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Mathura: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में कृष्ण भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। यह मंदिर खुद में बहुत रोचक रहस्य समेटे हुए है। उन्हीं में से से एक है, मूर्तियों के भीतर मौजूद ब्रह्म पदार्थ, इसे ही कृष्ण के हृदय अंश से जोडक़र देखा जाता है।
मान्यता है कि जब कृष्ण का अंतिम संस्कार हुआ तो सारा शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन दिल सामान्य इंसान की तरह आज भी धड़कता है और यह आज भी जगन्नाथ की काठ मूर्ति में है, जो कालांतर में ब्रह्म पदार्थ कहा गया है।
द्वारका नगरी का रहस्य
द्वारका Dwarka भारत के गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर और नगरपालिका है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है। द्वारका गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है। यह हिन्दुओं के चारधाम में से एक है और सप्तपुरी (सबसे पवित्र प्राचीन नगर) में से भी एक है। यह श्रीकृष्ण के प्राचीन राज्य द्वारका का स्थल है और गुजरात की सर्वप्रथम राजधानी माना जाता है।
द्वारिकाधीश मंदिर का रहस्य
द्वारिकाधीश मंदिर, भी जगत मंदिर के रूप में जाना और कभी कभी वर्तनी द्वारिकाधीश, एक है हिंदू मंदिर भगवान के लिए समर्पित कृष्णा, जो नाम द्वारिकाधीश या ‘द्वारका के राजा’ द्वारा यहां पूजा की जाती है। मंदिर भारत के गुजरात के द्वारका में स्थित है। 72 स्तंभों द्वारा समर्थित 5 मंजिला इमारत का मुख्य मंदिर, जगत मंदिर या निज मंदिर के रूप में जाना जाता है, पुरातात्विक की जानकारी के मुताबिक यह 2300- 2500 साल पुराना है।
15वीं-16वीं शताब्दी में मंदिर का विस्तार किया गया। द्वारकाधीश मंदिर एक पुष्टिमार्ग मंदिर है, इसलिए द्वारका एक अति-महत्वपूर्ण हिन्दू तीर्थस्थल है। यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है।
जिले का नाम द्वारका पुरी से रखा गया है, जिसकी रचना 2013 में की गई थी। यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। द्वारका भारत के सात सबसे प्राचीन शहरों में से एक है।
धुनिक द्वारका एक शहर है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है। काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है।
2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान स्टार्ट किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी सहयता की।अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए, लेकिन आज तक यह निश्चय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था।
आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में व्यस्त हैं। कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, पर राज उन्होने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया।
द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की उनका परामर्श लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।
मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1963 में सबसे पहले द्वारका नगरी का ऐस्कवेशन डेक्कन कॉलेज पुणे, डिपार्टमेंट ऑफ़ आर्कियोलॉजी और गुजरात सरकार ने मिलकर किया था। इस दौरान करीब 3 हजार साल प्राचीन बर्तन मिले थे। इसके तकरीबन एक दशक बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया कि अंडर वॉटर आर्कियोलॉजी विंग को समंदर में कुछ ताम्बे के सिक्के और ग्रेनाइट स्ट्रक्चर भी मिले।
मथुरा (Mathura) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक नगर है। मथुरा ऐतिहासिक रूप से कुषाण राजवंश द्वारा राजधानी के रूप में विकसित नगर है। उससे पूर्व भगवान कृष्ण के समय काल से भी पूर्व अर्थात लगभग 7500 वर्ष से यह नगर अस्तित्व में है। यह धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। दूर डर से लोग यही की मनमोहन छवि को अपने अंदर समाहित करने आते है।
