
Bhuj: 1971 में जब भारत-पाक के बीच भयंकर जंग चल रही थी। तब 300 महिलाओं की एक टोली ने ऐसा काम कर दिखाया जिसने ना सिर्फ युद्ध में भारतीय सैनिकों की हेल्प हुई बल्कि वो आने वाली पीढ़ी के लिए प्ररेणा से कम सावित नही हुई।
अजय देवगन की फ़िल्म भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया जब रिलीज हुई तो इसकी विषयवस्तु बहुत दिलचस्प लगी थी। माधापुर गांव की 300 महिलाओं ने अपनी जान जोखिम में डालकर पाकिस्तानी हवाई हमले में तबाह हुई हवाई पट्टी की 72 घंटों में मरम्मत की थी, ताकि भारतीय जवानों को लाने वाले विमान को वहां सफलता पूर्वक उतारा जा सके।
सिर पर निरंतर मंडराते पाकिस्तानी जंगी जहाजों
सिर पर निरंतर मंडराते पाकिस्तानी जंगी जहाजों के ख़तरे के बावजूद साधारण ग्रामीण महिलाओं की दिलेरी की इस कहानी को पर्दे पर देखने का एक अलग ही दिलचस्प पहलू था और लगा था कि एक शानदार फ़िल्म देखने को मिलेगी, जिसमें युद्धकाल में सामान्य नागरिक की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित किया गया है।
मगर, जिस ऐतिहासिक घटना पर भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया की पूरी कहानी ओर उसकी दुनिया टिकी हुई थी, उसे ही फ़िल्म में इतने आसानी से निपटा दिया गया और फ़िल्म की टाइमलाइन को 1971 में हुई भारत-पाकिस्तान की जंग के बाकी क़िस्सों से भर दिया गया।
भारत-पाक युद्ध और इससे जुड़ी तमाम जानकारियां को बांधने के चक्कर में फ़िल्म मुख्य कथानक के साथ न्याय नहीं कर पाईं। लेखक-निर्देशक और कलाकारों ने पूरी तरह एक ख़ास जज़्बात से खेलने की कोशिश की है, मगर इस क्रम में वो दर्शक की भावनाओं से खेल गए हैं। देशभक्ति की बयार में आप सिर्फ़ भारी-भरकम संवादों से काम चलाने का सोचेंगे तो मामला ज्यादा देर तक जमेगा नहीं।
1971 में हुआ भारत-पाकिस्तान युद्ध कई मुकामो में अहम रहा था। एक तो इस युद्ध के बाद बांग्लादेश दुनिया के सामने जन्म लिया था। दूसरा यह कि जंग अनेक मोर्चों पर लड़ी गयी थी और सेना के तीनों थल सेना, वायु सेना और नौ सेना की इसमें अहम भूमिका रही। हिंदी फ़िल्मकार (Hindi Film Maker) समय-समय पर इस युद्ध के विभिन्न घटनाक्रमों को पर्दे पर उतारते रहे हैं।
ज़मीन पर लड़ी गयी लॉन्गेवाला की जंग पर जेपी दत्ता 1997 में बॉर्डर जैसी आइकॉनिक फ़िल्म पहले ही बना चुके हैं। पानी में जंग पर 2017 में संकल्प रेड्डी ग़ाज़ी नाम से फ़िल्म बना चुके हैं, जिसे हिंदी में द ग़ाज़ी अटैक शीर्षक से पर्दे पर रिलीज़ किया था।
अब निर्देशक अभिषेक दुधैया की भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया (Bhuj: The Pride of India) को आकाश में हुई जंग पर बनी फ़िल्म (Movie) के रूप में देखा जा रहा था, क्योंकि 1971 जंग की शुरुआत पाकिस्तान के ऑपरेशन चंगेज़ ख़ान से ही हुई थी, जिसमें भारत के 11 प्रमुख एयर बेसों पर पाकिस्तान की ओर से एयर स्ट्राइक की गयी थी।
युद्ध के दौरान आम नागरिक की इतने व्यापक स्तर पर सहभागिता मिलती हैं। निर्देशक अभिषेक दुधैया, जो फ़िल्म की लेखन टीम का भी हिस्सा हैं, इस घटना को उस तरह उभारने में कामयाब नहीं हो पाए, जिसकी उम्मीद फ़िल्म की रिलीज़ से पहले की जा रही थी। स्क्रीन-प्ले में सबसे कम वक़्त इस घटनाक्रम को ही दिया गया है। बस सोनाक्षी सिन्हा के किरदार के ज़रिए इस घटना का प्रतिनिधित्व करवा दिया गया है।
फ़िल्म में संजय दत्त आर्मी स्काउट रणछोड़ दास पगी के रोल में हैं, जो रेत में पांव के निशान देखकर भांप लेता है कि उधर से हिंदुस्तान की फौज गयी है या पाकिस्तान की फौज। फ़िल्म में संजय दत्त की मौजूदगी को जस्टिफाई करने के लिए उनके किरदार रणछोड़ दास पगी को स्क्रीनप्ले में ज़रूरत से ज़्यादा खींच दिया।
