वैज्ञानिक ने देसी गाय के गोबर से बनाया सीमेंट, ईंट और पेंट, 50 से 60 लाख सलाना कमा रहे

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Vedic plaster by Dr Shiv Darshan Malik
Vedic plaster by Dr Shiv Darshan Malik made from cow products. Dr Shiv Darshan Malik of Haryana had created a Vedic Plaster if applied it regulates the temperature along with other benefits like saving electricity, keeping harmful bacteria away etc.

Photo Credits: Twitter

Rohtak: शहर के प्रदूषण को देख आजकल हर कोई गांव की सौंधी मिट्टी (Mitti) को अपना चाहता है। समझदार व्यक्ति जनता है कि गांव की मिट्टी किसी अमृत से कम नही है। शहर में कितने भी AC कूलर लगवालो, लेकिन जो आनंद गांव की मिट्टी से बने घर में है, वो ठंडक इन शहरी चीजो में नही है।

आज हर कोई इको फ्रेंडली और सस्टेनेबल घर बनाना चाहता है। एक ऐसा घर, जो हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनुकूल तो हो ही, पर भी किफ़ायती हो। दूसरे शब्दों में कहें, तो घर ऐसा हो जो दुनिया के किसी भी छोर में हो पर गांव (Village) के किसी घर जैसा एहसास देता हो। वही मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुश्बू और वही ठंडी-ताज़ी हवा।

पैसा बनाने के बहुत से तरीके हैं, लेकिन यदि पैसा कमाते हुए कोई पर्यावरण को भी बचाने की कोशिश कर रहे है, तो ये बहुत अच्छी बात है। सब जानते हैं कि घर बनाने के लिए सीमेंट, ईंट और पेंट जैसी चीजों की जरूरत पड़ती है। भले ही घर बनाने के लिए इन सामानों का प्रयोग करना हमारी मजबूरी बन गई हो, लेकिन कहीं ना कहीं प्रकृति को इनके उत्पादन से हानि भी पहुंचती है।

सोचिए कि अगर हमारे घर इन आम ईंटों सीमेंट या पेंट से ना बन कर गोबर से तैयार हुए ईंट, सीमेंट से बनें तो क्या आपको लगता है कि ऐसा सम्भव हो सकता, इस बात गौर कीजिए जो आनंद हम गांव में ले सकते है वो शहरों के घरों में नही ले सकते क्या, शहरों में शायद जगह और प्राकृतिक संसाधनों की कमी के कारण, ऐसा घर बनाना थोड़ा कठिन हो, लेकिन गांव में आज भी काफी लोग सीमेंट के नहीं, बल्कि मिट्टी के घर में रहते हैं।

इन घरों की पुताई गाय के गोबर से की जाती है, ताकि घर में ठंडक बनी रहे और हानिकारक कीटाणु और जीवाणु भी न रहें। गांव की इस सालों पुरानी तकनीक से प्रेरणा लेकर, रोहतक हरियाणा के 53 वर्षीय डॉ शिव दर्शन मलिक (Dr Shiv Darshan Malik ) ने गाय के गोबर का इस्तेमाल कर, इको फ्रेंडली वैदिक प्लास्टर (Vedic Plaster) का अविष्कार किया है। डॉ शिवदर्शन मलिक ने रसायन विज्ञान में पीएचडी कर रखी है।

डॉ मलिक (Dr Shiv Darshan Malik ) ने गांव में देखा कि गोबर गैस प्लांट स्थापित होने के बाद भी बड़ी मात्रा में गोबर या तो व्यर्थ पड़ा रहता है या सिर्फ उपले बनाने के काम आता है। वैदिक प्लास्टर (Vedic Plaster) के आविष्कार के लिए, डॉ मलिक को 2019 में राष्ट्रपति की ओर से ‘हरियाणा कृषि रत्न’ पुरस्कार भी मिला है।

कौन है ये देसी वैज्ञानिक

हरियाणा के रोहतक जिला के मदीना गांव से ताल्लुक रखने वाले डॉ शिवदर्शन मलिक पिछले 6 सालों से गोबर से इको फ्रेंडली सीमेंट, पेंट और ईटें बनाकर दर्जनों लोगों को प्रशिक्षित कर चुके हैं। गांव ही नहीं बल्कि शहरी लोग भी शिव दर्शन की इस अविष्कार का उपयोग करते हुए इको फ्रेंडली घरों का बनवा रहे है। वो भी शहरों में रहकर देसी गांव की मिट्टी का अनुभव लेना चाहते है। शिव दर्शन 100 से ज्यादा लोगों को प्रशिक्षण दे चुके हैं।

कहा से इको फ्रेंडली घर बनाने के तरीकों का अध्ययन किया

रोहतक के एक कॉलेज में बतौर प्राध्यापक काम करने के कुछ महीनों बाद डॉ शिवदर्शन मलिक साल 2004 में आईआईटी दिल्ली और विश्व बैंक द्वारा प्रायोजित एक रिन्यूएबल एनर्जी परियोजना से जुड़े और 2005 में उन्होंने एक यूएनडीपी परियोजना में काम किया। इस बीच उनको अमेरिका और इंग्लैंड जाने का अवसर मिला जहां उन्होंने इको फ्रेंडली घर बनाने के तरीकों का अध्ययन किया।