मथुरा भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का केंद्र रहा है। भारतीय धर्म, दर्शन कला एवं साहित्य के निर्माण तथा विकास में मथुरा का महत्त्वपूर्ण योगदान सदा से रहा है। आज भी महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी विरजानंद, चैतन्य महाप्रभु आदि से इस नगरी का नाम जुड़ा हुआ है। मथुरा को श्रीकृष्ण जन्म भूमि के नाम से भी जाना जाता है।
हिंदू धर्म के हिसाब से चार धाम बदरीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम और पुरी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु जब चारों धाम पर बसे तो सबसे पहले बदरीनाथ गए और वहां स्नान किया, इसके बाद वो गुजरात के द्वारिका गए और वहां कपड़े बदले। द्वारिका के बाद ओडिशा के पुरी में उन्होंने भोजन किया और अंत में तमिलनाडु के रामेश्वरम में विश्राम किया। पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ का मंदिर है।
पुरी के इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बालभद्र और बहन सुभद्रा की काठ (लकड़ी) की मूर्तियां हैं। लकड़ी की मूर्तियों वाला ये देश का अनोखा मंदिर है। जगन्नाथ मंदिर की ऐसी तमाम विशेषताएं हैं, साथ ही मंदिर से जुड़ी ऐसी कई कहानियां हैं जो सदियों से रहस्य बनी हुई हैं।
मंदिर से जुड़ी एक मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया और उनका अंतिम संस्कार किया गया तो शरीर के एक हिस्से को छोड़कर उनकी पूरी देह पंचतत्व में विलीन हो गई। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का हृदय एक जिंदा इंसान की तरह ही धड़कता रहा। कहते हैं कि वो दिल आज भी सुरक्षित है और भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति के अंदर है।
हर 12 साल में बदली जाती हैं प्रतिमा
जगन्नाथ पुरी मंदिर की तीनों मूर्तियां हर 12 साल में बदली जाती हैं। पुरानी प्रतिमाओं की जगह नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। प्रतिमा बदलने की इस प्रक्रिया से जुड़ा भी एक रोचक किस्सा है। जिस वक्त मूर्तियां बदली जाती हैं तो पूरे शहर में बिजली काट दी जाती है। मंदिर के आसपास पूरी तरह अंधेरा कर दिया जाता है।
मंदिर के बाहर सीआरपीएफ की सुरक्षा तैनात कर दी जाती है। मंदिर में किसी की भी एंट्री पर रोक लगी होती है। सिर्फ उसी पुजारी को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत होती है जिन्हें मूर्तियां बदलनी होती हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण धरती पर अनेक स्वरूपों में विराजमान है। ऐसा ही एक अदभुत और जगतविख्यात स्वरूप भगवान जगन्नाथ का है।
जगन्नाथ पुरी में अनेकों रहस्य समाए हुए हैं। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की धरती की अनेकों जगह साक्षी रही हैं। इन सभी स्थानों को कलयुग में तीर्थ की मान्यता दी गई है और इन स्थानों की यात्रा कर भक्त अपने आपको खुशमय प्रतीत करते है। ऐसा ही एक जगत विख्यात तीर्थ जगन्नाथ पुरी है। मान्यता है कि इस जगह पर यदुकुल श्रेष्ठ श्रीकृष्ण का दिल रखा हुआ है।
पुरातन समय में स्थापित किया गया श्रीकृष्ण का दिल अभी भी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में स्थापित है। इस पिंड को आज तक किसी भी व्यक्ति ने नहीं देखा है। नवकलेवर के अवसर पर जब 12 या 19 साल में प्रतिमाओं को बदला जाता है, उस वक्त पुजारी की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथों को कपड़े से ढक दिया जाता है।
इसलिए मंदिर के पुजारी ना तो उस लट्ठे को देख पाते हैं और न ही छूकर उसको महसूस कर पाते हैं। बस उनको इतना अहसास होता है कि दिल रूपी लट्ठा काफी नर्म होता है। मान्यता है कि इस पिंड को देखने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है इसलिए इस पिंड को देखने की कोशिश आजतक किसी ने नहीं की है और प्राचीन समय से स्थापित परंपराओं और विधि-विधानों का पालन इस मंदिर में किया जाता है।



