प्लास्टिक के बेकार बोतल से पौधों को दी नई जान, टीचर के इस जुगाड़ से पौधे तेजी से बढ़ रहे हैं

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Plastic Bottle Tips
Indian Farmer from water deficit Jhabua district of MP has used Waste Glucose Bottles To Build Drip Irrigation System.

Jhabua: इस समय पर्यावरण संबंधी चिंता सभी को है। कई लोग इसे बचाने के लिए काफी सारे प्रयास भी कर रहे हैं। भारत देश में अधिकतर लोग खेती करते हैं। उन्हें अन्नदाता कहते हैं। हालांकि सूखा भी उनकी जमीन पर आए दिन होता है और बाढ़ भी आती है।

वहीं कर्ज के फांस भी उनके गले में लगातर कसती रहती है, लेकिन अन्न वह फिर भी बोता है जिससे दुनिया की भूख सम्पात हो जाए। देश के किसान के लिए पानी की किल्ल्त सबसे बड़ी समस्या है। सुरक्षा के साथ पौधों को बचाने का नायाब तरीका एक शिक्षक ने ईजाद किया है।

राजाबासा गांव (Rajabasa Village Jharkhand) में एक शिक्षक (Teacher) ने बेकार हो चुके हजारों पानी की बोतलों को काट कर उसे टपक विधि से पौधों में पानी देने का एक तरीका खोज निकाला है। इससे पौधे को हर समय जरूरत के हिसाब से पानी मिलता रहता है। इसका फायदा भी दिखाई देने लगा है। लगातार पानी मिलने से पौधे तेजी से बढ़ भी रहे हैं। वर्तमान दौर में पर्यावरण असंतुलन तेज़ी से बढ़ रहा है।

ऐसे में छोटे-छोटे प्रयासों से कम इसे बचा सकते हैं। इस संबंध में शिक्षक तरुण ने कहा कि लोग पानी पीने के बाद बोतल फेंक देते हैं। जगह-जगह बोतल फेंका हुआ दिखाई देता है। प्लास्टिक का बोतल (Plastic Bottles) जल्दी गलता भी नहीं है, साथ ही यह जमीन को बेकार भी बना देता है।

भारत किसानों का देश है और अभी भी लोगों के प्राथमिक आय खेती से ही होती है। मगर ज़्यादातर जगहों पर कम बारिश का होना और काफ़ी पुरानी तकनीक के उपयोग से किसान को उसकी मेहनत का फल नहीं मिल पाता। ज्यादातर किसानों (Farmers) को उपलब्धता की कमी के चलते नुक्सान झेलना पड़ता है।

कुछ ऐसा ही मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के आदिवासी (Jhabua) बहुल जिले झाबुआ में हुआ था। पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र में खेती करना कठिन था। यहां मिट्टी की सतह और मुख्यतः बारिश के पानी पर आधारित खेती के चलते फसल उसके मुकाबले कम होती थी। रमेश बारिया नाम के एक किसान इससे निराश थे और इन चुनौतियों के बीच बेहतर पैदावार के साथ खेती करने की इच्छा रखते थे।

कभी पानी हो तो सिंचाई करने के साधन नहीं जुट पाते हैं। वैसे तो सरकार ड्रिप-इरीगेशन सिस्टम लगवाने के लिए किसानों को सब्सिडी भी दे रही हैं। लेकिन अगर आप कम जगह में खेती या बागवानी कर रहे हैं तो आप खुद अपने घर के लिए प्लास्टिक की बोतलों से ड्रिप-इरीगेशन सिस्टम बना सकते हैं। इसमें ज्यादा कोई लागत भी नहीं लगेगी लेकिन आप इससे बहुत ज्यादा मात्रा में पानी बचा पाएंगे।

प्लास्टिक बना फायदेमंद

प्लास्टिक का बोतल जल्दी गलता भी नहीं है। यह पर्यावरण को नुकसान नही पहुंचाता है। तरुण ने कहा इस पर हमने एक प्‍लान बनाया। इसमें बेकार प्लास्टिक की बोतलों को जमा किए। उन बोतलों के पेंदा को काटकर थोड़ा छोड़ दिया। इसके बाद उसे उलटा कर ढ़क्कन को थोड़ा खोल दिए।

इससे पानी बहुत कम मात्रा में लगातार टपक कर गिरती है। टीचर तरुण गोगोई कहते हैं, लोग पानी पीने के बाद बोतल फेंक देते हैं। प्लास्टिक का बोतल जल्दी गलता भी नहीं है। जमीन को बेकार भी बनाता है। इसका उपयोग कर हम कम लागत में अच्छी सिचाई कर सकते है।

बोतलें लगाने का तरीका

ग्लूकोज की बोतलें पहले तो उन्होंने 20 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से खरीदी। उसके बाद ऊपरी आधे हिस्से को एक इनलेट बनाने के लिए काटा। इसके बाद पौधों के पास उन्हें फिर लटका दिया। पानी का प्रवाह बूंद-बूंद से इन बोतलों के जरिए पौधों में आता है।

