
Jabalpur: पौराणिक कथाओं में माता-पिता के अनन्य भक्त श्रवण कुमार की कहानी (Shravan Kumar) आप ने कई बार सुनी होगी। श्रवण कुमार माता-पिता को तीर्थ कराने के लिए एक पालकी में दोनों को बैठाकर तीरथ दर्शन के लिए निकल पड़े थे। कलयुग में भी एक ऐसे ही बेटे ने श्रवण कुमार का फर्ज निभाया।
सागर के संत करीब वार्ड में रहने वाले मुरारीलाल कोरी (Murarilal Kori) मां की ट्राइसाइकिल को अपनी साइकिल (Cycle) से जोड़कर रिक्शा (Rickshaw) बना लिया और मां को बिठाकर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। मैहर-चित्रकूट से लौटते समय 80 वर्षीय बुजुर्ग मां प्रेम रानी के साथ छतरपुर नगर से गुजरे।
दिलचस्प यह है कि बेटा मुरारीलाल ने साइकिल से जुगाड़ का रिक्शा (Cycle Rickshaw) बना लिया ताकि मा को कोई परेशानी ना हो। इस रिक्शे में पीछे बुजुर्ग मां बैठी है। यह नजारा वर्तमान की इस पीढ़ी के लिए बहुत प्रेरणास्पद है जो माता-पिता की सेवा करना भूल रहे हैं। मुरारीलाल ने बताया कि वह 3 भाइयों में सबसे छोटा है। दो भाइयों का विवाह हो चुका है और वह अविवाहित है।
मां बुजुर्ग हो चुकी है। उनकी इच्छा थी कि वे मंदिरों में जाकर भगवान के दर्शन करें। इस इच्छा को पूरा करने के लिए पेशे से मजदूर मुरारीलाल के पास पर्याप्त पैसे नहीं थे इसलिए उसने अपनी ही साइकिल के पीछे एक कबाड़ी से खरीदे गए दिव्यांगों की ट्राई साइकिल के पिछले हिस्से को बेल्डिंग के जरिए जोड़ लिया और मां को इसी रिक्शे में बैठाकर 23 दिन पहले घर से निकले थे।
अबार माता मंदिर से शुरूआत
मुरारी ने बताया कि वह सबसे पहले अबार माता मंदिर पहुंचा। इसके बाद मैहर, चित्रकूट होते हुए घर वापस जा रहा था। मुरारी ने बताया कि मां और बेटे अपने साथ खाने-पीने का सामान लेकर चल रहे थे। जहां रात हो जाती थी, वहीं किसी मंदिर, धर्मशाला में रूक जाते थे। अगले दिन सुबह फिर निकल पड़ते थे। खाने-पीने का कुछ सामान राह चलते लोग दे देते थे। बेटे की इस सेवा से मां का हृदय भी द्रवित नजर आया। मां प्रेम रानी ने कहा कि श्रवण कुमार जैसा बेटा पाकर खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं।
आपको बता दे की श्रवण कुमार की कहानी भारत में बहुत फेमस है। श्रवण कुमार एक पौराणिक पात्र हैं, जिन्हें आज भी मातृ-पितृभक्ति के लिए जाना जाता हैं। इतिहास में मातृभक्ति और पितृभक्ति के लिए श्रवण कुमार का नाम अमर हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथ रामायण में श्रवण कुमार का उल्लेख है। श्रवण कुमार के माता-पिता उनके लिए सब कुछ थे। इनके माता-पिता नेत्रहीन थे, इसलिए वो उनकी अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा करते थे।
श्रवण की मां ने उन्हें बहुत कष्ट उठाकर पाला था। श्रवण अपने माता-पिता के कामों में बहुत मदद करते थे। घर का सारा काम जैसे नदी से पानी भरकर लाना, जंगल से लकड़ियां लाना, चूल्हा जलाकर खाना बनाना आदि, श्रवण कुमार ही करते थे। माता-पिता का काम करने में वो जरा भी थकते नहीं थे, बल्कि उन्हें आनंद मिलता था। माता-पिता उन्हें हमेशा आशीर्वाद देते रहते।
श्रवण कुमार का नाम इतिहास में मातृभक्ति और पितृभक्ति के लिए अमर रहेगा। ये कहानी उस समय की है जब महाराज दशरथ अयोध्या पर राज किया करते थे । वाल्मीकि रामायण में अयोधयाकाडं के 64 अध्याय में ईये कथा मिलती है। राधे राधे जी शुभ दोपहर और संध्या मित्रों 🙏 राधे राधे जी 🙏🌹💐🚩 pic.twitter.com/vq306QmNH9
— রণবীর ভট্টাচার্য্য ॐ‼️ब्राह्मण‼️ॐ (@BhattacharyaRa7) September 19, 2019
एक बार उनके अंधे माता-पिता ने इच्छा जताई की उनके बेटे ने उनकी सभी इच्छाएं पूरी की है बस एक इच्छा बाकी रह गई है। उन्होंने तीर्थयात्रा करने की इच्छा जताई। श्रवण कुमार ने माता-पिता की आज्ञा मानते हुए उन्हें प्राण रहते उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दे दिया। कंधे पर कांवर लेकर और उसमें दोनों को बैठाकर वह तीर्थयात्रा करने निकल पड़े। श्रवण अपने माता-पिता को कई तीर्थ स्थानों जैसे गया, काशी, प्रयाग आदि लेकर गए और उन्हें तीर्थ के बारे में सारी बातें सुनाते थे।
श्रवण कुमार ने अपना संपूर्ण जीवन माता और पिता की सेवा-सुश्रुषा में समर्पित कर दिया और मृत्यु पर्यंत उनकी सेवा करते रहे। अपनी इसी मातृ और पितृभक्ति के कारण वह अमर हो गए। श्रवण कुमार का वर्णन वाल्मीकि रामायण के 64 वें अध्याय में मिलता है।



