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Delhi: इंसान को मृत्यु तक पहुंचाने के लिए उसके सीने में धंसी एक ही गो-ली काफी है। मगर ज़रा सोचिए कोई इंसान सीने पर 3 गो-लियां खाने के बाद भी कैसे बहादुरी दिखा सकता है। पौराणिक कथाओं में कई वीरों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मैदान-ए-जंग में सिर धड़ से अलग होने के बाद भी कई दुश्म-नों को हमेशा के लिए सुला दिया।
पौराणिक घटनाओं पर कई लोग विश्वास नहीं कर पाते, लेकिन ‘दिगेन्द्र सिंह कोबरा’ (Digendra Kumar) कोई पौराणिक कथा के पात्र नहीं, बल्कि कारगिल जंग के वो जवान हैं, जिनकी बहादुरी की ज़मीन पर भारत ने जीत का झंडा गाड़ा था। यह कारगिल के वह हीरो हैं, जिनने बारे में हर भारतीय को जानना चाहिए।
15,000 फीट की ऊंचाई पर टोलोलिंग पहाड़ी (Tololing Hill) पर कब्जा करने के 3 असफल प्रयासों के बाद 2 जून 1999 आर्मी चीफ जनरल वीपी मलिक ने राजपूताना रायफल्स का गुमरी में दरबार लिया। 59 सिपाही अपने प्राण न्यौछावर कर चुके थे। मलिक ने राजपूताना राय-फल्स के कमांडर्स से उनकी प्लानिग की जानकारी ली।
आर्मी चीफ को कोई प्लान सही नहीं लग रहा था कि तभी आखिरी लाइन से 30 साल का एक कमांडो उठ खड़ा हुआ सब उसकी तरफ देखने लगे, उसने अपनी हिम्मत और साहस बटोकर कहा, मैं नायक दिगेंद्र कुमार उर्फ कोबरा, इंडियन आर्मी का बेस्ट कमांडो हूं। सर, मेरे पास जीत का एक तरीका है। जनरल ने कहा, बताओ।
कमांडो ने कहा, पहाड़ी बिलकुल सीधी है, हम वही रास्ता लेंगे जो दुश्मन ने लिया है। जनरल आश्चर्य में पड़ गए और कहा, उस रास्ते से बच के आना सम्भव नही है। दिगेंद्र ने जवाब दिया, मरना तो वैसे भी तय है। यह मुझपर छोड़ दीजिए। अपनी बात से पीछे नही हटे, दिल में जो ठान लिया था, तो सीने में कुल 5 गो-लियां खाकर भी दिगेंद्र आगे बढ़ते चले गये।
हिम्मत नही हारी, उनके सभी साथी वीरगति को प्राप्त हो गये थे, लेकिन दिगेंद्र (Digendra Kumar) ने अकेले दम पर दुश्मनों के 11 बंकरों पर 18 ग्रे-नेड फेंककर उन्हें जड़ से उखाड़ फेंका था। यहां तक कि उनके पास खुद की बंदू-क तक नहीं रह गई, तब भी केवल अपनी हिम्मत के दम पर उन्होंने टोलोटिंग पहाड़ी पर भारत का झंडा फहराकर दिखाया, लेकिन तब तक दर्द से वो अपने होश खो बैठे थे।
Brig. Karan S. Rathore (R), Nk Digendra Kumar, Mahavir Chakra, SM (R), Hony.Capt. Nathu Singh (R) & host Mr. Anuj Sharma Expressing gratitude to Indian diaspora at the culmination of Kargil Vijay Diwas virtual event 'Ranbankure' organised by RAUK and Braveheart Soldier Foundation pic.twitter.com/qG4IVzMn8Q
— Braveheart Soldier Foundation (@bhsf_india) July 29, 2020
उनकी आंख सेना के अस्पताल में खुली। 5 गो-लियां लगने के बाद वह सेना के लिए समान्य नहीं रह गए थे। वह संभवत एकलौते ऐसे सैनिक हैं, जिन्हें करगिल युद्ध में महावीर चक्र मिला है। उन्हें इंतजार है तो उस 50 बीघा जमीन का, जिसका वादा सरकार ने उनसे किया था। फिलहाल, वह 2400 रुपये की पेंशन और पिता से मिली एक हेक्टेयर जमीन से अपने परिवार का गुजारा चला रहे हैं।
कौन है महावीर चक्र से सम्मानित
