
Ahmedabad: अगर सही आईडिया हो और उसे सही दिखा पर मोड़ा जाए, तो एक बहुत अच्छा व्यापार बन जाता है और कमाई का बेहतरीन साधन बन जाता है। एक व्यापार पुरानी चीज़ो का भी किया जाता है। जिसे कबाड़ का व्यापार कहा जाता है। आप अपने घर की पुरानी चीजों का क्या करते हैं, जनक देते होंगे।
आपकी बाइक और गाड़ियों के टायर खराब हो जाते या बहुत पुराने हो जाते हैं, तो उसे बिना काम का समझकर फेंक देते हैं या फिर कबाड़ वाले भैया को चंद पैसों में दे देते हैं। इसके उलट महाराष्ट्र के अहमदनगर में रहने वाले प्रमोद सुसरे इन चीज़ो को जमा कर लेते हैं।
वे खुद के घर के अलावा दूसरों की पुरानी चीजों को भी जमा कर लेते और इससे इको फ्रेंडली फर्नीचर और होम डेकोरेशन के सामन बनाते हैं। जिसकी डिजाइनिंग और सुंदरता को देखकर आप हैरान रह जाएंगे। देशभर में उनके प्रोडक्ट की डिमांड है। भारत के बाहर विदेशों में भी उन्होंने अपने प्रोडक्ट भेजे हैं। इससे हर महीने वे 5 से 6 लाख रुपए का बिजनेस भी कर रहे हैं।
गुजरात (Gujarat) के अहमदनगर (Ahmedabad) में रहने वाले 28 वर्षीय प्रमोद सुसरे (Pramod Susare) ने अपने इस आईडिया के बल पर अच्छी नौकरी छोड़कर रीसाइकल्ड फर्नीचर (Recycled Furniture) बनाने का काम आरम्भ किया। पहले तो लोगों ने उनका मज़ाक भी बनाया, लेकिन आज वह अपने इसी स्टार्टअप (Startup) से लांखो रुपया कमा रहे हैं।
मतलब दूसरे के बिना काम का सामन इनके काम का सामान हो जाता है। अहमदनगर के प्रमोद सुसरे का स्टार्टअप बेकार सामान को काम का सामान बनाने का काम कर रहा है। वह इंडस्ट्रियल वेस्ट को अपसाइकल करके, गार्डन, कैफ़े और होटल्स के लिए बेहद अनोखे फर्नीचर (Good Furniture) बनाने का काम कर रहे हैं।
बता दे की उन्होंने वर्ष 2018 में अपनी जॉब (Job) करते हुए इस तरह के फर्नीचर (Furniture) बनाना शुरू किया। लगन और मेहनत के दम पर, उन्हें ऑर्डर्स भी मिलने लगे और केवल तीन साल में उन्होंने एक करोड़ से ज्यादा का प्रॉफिट कमाया। आज वह अपने साथ, 15 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। बीच में महामारी के समय ऑर्डर्स नहीं मिल रहे थे, तब उन्होंने अपने पास उपलब्ध सामान से सैनिटाइजर डिस्पेंसर मशीन, कोविड हॉस्पिटल्स के लिए बेड आदि बनाने का काम भी किया।
उन्होंने अहमदनगर से ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद फिर वह, पुणे की एक कंपनी में मेंटेनेंस इंजीनियर का काम करने लगे। उनके परिवार ने उन्हें पढ़ा लिखाकर नौकरी की सलाह दी और उन्होंने नौकरी करना शुरू कर दिया। बिज़नेस आईडियाज़ यो दिमाग में बहुत थे, परन्तु उनके पास काम शुरू करने के लिए पैसे नहीं थे।
एक मीडिया अख़बार को वे बताते है की जब मैं फैक्ट्री में काम करता था, तो मेंटेनेंस इंजीनियर होते हुए भी, मैं वेल्डिंग और फिक्सिंग जैसे सभी काम करता था। वही मेरा अनुभव आज मेरे इस काम काम आ रहा है। प्रमोद अख़बार को बताते हैं, एक बार सोशल मीडिया पर उन्होंने देखा कि जापान में ड्रम और टायर का इस्तेमाल करके बेहद सुंदर फर्नीचर बनाए जा रहे हैं।
एक दिन जब वह अपनी पंक्चर बाइक ठीक करवाने टायर की दुकान पर गए, तो वहां उन्हे टायर के बारे में भी ऐसा ही कुछ पता चला। वे लोग टायर को 7 रुपये प्रति किलो की कीमत पर कबाड़ में दे देते थे। प्रमोद ने कुछ टायर और ड्रम्स बड़े ही सस्ते दाम पर खरीदे और सेकंड हैंड दुकान से ड्रिल मशीन सहित जरूरत की बाकी चीजें लाकर काम करना शुरू किया।
वह ऑफिस से आकर हर दिन चार पांच घंटे फर्नीचर बनाने का काम करने लगे। वह बताते हैं, मेरे पास कई फर्नीचर बनकर तैयार थे, जिसे खरीदने वाला कोई नहीं था। तो मैंने आस-पास के जूस सेंटर में उसे रख दिया और उनके मालिक को अपना नंबर भी बता दिया ताकि जिसे जरूरत हो फ़ोन पर पूछ सके।
काम लोगो को पसंद आया तो कुछ ऑर्डर्स मिलने शुरू हो गए। जिन्हें वह ऑफिस के बाद शाम को बनाया करते थे। उन्होंने एक छोटी सी जगह भी किराए पर ले ली, जिसमें वह काम कर सकें। फिर एक साल तक वह ऐसे ही काम करते रहे और अक्टूबर 2019 में उन्हें पुणे के एक कैफ़े के लिए फर्नीचर बनाने का आर्डर मिला। वह एक बड़ा ऑर्डर था।
जिसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर स्टार्टअप पर काम करना शुरू किया। उन्होंने अपनी मदद के लिए दो लोगों को रखा और ‘P2S International Furniture World’ नाम से अपनी कंपनी भी रजिस्टर करवा ली। हैरानी की बात यह है की उन्होंने घरवालों को एक साल तक अपने इस स्टार्टअप के बारे में नहीं बताया था।
P2S International Furniture World Products are Awesome & Unique pic.twitter.com/QZEwwa7O8j
— sanatanpath (@sanatanpath) August 21, 2021
फिर कोरोना में जब उन्हें काम बंद करके घर जाना पड़ा, तब उन्होंने घर में बताया। फिर कुछ ही दिनों बाद मई महीने में सैनिटाइजर डिस्पेंसर मशीन बनाने का काम शुरू कर दिया। इसके लिए पाइप्स लाने पड़े और वेल्डिंग करके कई मशीनें बनाई और अच्छा प्रॉफिट कमाया। यह काम भी चल निकला।
कुछ समय बाद उन्हें अहमदाबाद, मुंबई, पुणे से फर्नीचर बनाने का काम मिलने लगा। उन्होंने कोविड सेंटर के लिए बेड बनाने का काम भी किया। उनके सामान बिकते रहे और ऑर्डर्स आते रहे। फिर उन्हें साउथ अफ्रीका से भी ऑर्डर मिला। अभी उनका काम बहुत अच्छा चल रहा है और अच्छी कमाई हो रही है।