कितना है भारत में प्रतिदिन गोबर का उत्पादन

अब गांवों में गोबर गैस का उपयोग ज्यादा हो रहा है और उपले कम मात्रा में जलाए जाते हैं। ऐसे में गोबर का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हो गया है। गांव में भी अब चूल्हे में कम गैस में खाना पकाने लगा है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक भारत में प्रतिदिन 33 से 40 मिलियन टन गोबर पैदा होता है। डॉ शिवदर्शन मलिक ने जब गोबर पर रिसर्च की तो पता चला कि यह एक थर्मल इंसुलेटेड पदार्थ है जो सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडे घर बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत में सदियों से मिट्टी और गोबर का मिश्रण लिपाई पुताई में उपयोग किया जा रहा है।

100 से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दे चुके

डॉ मलिक अपना गोबर पेंट का फार्मूला को किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहते लेकिन वह गोबर में कुछ कुदरती रंग मिलाकर पेंट तैयार करते हैं। डॉ मलिक के मुताबिक गोबर के सीमेंट और ईंट से तैयार किए गए घर कुदरती तौर पर वातानुकूलित होते हैं और इनमें बिजली का बहुत कम उपयोग होता है।

इन घरों में इतनी ठडक उतपन्न हो जाती है कि कूलर AC की जरूरत ही नही पड़ती। इससे बिजली की खर्च भी कम आता है। डॉ मलिक अब तक उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड आदि राज्यों के 100 से ज्यादा लोगों को प्रशिक्षित कर चुके हैं। ये प्रशिक्षित लोग अब देश के कई हिस्सों में गोबर से ईटें और सीमेंट बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

डॉ मलिक के दावे के मुताबिक एक बार उन्हें दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने का सुनहरे अवसर मिला था, तो उन्होंने इस तकनीक की तारीफ करने के साथ उनका खूब हौसला बढ़ाया था। उनके काम को प्रोत्साहित किया। डॉ मलिक को हरियाणा कृषि रत्न सम्मान से नवाजा जा चुका है।

गांव को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना

शुरूआती पढ़ाई उन्होंने ग्रामीण स्कूल से की। इसके बाद उन्होंने रोहतक से ग्रेजुएशन, मास्टर्स और फिर पीएचडी की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने कुछ साल काम किया। वह एक कॉलेज में टीचर थे। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और शोध करने की योजना बनाई। चूंकि वे ग्रामीण क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। उनको गाँव और शहर की हर बात का अनुभव था।

शहरी लोग गांव आकर किस चीज का आनंद लेते है। उनको ज्यादा चीज कौन सी है जो आकर्षित करती है, इन सब बातों का अध्ययन करना स्टार्ट कर दिया। फिर उन्होंने कुछ ऐसी जानकारी एकत्र करने का निर्णय किया ताकि गांवों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सके और यहां रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हो सकें।

पढ़े लिखे लोग किस घर मे रहना पसंद करते है शोध किया

2004 में उन्होंने विश्व बैंक के साथ काम किया और एक साल बाद, 2005 में, अक्षय ऊर्जा पर यूएनडीपी की एक परियोजना के साथ काम किया। इस दौरान शिव दर्शन को अमेरिका और इंग्लैंड घूमने का मौका मिला। जो समझदार लोग होते है उनकी सोच सबसे अलग होती है। वहां उन्होंने देखा कि पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से संपन्न लोग सीमेंट और कंक्रीट के बने घरों के बजाय पर्यावरण के अनुकूल घरों में रहना पसंद करते हैं, क्योंकि ये घर सर्दियों में अंदर से गर्म रहते हैं।

कब स्टार्ट किया काम

2015-16 में उन्होंने पेशेवर स्तर पर अपना काम शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने गाय के गोबर से सीमेंट तैयार किया। फिर खुद इस्तेमाल किया और गांव के लोगों को भी उपयोग के लिए दे दिया। सभी से उनकी प्रतिक्रिया ली। सबसे जाना कि सजे इस्तेमाल से कैसा अनुभव है, सभी ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

इसके बाद उन्होंने तय किया कि इस काम को आगे बढ़ाया जाए। उनका कहना है कि गांवों में भी लोग अब खाना पकाने के लिए गैस का इस्तेमाल कर रहे हैं। चूल्हों में बहुत कम गांव में खाना बनाने की प्रथा है, अब ये धीरे धीरे विलुप्त हो रही है। गांव में भी अधिकतर लोग गैस का ही इस्तेमाल कर रहे है।

इससे ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले गोबर की खपत भी कम हो गई है। इस वजह से अब गांवों में गोबर के ढेर लगे हैं। गांव में गोबर की मात्रा बहुत अधिक देखने को मिलती है। गांव के हर घर मे गांव को पाला जाता है। गांव में गाय को पूजनीय माना जाता है। इसका गौशालाओं में तो स्थिति और भी खराब है।

शिव दर्शन इस बात पर खोज करते रहे कि गाय के गोबर से और क्या बनाया जा सकता है। जो उपयोग में ली जा सकती है। इससे पर्यावरण भी शुद्ध रहेगा। 2019 में उन्होंने गाय के गोबर से पेंट और ईंटें तैयार करना शुरू किया। इस पर भी उनको सबसे अच्छी प्रतिक्रिया मिली। जल्द ही किसान और व्यापारी उनसे जुडने लगे। वो भी इसका प्रशिक्षण लेने के लिए उत्सुक थे।

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