बहादुर बालक दिगेन्द्र का जन्म राजस्थान के सीकर जिले की नीम का थाना तहसील के गाँव झालरा में शिवदान सिंह परसवाल के घर श्रीमती राजकौर से जन्मे। वे स्वयं भी क्रांतिकारी परिवार की संतान थीं। राजकौर के पिता बुजन शेरावत स्वतंत्रता सेनानी थे। नायक दिगेन्द्र कुमार (परस्वाल) 3 जुलाई 1969 में हुआ था। महावीर चक्र विजेता, भारतीय सेना की 2 राज राइफल्स में थे।
उन्होंने कारगिल जंग के समय जम्मू कश्मीर में तोलोलिंग पहाड़ी की बर्फीली चोटी को मुक्त करवाकर 13 जून 1999 की सुबह चार बजे तिरंगा लहराते हुए भारत को प्रथम सफलता दिलाई जिसके लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1999 को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे हरियाणा प्रान्त में महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील में सिरोही भाली गाँव के रहने वाले थे।
बुजन शेरावत सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के सिपाही थे जो द्वितीय विश्वजंग के दौरान बसरा-बगदाद की लडाई में वीरगति को प्राप्त हुए। दिगेंद्र के पिता शिवदान आर्य समाज के मेम्बर थे। देश की स्वतंत्रता एवं जनजागृति के लिए गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क करते थे। वे भजनोपदेशक भी थे। रहबरे आजम दीनबंधु सर छोटूराम के आव्हान पर वे रेवाडी में जाकर सेना में भरती हो गए।
1948 में पाकिस्तान के साथ जंग में पीर बडेसर की पहाड़ी पर साँस की नाली में ताम्बे की गो-लियाँ घुस गई जो जीते जी वापिस नहीं निकलवाईं। उनके जबड़े में 11 गो-लियां लगी थीं। पिता की प्रेरणा से दिगेंद्र 2 राज राइफल्स में भरती हो गए। सेना में वह हर गतिविधि चाहे दौड़ हो, निशानेबाजी हो, या कोई अन्य कार्य हमेसा प्रथम रहे, तथा उनको भारतीय सेना के सर्वश्रेष्ठ कमांडो के रूप में ख्याति मिली।
कारगिल जंग में संघर्ष
कारगिल जंग में सबसे महत्वपूर्ण काम तोलोलिंग की चोटी पर कब्जा करना था। 2 राजपुताना राइफल्स को यह काम सौंपा गया। जनरल मलिक ने अपनी टुकड़ी से तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने की प्लानिग के विषय में बात की। दिगेंद्र ने 100 मीटर का रूसी रस्सा चाहिये जिसका वजन 6 किलो होता है और 10 टन वजन झेल सकता है तथा इसके साथ रूसी कीलों की माँग की जो चट्टानों में आसानी से ठोकी जा सकती थीं।
रास्ता विकट और दुर्गम था पर दिगेंद्र कुमार द्वारा दूरबीन से अच्छी तरह जाँचा परखा हुआ था। दिगेंद्र उर्फ़ कोबरा 10 जून 1999 की शाम अपने साथी और सैन्य साज सामान के साथ आगे बढे। कीलें ठोकते गए और रस्से को बांधते हुए 14 घंटे की कठोर साधना के बाद मंजिल पर पहुंचे 12 जून 1999 को दोपहर 11 बजे जब वे आगे बढ़े तो उनके साथ कमांडो टीम में मेजर विवेक गुप्ता, सूबेदार भंवरलाल भाकर, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, लांसनायक बच्चूसिंह, सूबेदार सुरेन्द्र सिंह राठोर, लांस नाइक जसवीर सिंह, सीऍमएच जशवीरसिंह, हवालदार सुल्तानसिंह नरवारिया एवं दिगेंद्र कुमार थे।
