रांची के इंजीनियर ने काई से 3G बायो फ्यूल बना दिया, यह देश का ऐसा पहला ईंधन है: Innovation

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Jharkhand engineer uses algae in water to extract bio-fuel and it is cheaper than petrol. Vishal Prasad Gupta has developed a bio-fuel.

Ranchi: दोस्तों आज आवागमन ट्रांसपोर्ट के लिये पूरी दुनिया पेट्रोलियम फ्यूल पे ही डिपेंड है, छोटी स्कूटर से ले के हवाई जहाज तक इन्ही पेट्रोलियम ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे न केवल ये महंगे होते जा रहे, बल्कि हवा प्रदूषण भी चरम पे आ चुका है।

दुनिया भर के तमाम वैज्ञानिक पेट्रोलियम ईंधन का ऑप्शन ढूढ़ने में लगे हैं और इसी दौड़ में भारत के एक इंजीनियर विशाल गुप्ता (Vishal Prasad Gupta) ने 3G थर्ड जेनरेशन का काई से बायो फ्यूल (Bio-Fuel) बना डाला, जिससे छोटी गाड़ियों से ले के बड़े कमर्शियल व्हीकल भी चलाये जा सकते हैं पेट्रोल के बिना।

कौन हैं ये विशाल गुप्ता और क्यों बनाया उन्होंने इस क्षेत्र में अपना करियर

विशाल गुप्ता झारखण्ड राज्य के रहने वाले है। इन्होंने मेसरा स्थित बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कम्पलीट की। फिर इंडियन ऑयल में डिस्ट्रीब्यूशन का काम संभालते हुए करीब 15 सालों तक जॉब किया और यही से उन्हें प्रेरणा मिली बायो फ्यूल बनाने की।

जिसके लिये 2015 में जॉब छोड़ के काई से बनने वाले फ्यूल पे रिसर्च और इनोवेशन का काम शुरू किया, आज न केवल 3g बायो फ्यूल बनाया बल्कि एक सुपर फ्यूल का भी अविष्कार कर दिया है, जो 3g से भी ज्यादा उन्नत है।

काई से बना ये बायो फ्यूल (Algae To Bio-Fuel), कैसे काम करता है

विशाल गुप्ता द्वारा दी जानकारी के अनुसार अक्सर पानी मे जो काई जम जाती है, जो लोगो को हमेशा से यूज़ लैस लगती रही है, आज उसी से इस फ्यूल का निर्माण किया जाता है, इसलिये आज काई की बाकायदा खेती करते हैं, ताकि बड़े स्तर पे फ्यूल का प्रोडक्शन किया जा सके।

जानकारी के अनुसार ये एक स्वच्छ ईंधन है, जिससे किसी भी तरह का कार्बन उत्सर्जन नही होता, वही इसकी कीमत भी करीब 27 रुपये से 30 रुपये प्रति लीटर पड़ती है, जो कि पेट्रोल की तुलना में बेहद कम है।

रांची में ही किया 3G बायो फ्यूल पे रिसर्च एंड डेवलपमेंट

बताया जाता है कि विशाल गुप्ता ने रांची के ही कृषि इंस्टीट्यूट की लैब और इंस्ट्रूमेंट्स का उपयोग कर अपनी रिसर्च 2015 में शुरू की थी, उनके इस आईडिया से कृषि इंस्टिट्यूट के प्रीफेसर्स भी काफी प्रभावित थे, इसलिये हर तरह का सपोर्ट भी उन्हे मिला और 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद 2019 में उन्हें सफलता मिली।

वैसे तो बायो फ्यूल पहले भी ईजाद किया जा चुका था, पर वो 1G या 2G तक सीमित थे पर 3G बायो फ्यूल बनाने वाले ये देश के पहले वैज्ञानिक बन गये हैं। इस पूरे अविष्कार में उन्हें करीब 70 से 80 लाख का खर्च आया। उन्होंने 1G बायो फ्यूल बनाने वाले एक पुराने यूनिट को ही अपग्रेड कर 3G फ्यूल का प्रोडक्शन कर रहे, जिसकी क्षमता करीब 3 लाख लीटर है, जो एक्सपेंडेबल है, 250 मिलियन टन बायो फ्यूल तक।

केरला सरकार ने दिखाई रुचि अब साथ कर रहे काम

इस अविष्कार को सफलता मिलते ही रांची नगर निगम के कॉमिशनर मुकेश कुमार ने एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये इस नये 3G बायो फ्यूल की पूरी डिटेल्स साझा की जो देश भर में आग की तरह फैल गयी, इसी के जरिये केरला सरकार ने इस प्रोजेक्ट पे रुचि जाहिर करते हुऐ गुप्ता को आमंत्रित किया।

आपको बता दें कि केरल जल स्त्रोतों और संसाधनों के मामले में बहुत ही सम्पन्न राज्य है। लगातार 6 से 8 स्तर पे अलग अलग तरह से प्रेजेंटेशन और केरल की लोकल रिसर्च के बाद K-DISC केरल डेवलपमेंट एंड इनोवेशन स्ट्रेटेजिक काउंसिल के तहत मिल के अब बड़े लेवल पे इसके उत्पादन की शुरवात हो रही है।

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