
Bulandshahr: कुछ लोग आत्मनिर्भर बनना तो चाहते है। लेकिन मेहनत नही करना चाहते। कुछ लोग ऐसे होते है, जो खुद का कुछ करना चाहते हैं, तो उनके लिए कहूंगी जो कोई सपना देखा है, तो उसके पीछे हाथ धोकर पड़े रहो। जब तक हासिल ना हो जाये तब तक हार मत मानो।
हम आपको ऐसी महिला की कहानी से रूबरू करा रहे है, जो ज्यादा तो नही पढ़ी, लेकिन उसके आईडिया ने उसे जो मुकाम दिया उसकी वे कभी कल्पना भी नही कर सकती। आज जिस शोहरत की मालकिन है, वो उस आईडिया से आपको भी आपकी मंजिल तक पहुचा सकता है।
हमारे देश में कई लोग रोजगार की खोज में दूसरे शहरों यहा तक कि दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो दूसरे शहर की ओर पलायन कर ख़ुद का व्यवसाय प्रारंभ करते हैं, ऐसे लोगों की दृढ़ता और हिम्मत की सच में दाद देनी होगी।
आज की कहानी (Story) एक ऐसी ही महिला की कामयाबी को लेकर है, जिन्होंने घर की आर्थिक स्थिति से परेशान आकर भारत की राजधानी दिल्ली का रुख किया और अपनी मजबूत इरादों की बदौलत सफलता (Success) का एक अनोखा संसार बनाया।
यह कहानी है उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में निवास करने वाली कृष्णा यादव की कामयाबी (Krishna Yadav Success) के आसपास घूम रही है। वर्ष 1995-96 की बात है, कृष्णा का परिवार एक बुरे आर्थिक संकट से गुजर रहा था। उनके पति भी मानसिक तोर पर काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, ऐसी स्थिति में परिवार की संपूर्ण जिम्मेदारी का भार कृष्णा के कंधे ही आ टिका।
जीवन के इस कठिन दौर को चुनौती की तरह स्वीकार कर कृष्णा ने दिल्ली की ओर जाने के लिए निश्चित किया। अपनी एक सखी से 500 रूपये उधार लेकर कृष्णा परिवार समेत दिल्ली आ पहुंची, एक नई आशा और विश्वास के साथ।
शहर में सरलता से रोजगार मिल पाना बिलकुल सरल नहीं था। काफी परिश्रम करने और इधर-उधर पेर मारने के पश्चात भी उन्हें कोई रोजगार नहीं मिल पाया, अंत में विवश होकर उन्होंने कमांडेट बीएस त्यागी के खानपुर स्थित रेवलाला ग्राम के फार्म हाउस के देखभाल करने की नौकरी शुरू की। कमांडेट त्यागी के फार्म हाउस में विशेषज्ञों के निर्देशन में बेर और करौंदे के बाग लगाए गए थे।
उस समय बाज़ार में इन फलों के अच्छे दाम मिलते थे थी, इसलिए वैज्ञानिकों ने कमांडेट त्यागी को मूल्य संवर्धन और खाद्य प्रसंस्करण तकनीक से अवगत कराया। फार्म हाउस में कार्य करते-करते कृष्णा को भी खेती से बेहद लगाव बढता चला गया और फिर उन्होंने वर्ष 2001 में कृषि विज्ञान केंद्र, उजवा में खाद्य प्रसंस्करण तकनीक का तीन महीने का प्रशिक्षण लेने का निर्णय लिया।
Adding spice to mela Shri Krishna pickles pic.twitter.com/NGI38Ej2rS
— Kamal (@jeetkml) February 14, 2018
इस प्रशिक्षण के पश्चात कृष्णा ने भी कुछ प्रयोग करने का साहस दिखाते हुए तीन हजार रुपये लगाकर 100 किलो करौंदे के अचार और पांच किलो मिर्च के अचार निर्मित किया, और पुनः उसे विक्रय कर उन्होंने 5250 रुपये का लाभ अर्जित किया। हालांकि फायदे की राशि उतनी बड़ी नहीं थी, परन्तु प्रथम कामयाबी ने उनके साहस को एक नई उड़ान दी।
इस दौरान उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा परंतु उन्होंने कभी हर नहीं मानी और दृढता के साथ अपने लक्ष्य-पथ पर अडिग रहीं। इस कड़ी में पति ने भी उनका पुरजोर साथ दिया। कृष्णा घर पर ही सारा माल तैयार करतीं और उनके पति नजफगढ़ में सड़कों के किनारे ठेले लगा कर इसका विक्रय किया करते। हालांकि करौंदा कैंडी का कांसेप्ट उस समय पूरी तरह से नया था, परंतु ग्राहकों द्वारा मिल रही अच्छी प्रतिक्रिया ने उन्हें बड़े स्तर पर तथा और भी उत्पादों का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।
From a street vendor selling pickles to now owning 5 companies. Krishna Yadav, with an initial investment of Rs. 2000, today employs thousands of people and has a business turnover of crores.
Watch her journey: https://t.co/m2Z1z8cNTq#HumJahanJoshWahan #AbSkillsKiBari pic.twitter.com/ytNQ0wWnXN
— Josh Talks (@JoshTalksLive) October 17, 2019
आज श्रीमती कृष्णा यादव ‘श्री कृष्णा पिकल्स’ (Shri Krishna Pickles) ब्रांड के बैनर तले कई तरह की चटनी, आचार, मुरब्बा आदि समेत कुल 87 प्रकार के उत्पाद निर्यात करती हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की आज इनके व्यापार में तकरीबन 500 क्वींटल फलों और सब्जियों का उपयोग होता है, जिसका मूल्य करोड़ों में है।
हाल ही में कृष्णा ने अपने व्यवसाय का विस्तार पेय-पदार्थ जैसे उत्पादों में भी किया है। कभी सड़क किनारे एक रेहड़ी से प्रारंभ कर आज कई बहुमंजिला इमारत तक की कंपनी बनाने की कहानी अनेक लोगो को प्रेरणा (Inspiration) दे रही है।



