बिहार की बेटी ने लंदन छोड़ा, अपने देश में ऐसा काम किया, जिससे 6000 लोगों को रोजगार मुहैया हुआ

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Setika Singh Siwan
Story of Setika Singh who is the executive director of Takshila Foundation. Bihar Siwan daughter leaved London and start social work in Bihar.

Siwan: बिहार के शहर सिवान स्थित जीरादेई की पहचान अभी तक देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद से होती है, लेकिन अब इसे नई पहचान देने के काम मे जुटी है सेतिका सिंह। ये जरूरी नहीं होता की एक शिक्षक का बच्चा शिक्षक और डॉक्टर का बच्चा डॉक्टर ही बने। हर किसी के ख्वाब अलग होते है।

एक उम्र के बाद सभी अपना अपना करियर की फिल्ड चुन लेते है। किसी की दौड़ डॉक्टर बनने की होती है, किसी की इंजीनियर। ऐसे में बिहार के एक बेटी जिनके पिता 4 स्कूलों के मालिक है। उन्होंने समाज सेवा को अपना करियर चुना।

इनका नाम सेतिका सिंह (Setika Singh) है और इन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से सामाजिक नीति से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 24 साल की उम्र में देश में परिवर्तन लाने का निश्चय किया। बिहार के शहाबुद्दीन के सीवान (Siwan) के जीरादेई ब्लाक के एक गांव नरेन्द्रपुर जो उनकी पैतृक भूमि है। वहां से बदलाव शुरू किया।

सेतिका के पिता का नाम संजीव कुमार है और तक्षशिला एजुकेशन सोसाइटी (Takshila Educational Society) से डीपीएस स्कूल के मालिक थे और परिवर्तन नाम का एक एनजीओ (Parivartan NGO) चलाते थे। सेतिका ने विशेषत एनजीओ की सारी जिम्मेदारी ले रखी थी।

सब से पहले उन्होंने 5 किमी के अंदर आने वाले 21 गांव चुने और उस गांव के लिए उन्होंने वो सारी चीजें उपलब्ध कराई जिसके लिये लोग बड़े शहर की तरफ जाते है। सबसे पहले रोजी रोटी की व्यवस्था कराई। हर व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार काम कर सके ऐसी व्यवस्था कराई।

लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से पढऩे के बाद उनके सामने बेहतर भविष्य के सभी दरवाजे खुले हुए थे। हर क्षेत्र से उनको अच्छी जॉब के ऑफर थे। लेकिन अपने गांव को नई पहचान दिलाने के लिए उन्होंने अपनी कर्मस्थली अपने गांव को ही अपनी पहली पसंद बनाया।

बिहार राज्य में रोजगार की बहुत जरूरत है

गाँव मे रोजगार ना मिलने के कारण गांववासी अपने घर और गांव से दूर जाकर मजदूरी करते है। जिससे अपने परिवार का पेट पाल सके। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सके। इसके लिए सेतिका ने 6000 से ज्यादा लोगो को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराया। जिससे आज वे कोई भी काम, खेलकूद, गायन या फिर अभिनय आदि से गांव में ही रहकर अपने घर परिवार का भरण पोषण कर रहे है।

सेतिका ने खुद की पढ़ाई के दौरान ही गांव के लिये शिक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया था। इसके लिए वो शिक्षा संस्था से इंटर्नशिप के लिए जुड़ीं। यहीं से उन्होंने अंदाजा लगा लिया की बिहार में ऐसे कामो की ज्यादा आवश्कयता है।

कुछ समय पहले ही उन्होंने सबरंगी नामक एक योजना चालू की जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के जीवन में खुशियों के सभी प्रकार के रंग भरना है। विशेषत महिलाओं के द्वारा तैयार किये गए उत्पाद को उचित बाजार मूल्य पर बेचना है। सेतिका के काम को लेकर मिडिया ने उनसे कुछ सवाल किये जिसका जवाव उन्होंने बड़े ही अच्छे ढंग से दिया तो आइए जानते हैै।

नाचने बजाने वाली के पास आज की दुनिया में क्या काम होगा

जो महिलाए गा बजाकर अपनी रोजी चलाती है। अपने परिवार का पेट भरती है उन्हें बिहार के लोग आवारा या नचनिया-बजनिया कहते है। परंतु लोग ये नही जानते कि यह भी कला है, जो अच्छा गा सकते है।

उसके कंठ में स्वयं स्वर की देवी विराजमान होती है। इस लिए सेतिका ने नरेंद्रपुर और उसके आसपास के गांव में इसकी डेफिनेशन बदल कर रख दी। यहां पर ट्रेनर गांवों की युवकों को चुनकर ट्रेनिंग देते है और फिर नाटकों का मंचन करवाते हैं। ऐसे ही कलाकारों को तक्षशिला से लेकर पटना समेत कई शहरों में आसानी से काम मिल जाता है।

बचपन से कभी पढ़ाई नहीं की सिर्फ खेलकूद में ही समय बीता दिया अब क्या करें

एक युवक ने सेतिका से सवाल किया तो उन्होंने बताया कि यह उसकी कोई कमी नहीं, ये तो उस युवक का शौक है। उसे बहुत समझाया और फिर उस शौक को स्टेट और नेशनल स्तर के खिलाड़ी में बदल दिया। उन युवाओं के लिए जो खेलने के शौकीन है। उनके लिए कबड्‌डी, साइकलिंग और फुटबाल के लिये स्टेट लेवल के कोच से ट्रेनिंग की व्यवस्था कराई।

अभी तक 21 गांव से फुटबाल में 15, साइकलिंग में 9, कबड्‌डी में 7 खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक खिलाडी पहुंचे और सबसे अच्छा काम ये हुआ की गांव के बच्चों में भी खेल के प्रति इंटरेस्ट जागा और खेल कूद के प्रति आगे बढे। इस बात की गहराई नरेंद्रपुर के स्टेडियम में कबड्‌डी और फुटबाल खेल रहे उन बच्चों को देखकर पता लगती है।

खेती घाटे का सौदा है तो कुछ नया किया जाये

गांव में अधिकतर लोग खेती पर ही निर्भर रहते है। खेती से ही अपने परिवार का पेट भरते है, ऐसे में अगर उनको खेती से मुनाफा ना हो तो ये एक बड़ी समस्या है। क्योंकि किसान अपना दिनरात खेती करने में ही लगा देता है।

भारत की 75% आवादी खेती किसानी से चल रही है। लगभग गांव का प्रत्येक आदमी किसान ही है। लेकिन कुछ किसान खेती की बारीकियां नही जानते है की खेती कैसे की जाती है। जिससे मुनाफा को बढ़ाया जा सके।

आज आधुनिक तकनीक और प्रयोगशाला की रिसर्च से किसानों को सिखाया जाता है कि किस फसल के लिए कोन सा मौसम सही है, किस मौसम में कौन सी खेती करना सही होगा, किस तरह की मिट्‌टी में कौन सी फसल लगानी है।

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