पाकिस्तानी सेना ने तोलोलिंग पहाड़ी की चोटी पर 11 बंकर बना रखे थे। दिगेंद्र ने प्रथम बंकर उड़ाने की हामी भरी, 9 सैनिकों ने बाकी के 9 बंकर उड़ाने की कसम खाई। 11 वां बंकर दिगेंद्र ने ढेर करने का बीड़ा उठाया। कारगिल घटी में बर्फीली हवा, घना अँधेरा था, दुरूह राहों और बार बार दुश्मन के गो-लों के ध-माकों से निडर वे पहाड़ी की सीधी चढान पर बंधी रस्सी के सहारे चढ़ने लगे और अनजाने में वहाँ तक पहुँच गए जहाँ दुश्मन मशीनगन लगाये बैठा था।
वे पत्थरों को पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे। अचानक दुश्म-न की मशीनगन का बैरल हाथ लगा जो लगातार गो-ले फेंकते काफी गर्म हो गया था। सब की जानकारी होने पर भी उन्होंने बैरल को निकाल कर एक ही पल में हथगोला बंकर में सरका दिया जो जोर के ध-माके से फटा। दिगेंद्र का तीर सही निशाने पर लगा था। निशाना चुका नही। प्रथम बंकर ढेर हो गया और धूं-धूं कर आग उगलने लगा।
पीछे से 250 कमांडो और आर्टिलरी टैंक गो-लों की वर्षा कर अपने होने का सबूत दे रहे थे। कोबरा के साथियों ने जमकर फाय-रिंग की लेकिन गो-लों ने इधर से उधर नहीं होने दिया। आग उगलती तोपों का मुहँ एक मीटर ऊपर करवाया और आगे बढे। दिगेंद्र बुरी तरह चोटिल हो चुके थे। उनकी दिगेंद्र की अलऍमजी भी हाथ से छूट गई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हौसला मजबूत बनाये रखा।
प्राथमिक उपचार कर बहते खून को रोका। पीछे देखा तो पता लगा लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, सूबेदार भंवरलाल भाकर, नायक चमनसिंह आखिरी साँस ले चुके थे। लांसनायक बच्चनसिंह, सुल्तानसिंह, राठोर और मेजर विवेक गुप्ता बहादुरी से दुश्म-न का सामना करते हुए, वीरगति को प्राप्त हो गए। अपने सभी साथियों को खो देने के बाद दिगेंद्र ने फ़िर हिम्मत की और 11 बंकरों में 18 हथगो-ले फेंके।
मेजर अनवर खान अचानक सामने आ गया। दिगेंद्र ने छलांग लगाई और अनवर खान पर झपट्टा मारा। दोनों लुढ़कते-लुढ़कते काफी दूर चले गए। अनवर खान ने भागने का पूरा प्रयास किया, लेकिन उसकी गर्दन पकड़ ली। दिगेंद्र चोटिल था पर मेजर अनवर खान के बाल पकड़ कर डायगर सायानायड से गर्दन काटकर भारत माता की जय-जयकार की। दिगेंद्र पहाड़ी की चोटी पर लड़खडाता हुआ चढा और 13 जून 1999 को सुबह चार बजे वहां तिरंगा झंडा गाड़ दिया।
दिगेंद्र कुमार को बहादुरी का प्रशंसा पत्र मिला
1993 में दिगेंद्र की सैनिक टुकड़ी जम्मू-कश्मीर के अशांत क्षेत्र कुपवाडा में तैनात थी। पहाड़ी इलाका होने और स्थानीय लोगों में पकड़ होने के कारण उग्रवादियों को पकड़ना मुश्किलो से भरा था। मजीद खान एक दिन कंपनी कमांडर वीरेन्द्र तेवतिया के पास आया और धमकाया कि हमारे खिलाफ कोई कार्यवाही की तो उसके परिणाम अच्छे नही होंगे।
कर्नल तेवतिया ने सारी बात दिगेंद्र को बताई। दिगेंद्र यह सुन तत्काल मजीद खान के पीछे दौड़े। वह सीधे पहाड़ी पर चढा़ जबकि मजीद खान पहड़ी के घुमावदार रस्ते से 300 मीटर आगे निकल गया था। दिगेंद्र ने चोटी पर पहुँच कर मजीद खान के शस्त्र पर गो-ली चलाई। गो-ली से उसका पिस्टल दूर जाकर गिरा।
दिगेंद्र ने तीन गो-लियां चलाकर मजीद खान को हमेशा के लिए सुला दिया। उसे कंधे पर उठाया और मृत शरीर को कर्नल के सम्मुख रखा। कुपवाडा में इस बहादुरी के कार्य के लिए दिगेंद्र कुमार को सेना मैडल दिया गया। दूसरी घटना में जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों की पावन स्थली मस्जिद हजरत बल दरगाह पर आतंकवादियों ने कब्जा करलिया था, तथा अस्त्र शस्त्र का जखीरा जमा कर लिया था।
