालो के सपने टूटते रहे
हर बार गांव के लोग गांव में स्कूल बनने का सपना देखते और जमीन की बात आती, तो उनका सपना टूट कर बिखर जाता ऐसे हमेशा से होता रहा, फिर जब ये बात गांव की महिला हन्चम्मा चौदरी को पता लगी, तो उन्होंने सोच लिया था की अब गांव की भलाई के लिया वे खुद कार्य करेंगी।
इसी के चलते उन्होंने इस काम की शुरुआत करते हुए गांव में स्कूल निर्माण के लिए अपनी आधा एकड़ जमीन दान में दी, जिससे गांव में स्कूल बन सके और गांव के बच्चो को भी एक बेहतर भविष्य मिल सके।
दादी ने तीन दशक पहले ही यह शुभ काम को अंजाम दे दिया था
एक रिपोर्ट के अनुसार तीन दशक पहले ही हन्चम्मा चौदरी (Hucchamma Chowdri) ने इस काम को अंजाम दे दिया था। मिली जानकारी से पता चला कि बीते 3 दशक पहले हंचमा चोदरी की शादी इसी गांव में हुई थी और कुछ समय पश्चात ही उनके पति का स्वर्गवास हो गया, जिससे वे अकेली रह गई।
इसी बीच गांव में कुछ अधिकारियों का आगमन हुआ जो स्कूल बनाने के लिए जमीन की तलाश कर रहे थे, परंतु उन्हें जमीन नहीं मिल रही थी। उन्होंने खूब कोशिश की जमीन ढूंढने की परंतु हर बार की तरह इस बार भी उन्हें निराशा ही हाथ लगती, परंतु हन्चम्मा चौदरी ने आगे आकर अपनी जमीन से आधा एकड़ जमीन स्कूल बनाने में दे दी, जिससे अधिकारियों ने खुशी खुशी वहा पर अपना काम शुरू कर दिया।
समाज सेविका के रूप में उभरी हन्चम्मा
स्कूल बनने के कुछ समय बाद दादी को बताया गया की खेल का मैदान बनाने के लिए जमीन कम पड़ रही है, उन्हे और जमीन की जरूरत है, तो उन्होंने आधा एकड़ जमीन बच्चे के लिए खेल का मैदान बनाने के लिए दे दी। हन्चम्मा चौदरी कहती है, इस काम को कर उन्हे काफी ज्यादा आनंद की अनुभूति होती है अब वे स्कूल के बच्चो को खाना खिलाती है और उनके साथ वक्त भी बिताती है।



