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Leh-Laddakh: आज हम आपको एक ऐसे पौधे और उसमे उगने वाले फल के बारें में बताने जा रहे है, जो जितना दुर्लभ है, उतना ही फायदेमंद है। इस छोटे से फल में अनेको गुण मौजूद है। इसकी खूबियों को जानकर आप हैरान रह जायेंगे।
एशिया और यूरोप के ऊंचे और रूखे दुर्गम इलाकों में उगने वाला यह पौधा इन क्षेत्रों का मूल निवासी है। यह पहाड़ों में अपने आप सदियों से उगता रहा है। यह पौधा और फल अत्यधिक ठंड को बर्दाश्त कर लेता है और झाड़ियों (Shrubs) के रूप में अपनी जड़ों से मिट्टी को जकड़ कर उसे भूमि-कटाव से बचाने का काम भी बखूबी करता है।
इस पौधे की खूबियां यही ख़त्म नहीं होती है, यह हवा में मौजूद नाइट्रोजन को खुराक के रूप में जमा करके मिट्टी को उपजाऊ बनाने का काम भी करता है। इस पौधे की झाड़ियां इतनी घनी होती है की यह जल संरक्षण का काम भी कर लेती है। पहाड़ों के
वन्य जीव इस पौधे की झाड़ियों (Shrubs Plant) में शरण लेकर खुद को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
वैसे इस पौधे और झाड़ियों का वैज्ञानिक नाम हिप्पोफी (Hippophae) है, जो एक लैटिन भाषा का शब्द है। इसका पौधा और झाड़ भारत के अलावा चीन, मंगोलिया, फिनलैंड, कनाडा, रूस, उत्तरी यूरोप के कुछ देशों में अपने आप उडाता है, जिसे सी-बकथोर्न (Sea Buckthorn) कहा जाता है।
आपको बता दें की पहले के ज़माने में लोग अपने घोड़ों को तंदुरुस्त रखने, उनका वजन बढाने और खाल में चमक लाने के लिए इस पौधे की पत्तियां, टहनियों और तनों को खिलाते थे। इसी के चलते इसका नाम ‘हिप्पोफी’ रखा गया, क्योंकि घोड़े को हिप्पो भी कहा जाता है। अंग्रेजों ने अपनी भाषा में इसका नाम ‘सी-बकथोर्न’ (Sea Buckthorn Plant) रखा है। यह पौधा और इसके फल वैसे में अलग अलग देखो में उगते है। यह भारत में भी एक जगह उगता हैं।
लेह-लद्दाख में में भरी मात्रा में उगता है
भारत में यह लेह-लद्दाख (leh-ladakh), सिक्किम और उत्तराखंड में उगता है। एक रिपोर्ट में ऐसा अनुमान लगाया गया है की लेह-लद्दाख में यह पौधा 11,000 हैक्टर क्षेत्र में जंगली झाड़ियों (Wild Bushes) के रूप में उगता है। उत्तराखंड (Uttrakhand) में यह दो प्रजातियो के रूप में उगता हैं।
Leh Berry is very awesome fruit. pic.twitter.com/XZvE6IVNWX
— sanatanpath (@sanatanpath) November 19, 2021
आपको बता दें की लद्दाख में एक फ्रुट-जूस मिलता है, जिसका नाम लेह बेरी जूस (Leh Berry Juice) है। वह इसी हिप्पोफी या सी-बकथोर्न के फलों का जूस (Sea Buckthorn Fruit Juice) होता है। वैज्ञानिकों ने इस जंगली झाड़ियों पर सन् 1992 में शोधकार्य शुरू किया और इसके पोषक तत्वों वाले फलों की खासियत को जाना। उनसे स्वास्थवर्धक लेह बेरी जूस बनाया। लेह-लद्दाख में इस पौधे को आम तौर पर आप लेह बेर्री (Leh Berry) भी कह सकते है।
यह बहुत ज्यादा ठंड में भी जमता नहीं
अब आपको इस लेह बेरी जूस का महत्व बताते है। यह बहुत ज्यादा ठंड में भी जमता नहीं है। हिमालय की बर्फ हो या सियाचिन ग्लेशियर हो यह जूस कभी नहीं जमता है। सेना के जवानो के लिए यह बेहतर ड्रिंक हो सकता है। इस ड्रिंक में विटामिन खनिज, कैरोटिनाइड और अन्न तत्व मौजूद होते है। आज के समय में DRDO इसका 5-6 करोड़ रूपए का प्रति वर्ष का व्यापार करता है।
लेह बेरी के छोटे ऑरेंज रंग के फलों में कई गुण है
लेह बेरी के छोटे ऑरेंज रंग के फलों में भरपूर मात्रा में विटामिन-सी होता है। अतः इसे विटामिन-सी का किंग कहा गया है। इसके साथ ही साथ इस फल में विटामिन-ई और विटामिन-के, पोटैशियम, मैंगनीज और तांबा भी मौजूद होता हैं। लेह बेरी के तेल से स्किन कोमल होती है और यह त्वचा के लिए किसी क्रीम से भी ज्यादा असरदार है।
This Is Leh Berry pic.twitter.com/dZP14YAm21
— sanatanpath (@sanatanpath) November 19, 2021
इस बेशुमार पौष्टिक जूस का इस्तेमाल चंगेज खान ने अपने सैनिकों को तंदुरुस्त रखने के लिए किता था। चंगेज खां ने अपने सैनिको को स्वस्थ रखने, दिमाग तेज़ करने, याददाश्त बढ़ाने और कई बीमारियों से बचाने के लिए इस पौधे की झाड़ी में उगने वाले फल खिलाए थे।
इस पौधे से औषधियां भी बनाई जाती हैं। औषधीय चिकित्सा में इस झाड़ की पत्तियों, छाल, फलों और इसके तेल का इस्तेमाल किया जाता है। इस पौधे की पत्तियां और छाल दस्त रोकने में कारगर होती है। इसकी सहायता से चर्म रोगों का भी इलाज़ किया जाता है। इसका सेवन मानव शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आप भी इसका सेवन लेह-लद्दाख में जाकर कर सकते हैं।