Jat Heroes Of Kargil War
"Digendra Singh Poraswal"#KargilVijayDiwas
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भारतीय सेना ने धावा बोला। दिगेंद्र कुमार और साथियों ने बड़ी सोच समझ से ऑपरेशन को सफल बनाया। दिगेंद्र ने आतंकियों के कमांडर को मार गिराया व 144 उग्रवादियों के हाथ ऊँचे करवाकर बंधक बना लिया। इस सफलता पर 1994 में दिगेंद्र कुमार को बहादुरी का प्रशंसा पत्र से सम्मानित किया।
39 उग्रवादियों को ढेर किया
अक्टूबर 1987 में श्रीलंका में जब उग्रवादियों को खदेड़ने का भार भारतीय सेना को मिला। इस अभियान का नाम था ऑपरेशन ऑफ़ पवन जो पवनसुत हनुमान के पराक्रम का प्रतीक था। इस अभियान में दिगेंद्र कुमार सैनिक साथियों के साथ तमिल बहुल क्षेत्र में पेट्रोलिंग कर रहे थे। 5 तमिल उग्रवादियों ने दिगेंद्र की पेट्रोलिंग पार्टी के पाँच सैनिकों को खत्म कर दिया था। भाग कर एक विधायक के घर में पन्ह ले ली।
दिगेंद्र ने बाकी साथियों के साथ पीछा किया और विधायक के घर का घेरा बना लिया। लिटे समर्थक विधायक ने बाहर आकर इसका विरोध किया। दिगेंद्र के फौजी कमांडो ने हवाई फायर किया, तो अन्दर से गो-लियाँ चलने लगी। एक फौजी ने हमले पर उतारू विधायक को गो-ली मार दी और पाँचो उग्रवादियों को ढेर कर दिया।
एक अन्य घटना में भारतीय सेना के 36 सैनिकों को तमिल उग्रवादियों ने कैद कर लिया। उन्हें छुडाना बहुत कठिन काम था। टेन पैरा के इन 36 सैनिकों को कैद में 72 घंटे हो चुके थे, लेकिन बचाव के लिए दिमाग मे कोई आईडिया नही आ रहा था। अफसरों की अनेक बैठकें हुईं और जनरल ने दिगेंद्र को बुलाकर उसकी प्लानिग सुनी।
Digendra singh …kargil heero.
My story today pic.twitter.com/WQfAVJj029— Navneet sharma (@sh_navneet) August 14, 2014
दिगेंद्र ने विरोधियों से नजर बचाकर नदी से तैर कर पहुँचने की प्लानिग सुनाई। नदी में १३३ किलोवॉट का विद्युत तरंग बह रहा था, फ़िर भी दुस्साहस कर दिगेंद्र ने आगे चलने का मन बना लिया, साथियों के लिए बिस्कुट पैकेट लिए जो 72 घंटे से भूखे थे। हिम्मत कर उन्होंने नदी में गोता लगाया। कटर निकाला और विद्युत तारों को काट कर आगे पार हो गया।
दिगेंद्र ने वायरलेस से सूबेदार झाबर की सही जगह का पता किया। गोलाबारूद और खाने का सामान सूबेदार झाबर को दिया और साथियों को पहुचाने के निर्देश देकर चलता बना। दिगेंद्र से उग्रवादियों के ठिकाने छुपे न थे। वह नदी के किनारे एक पेड़ के पीछे छुप गया और बिजली की चमक में उग्रवादियों के आयुध डिपो पर निशाना साधा।
दोनों संतरियों को गो-ली से उड़ा दिया एवं ग्रेनेड का नाका दांतों से उखाड़ बा-रूद के ज़खीरे पर फेंक दिया। जोर-जोर से सैंकडों धमाके हुए, उग्रवादियों में हड़कंप मच गया। दिगेंद्र की हिम्मत देख बाकी कमांडो भी आग बरसाने लगे। थोड़े ही समय में 39 उग्रवादियों को ढेर कर दिया गया। जनरल कलकट ने दिगेंद्र को खुश होकर अपनी बाँहों में भर लिया उन्हें बहादुरी के मैडल से सम्मानित किया और रोज दाढ़ी बनाने से छूट दी गई।