पर्यावरण असंतुलन की सबसे बड़ी समस्या

पर्यावरण असंतुलन की सबसे बड़ी समस्या ग्लोबल वॉर्मिंग भी है। प्लास्टिक की तरफ ध्यान देना और पेड़ों को भूल जाना यह इसका एक मुख्य कारण है। लेकिन तरुण बताते हैं कि उनके जुगत से एक बोतल में पानी सुबह में डालने पर वह दिन भर एक-एक बूंद के हिसाब से गिरता रहता है। किसी पौधे के सामने एक लकड़ी गाड़ कर उसमें बोतल को बांध देते हैं। बोतल से पानी लगातार उस पौधा को दिन भर मिलता रहता है। साथ ही पानी की बर्बादी भी नहीं होती है।

पर्यावरण को बिगाड़ा भी हमने है और सुधारना भी हमें

पर्यावरण को बिगाड़ा भी हमने है और सुधारना भी हमें है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और मानव जीवन के कदम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में अगर हमने पर्यावरण को बचाने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

प्लास्टिक की बोतल के फायदे

मानसून में हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इस मौसम में इनमें कीड़े लगने का खतरा बढ़ जाता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं है। इसलिए कुछ लोगो हरी सब्जियां खाने या खरीदने से बचते हैं लेकिन उन्हें हरी सब्जियां खाना बहुत पसंद होता है। बहुत-से लोग कीड़ों के डर से हरी प्याज, पालक, फूल गोभी आदि सब्जियां बिल्कुल भी नहीं खाते हैं।

अगर आप हरी प्याज खाना चाहते हैं और वह ताज़ी आपको मिल नहीं रही है,तो आप घबराएं नहीं क्योंकि आप घर पर ही हरी प्याज आसानी से लगाकर उसे इस्तेमाल कर सकते हैं। साथ ही, आपके घर में सब्जियों के गार्डनिंग के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, तो आप प्लास्टिक की बोतल में भी प्याज उगा सकते हैं।

पौधा लगाने की विधि

हरे प्याज की कटिंग या बीज को प्लास्टिक की बोतल में लगानेके लिए सबसे पहले बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची की मदद से काट लें और फिर इसमें प्याज के आकर के हिसाब से 3 इंच की दूरी पर बराबर छेद कर लें।अब आप 50% कोको-पीट और 50% वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद या गोबर) लें और दोनों को अच्छी तरह से मिला लें।

फिर छेद तक मिट्टी को अच्छी तरह बोतल में भर दें। पॉटिंग मिक्स हो जाने के बाद बीज या हरे प्याज की कटिंग लें और लगाना शुरू करें। कटिंग या बीज लगाते समय ध्यान रहे कि जब वे पनपना शुरू करें, तो उनकी पत्तियां छेद से बाहर निकलें।हर छेद में कटिंग या बीज बोने के बाद, अब बारी आती है पौधे में पानी डालने की। तो अब आप उचित मात्रा में बोतल में अच्छी तरह से पानी डाल दें। अब आपका पौधा पूरी तरह से तैयार है।

टिप्स (Important Tips)

हरी प्याज का पौधा लगाने के लिए बड़ी प्लास्टिक की बोतल का चुनाव करें।बोतल के तमाम छेदों में नियमित रूप से प्याज की कटिंग लगाएं।बोतल में लगे कटिंग या बीज को आप लगभग 20 दिनों के बाद चेक कर सकती हैं। साथ ही, अगर आपकी कटिंग पूरी तरह से अंकुरित (फैलाव आना) हो गई है, तो समझ लीजिए आपका पौधा सही उगा है।

ध्यान रहे कि पौधे पर सीधी धूप पड़े क्योंकि इस पौधे को धूप की जरूरत होती है। इस पौधे की थोड़ी ग्रोथ लगभग 20 से 25 दिनों के बाद होना शुरू होगी। जब हरे पत्ते दिखने शुरू हो जाएं, तो आप 3 सेंटीमीटर की लम्बाई तक इन्हें काट सकते हैं।पौधे को रोपने के समय फास्फोरस, नाइट्रोजन और पोटाश को मिट्टी में गोबर की खाद के साथ इस्तेमाल करें।

4 महीने के बाद आप पौधे की नियमित रूप से कटाई कर सकते हैं। पौधे में किसी भी तरह की कीटनाशक या रासायनिक युक्त खाद का सीधा इस्तेमाल ना करें। अगर आप पौधे में कीड़ों को लगने से रोकना चाहते हैं, तो नीम के तेल को पानी में घोलकर इसका स्प्रे बनाकर इस्तेमाल करें।

गांव के दूसरे किसानों ने भी अपनाई ये टेक्नोलॉजी

इस तकनीक से उन्होंने पानी बचाने के साथ-साथ पौधों को सुखाने से भी बचाया। इसके अलावा वेस्ट ग्लूकोज की बोतल प्लास्टिक का उपयोग करने के लिए डाल दिया वरना इन बोतलों को हमेशा कचरे के डिब्बे में ही फेंका जाता है। बता दें इसे जल्द ही गांव के अन्य किसानों ने भी अपनाया। इस काम प्रोत्साहित करते हुए रमेश बारिया को ज़िला प्रशासन और मध्य प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री की सराहना के प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया।

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