गरीबी और विकलांगता को पीछे छोड़ IAS ऑफिसर बनने वाली उन्मुल खैर की संघर्ष भरी कहानी

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Ummul Kher success story
Ummul Kher success story in Hindi. Ummul Kher is a brave girl who focused on her vision to become an IAS officer while ignoring her fragile bone disability. She cleared the UPSC civil services exam in 2016 in her first attempt.

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Delhi: किस्मत में कामयाबी लिखी है तो कोई भी ताकत उससे तुमको जुदा नही कर सकती। किसी भी चीज को पाने का जुनून होना चाहिए। जनून ही मंजिल का रास्ता है। जो लोग कामयाबी की राह में परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति का रोना रोते हैं। उन्हें उम्मुल खेर की जिंदगी से जरूर सीखना चाहिए। इनकी जिंदगी, हिम्मत, संघर्ष और सफलता की मिसाल है।

इस बात से ही इंसान की कामयाबी पहचानी जा सकती है की दिल्ली के स्लम एरिया की झुग्गी झोपड़ियों से निकली IAS अफसर उम्मुल हैं। उम्मुल दिल्ली के निजामुद्दीन में एक झुग्गी में अपने परिवार के साथ रहती थीं। यही उनका पहला आशियाना था। वहीं सड़क के किनारे उनके पिताजी कुछ सामान बेचा करते थे, जिससे उनके घर का भरण पोषण होता था।

पहले ही गरीबी के चलते इतनी मुसीबत भारी जिंदगी जी रही थी, फिर एक दिन उनकी झुग्गियों को वहां से हटा दिया गया। मजबूरी में उन्हें त्रिलोकपुरी में किराये का रुम लेना पड़ा। पिताजी का काम निजामुद्दीन में था, जो यहां रुम बदलने से चला गया। उस समय उम्मुल सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसी समय उन्होंने फैसला किया कि वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ायेंगी।

ऐसे उनके घर का खर्च और पढ़ाई का खर्च निकलने लगा। उम्मुल ने आगे भी कई वर्षों तक ट्यूशन पढ़ाकर ही अपनी पढ़ाई का पैसा इकट्ठा किया। पिता की नौकरी जाने के बाद उन्होंने हार नही मानी अपने होसलो को मजबूत बनाये रखा। हर परिस्थिति का डांट कर सामना किया। इस दौरान वह ट्यूशन भी पढ़ाती रहीं और इसी दौरान उनका एडमिशन दिल्ली यूनिवर्सिटी में हो गया।

2008 में अर्वाचीन स्कूल से 12वीं पास करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान से ग्रेजुएशन के लिए दाखिला लिया। 2011 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक के बाद उम्मुल ने जेएनयू के इंटरनेशनल स्टडीज स्कूल से पहले एमए किया और फिर इसी यूनिवर्सिटी में एमफिल/पीएचडी कोर्स में एडमिशन लिया।

JNU में एडमिशन की प्रक्रिया सामान्य नहीं है, क्योंकि यहां एंट्रेंस एग्जाम द्वारा कुछ ही सेलेक्ट स्टूडेंट्स का दाखिला हो पाता है, लेकिन उम्मुल की किस्मत साथ थी, यहां उनको दाखिला मिल गया। इसके यहां से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे जेएनयू (जवाहर लाल यूनिवर्सिटी) चली गईं। यहां वे शोध की पढ़ाई के साथ-साथ आईएएस की तैयारी में जुट गईं।

इस दौरान उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा दी, तो उन्हें 420वीं रैंक मिली। अपनी कामयाबी पर उन्होंने बताया कि कोई स्टूडेंट्स अगर कडी मेहनत के साथ परीक्षा की तैयारी करता है तो सफलता मिलने से उसे कोई रोक नहीं सकता है।

उम्मुल 8वीं कक्षा में पढ़ना चाहती थी तो घरवालों ने पढ़ाने से इन्कार कर दिया। क्योंकि समाज और परिवेश के लिए,घरवाले यही कहते थे की 8वीं तक पढ़ना भी बहुत है। घरवालों का कहना था की तुम्हारे पैर ख़राब है तो सिलाई का विकल्प सही रहेगा। उम्मुल के साथ कुछ ऐसा भी था कि उनकी खुद की रियल माँ नहीं थी और सौतेली माँ की हमदर्दी उनके साथ नहीं थी।

उम्मुल ने बताया कि घरवालों के द्वारा साफ़ माना किए जाने और राजस्थान भेजे जाने की बात पर वह खुद घर से दूर किराये का कमरा लेकर रहने लगी। यहाँ उम्मुल सुबह स्कूल जाती और फिर स्कूल से आकर बच्चों को पढ़ाती। उम्मुल का कहना है कि उनके परिवार के लोगों ने उनके साथ जो भी किया वह उनका एक गलत निर्णय था।

उम्मुल का कहना है कि इसमें उनका कोई दोष नही है क्योंकि उनके पिता ने लड़कियों को ज्यादा पढ़ते हुए नहीं देखा था इसीलिए वह उम्मुल को ज्यादा शिक्षा नही देना चाहते थे। उम्मुल का कहना है कि उसने अपने परिवार की गलती को भुला दिया है। अब परिवार के साथ उसके अच्‍छे रिश्ते हैं। अब उम्मुल के माता-पिता उनके बड़े भाई के साथ राजस्थान में रह रहे हैं।

उम्मुल का कहना है कि वह अपने माता-पिता का बहुत सम्मान करती है और अब वह उन्हें हर तरह का आराम देना चाहती है जो‍कि उनका हक है। उन्मूल का कहना है कि अगर मेरे माता पिता उस समय मेरा साथ देते तो में ओर भी खुश होती। लेकिन समाज की नीतियों के कारण वो भी मजबूर थे। आज लड़कि हर क्षेत्र में लड़कों से आगे निकल रही है।हर क्षेत्र में अपनी जीत के परचम लहरा रही है। बस उनकी काबिलियत पहचानने की जरूरत है समाज को।

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