यह किरदार अकेला ही दर्ज़नों पाकिस्तानी सैनिकों को कुल्हाड़ी से काट डालता है, जबकि ले. कर्नल नायर लड़ते-लड़ते शहीद हो जाते हैं। हालांकि, इसमें कोई शक़ नहीं कि पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 की लड़ाइयों में उल्लेखनीय भूमिका रही थी और इसके लिए उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाज़ा गया था। उनकी जुटाई सूचनाओं ने भारतीय फौजको जीतने में काफ़ी मदद की थी।
नोरा फतेही भारतीय जासूस हीना रहमान के किरदार में हैं, जिसकी शादी पाकिस्तान की आर्मी इंटेलीजेंस के मुखिया से होती है। नोरा का भाई भी भारतीय जासूस होता है, जिसे पकड़े जाने पर पाकिस्तानी फौज ने बेहरमी से पथरो से मार डाला था। इसलिए पाकिस्तान से जंग नोरा के लिए निजी और देश के लिए दोनों होती है।
नोरा फतेही का ट्रैक दिलचस्प है, मगर अति नाटकीय लगता है। नोरा के एक्सप्रेशन उनके भारी-भरकम संवादों से मेल नहीं खाते। उनकी अदाकारी का अंदाज़ मशीनी है। समझ नहीं आता कि हर किरदार का इंट्रोडक्शन इतना ओवर द टॉप करने की ज़रूरत क्या थी। क्या हम अपनी फ़िल्मों में लाउड हुए बिना अपनी देशभक्ति का इज़हार नहीं कर पा सकते? या करना इतना ही ज़रूरी है तो कम से कम कलाकार तो ऐसा लीजिए, जो उस किरदार को पूरी तरह कर सके।
माधापुर गांव बनाने में प्रोडक्शन ने इतना अच्छा काम किया है कि सब नकली लगने लगता है। सारे गांव वाले हर वक़्त एकदम चकाचक और चमकदार पारम्परिक परिधानों में सुसज्जित नज़र आते हैं, जैसे कोई त्योहार मना रहे हों। सोनाक्षी सिन्हा का किरदार कच्छी है, मगर उसके उच्चारण में स्थानीयता का कोई पुट नहीं। उन्हें लगता है, सिर्फ़ ‘देश’ को ‘देस’ बोलने से स्थानीय लहज़ा मिल जाता है। वही हाल संजय दत्त के किरदार रणछोड़ का भी है।
सिख फ्लाइंग लेफ्टिनेंट बने एमी विर्क ज़रूर अपने लहज़े को पकड़कर रखते हैं, जो उनकी अपनी मातृ भाषा भी है। प्रणिता सुभाष, विजय कार्णिक की पत्नी ऊषा कार्णिक के किरदार में हैं। फ़िल्म में प्रणिता का एक गाने और कुछ फ्रेम्स में आने के अलावा कोई योगदान नहीं है। प्रणिता इससे पहले हंगामा में नज़र आयी थीं। हालांकि, उनकी पहली साइन हिंदी फ़िल्म भुज ही है और महामारी ना होती तो यह उनका डेब्यू होता।
भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया लेखन के साथ तकनीकी रूप से प्रभावित नहीं करती। आसमान में जेटों की लड़ाई के कुछ शुरुआती दृश्य ज़रूर ध्यान खींचते हैं, मगर बाक़ी फ़िल्म का ख़राब वीएफएक्स ने कबाड़ा कर दिया है, जिसकी वजह से कई बेहतरीन हो सकने वाले दृश्य कमज़ोर लगते हैं। दर्शक जानता है कि फ़िल्मों में बहुत सी चीज़ों के लिए अब वीएफएक्स का इस्तेमाल किया जाता है।
दर्शक जब वो फ़िल्म देखता है तो यह उम्मीद करता है कि वो वीएफएक्स ना लगे, बिल्कुल असली लगे और इसी में निर्देशक और तकनीकी टीम की जीत होती है। सोनाक्षी सिन्हा अपने किरदार के परिचय दृश्य में जिस तेंदुए को दरांती से मारती है, उसे वीएफएक्स से बनाया गया है, जो साफ़ पता लग जाता है। फ़िल्म के अंत की ओर युद्ध का एक दृश्य तो इतना बेकार लगता है कि उस गंभीर दृश्य को देखते हुए भी हंसी निकल जाती है।
अजय देवगन जैसे बेहतरीन और हर तरह से सक्षम कलाकार जब ऐसे विषय फिल्म बनाने में चुनाव करते हैं तो उम्मीद की जाती है कि वो ऐसा सिनेमा बनाएंगे, जो भारतीय फ़िल्म इतिहास में दर्ज़ हो कर एक झाप झोड़ेगी। ख़ासकर तब, जबकि फ़िल्म 1971 में हुए युद्ध के 50 साल पूरे होने का जश्न मनाने का दावा कर रही हो।
वैसे, इस सबकी सफ़ाई फ़िल्म शुरू होने से पहले शरद केल्कर की अपनी आवाज़ में बताने का कस्ट जरूर करते हैं, एक डिस्क्लेमर में दे दी गयी है। उसमें साफ़ बता दिया जाता है कि यह फ़िल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और कुछ दृश्यों को फ़िल्माने में सिनेमाई तकनीकी ली गयी है। फ़िल्म सभी के नज़रिए का सम्मान करती है। भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर करने को कुछ नहीं बचा है और डिज़्नी प्लस हॉटस्टार का ऐप फ्री है तो भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया देख सकते हैं।



